अधिवक्ताओं की मुख्य शिकायतें और दलीलें
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के पक्ष में पेश होने वाले कई अधिवक्ताओं ने पोर्टल और प्रक्रियागत बाधाओं को उजागर किया:
- बार-बार आपत्तियां (Queries) लगाना: एडवोकेट ऋषिकेश कुमार ने बताया कि उनके द्वारा जमा किए गए लगभग 500 बिलों में से 250 से अधिक पर आपत्तियां लगाई गईं। एक प्रश्न का उत्तर देने पर दूसरा प्रश्न खड़ा कर दिया जाता है, जिससे बिल महीनों अटके रहते हैं।
- BTF जारी न होना: एडवोकेट उदित मलिक ने कहा कि कई मामलों में कोर्ट में पेश होने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर BTF जारी नहीं किया गया, जिसके बिना पोर्टल पर बिल अपलोड ही नहीं हो पाता।
- पोर्टल अपडेट न होना: एडवोकेट दिव्यम नंद्राजोग ने कहा कि कुछ बिल पास हो जाते हैं लेकिन पोर्टल पर स्थिति अपडेट नहीं होती, जिससे वकीलों को पता ही नहीं चलता कि कौन सा बिल अटका है और कौन सा मंजूर हुआ है।
हाईकोर्ट द्वारा जारी किए गए मुख्य निर्देश
न्यायाधीश मिनी पुष्कर्णा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली सरकार को निम्नलिखित ठोस कदम उठाने के आदेश दिए:
- पोर्टल पर स्पष्ट स्टेटस दर्ज हो: पोर्टल (OSWS) को इस तरह अपडेट किया जाए कि हर वकील के नाम के सामने उनके पेंडिंग और मंजूर हुए बिलों का स्पष्ट वर्गीकरण दिखे।
- ऑर्डर शीट के आधार पर BTF जारी करना: यदि अदालत की ऑर्डर शीट (Order Sheet) में सरकारी वकील की उपस्थिति दर्ज है, तो प्रशासनिक अधिकारी तुरंत BTF जारी करें। जिन मामलों में BTF नंबर दर्ज है, उनसे भौतिक/फिजिकल प्रतियां (Physical Copies) न मांगी जाएं।
- नोडल अधिकारी की नियुक्ति पर विचार: दिल्ली सरकार के विधि एवं न्याय विभाग से एक नोडल ऑफिसर (Nodal Officer) नियुक्त करने पर विचार करने को कहा गया है, जो वकीलों के बिलों से जुड़ी समस्याओं का समन्वय कर सके।
- उप-आयुक्तों (Deputy Commissioners) की व्यक्तिगत जिम्मेदारी: संबंधित डिप्टी कमिश्नरों को राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाकर BTF जारी कराने और बिलों के जल्द निस्तारण की व्यक्तिगत जिम्मेदारी दी गई है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार (GNCTD) का अदालतों में प्रतिनिधित्व करने वाले पैनल अधिवक्ताओं के पेशेवर शुल्क (Professional Fees) के भुगतान में वर्षों की देरी, ऑनलाइन सिंगल विंडो सिस्टम (OSWS) पोर्टल की तकनीकी गड़बड़ियों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा उठाई जाने वाली निरंतर आपत्तियों पर कड़ा संज्ञान लिया है।
न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की एकल पीठ ने दिल्ली सरकार की पैनल अधिवक्ता अंजना गोसाईं और अन्य वकीलों द्वारा व्यक्तिगत रूप से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। वकीलों ने अदालत को बताया कि सरकार के पक्ष में दिन-रात पैरवी करने के बावजूद उन्हें अपनी जायज फीस पाने के लिए अंतहीन तकनीकी और नौकरशाही बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। अदालत ने दिल्ली सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि सरकारी वकीलों के लंबित बिलों का अविलंब निस्तारण किया जाए, पोर्टल को पारदर्शी बनाया जाए और जिन मामलों में अदालती आदेश पत्रकों (Order Sheets) में वकीलों की उपस्थिति दर्ज है, वहां तत्काल ‘ब्रीफ ट्रांसमिशन फॉर्म’ (BTF) जारी किए जाएं।
उच्च न्यायालय के प्रमुख निर्देश एवं विधिक व्यवस्था
1. OSWS पोर्टल पर प्रत्येक वकील के लंबित बिलों की स्थिति हो स्पष्ट: न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा
- अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह अपने ऑनलाइन सिंगल विंडो सिस्टम (OSWS) पोर्टल को तत्काल अपडेट करे ताकि प्रत्येक अधिवक्ता के नाम के सामने यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो कि उनके कौन-कौन से बिल लंबित हैं और कौन से पास हो चुके हैं।
- पीठ ने स्पष्ट किया कि पारदर्शिता के अभाव में वकील यह पता लगाने में असमर्थ हैं कि उनकी फाइल किस प्रशासनिक स्तर पर रुकी हुई है।
2. ऑर्डर शीट में उपस्थिति होने पर BTF जारी करना अनिवार्य; भौतिक प्रतियां मांगने पर रोक
- अदालत ने कड़ा निर्देश दिया कि जिन मामलों में संबंधित अदालतों की ऑर्डर शीट (Order Sheets) में दिल्ली सरकार की ओर से वकील की उपस्थिति दर्ज है, वहां प्रशासनिक अधिकारियों को बिना किसी टालमटोल के तत्काल BTF जारी करना होगा।
- भौतिक प्रतियों की मांग बंद हो: उच्च न्यायालय ने दो टूक शब्दों में कहा:“प्रतिवादी-GNCTD उन मामलों में बीटीएफ (BTF) की भौतिक प्रतियों (Physical Copies) की मांग नहीं करेगा, जहां वकीलों द्वारा बिलों में पहले से ही बीटीएफ नंबर दर्ज कर दिए गए हैं।”
- जिन मामलों में किसी कारणवश बीटीएफ जारी नहीं हो सका है, वहां पोर्टल पर बिल अपलोड करने की वैकल्पिक तकनीकी व्यवस्था विकसित करने का भी निर्देश दिया गया।
3. विधि विभाग से नोडल अधिकारी की नियुक्ति और डीसी (राजस्व) की व्यक्तिगत जवाबदेही
- अदालत ने दिल्ली सरकार को सुझाव दिया कि वह अपने कानून एवं न्याय विभाग (Department of Law and Justice) से एक नोडल अधिकारी (Nodal Officer) नियुक्त करे, जो वकीलों के साथ समन्वय स्थापित कर आपत्तियों (Queries) के समाधान और बिलों की कमियों को दूर करने का कार्य करे।
- अदालत ने उत्तर-पूर्वी जिले/मुख्यालय-1 के संबंधित डिप्टी कमिश्नर (DC) को व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपा कि वे राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ समन्वय कर लंबित मामलों में ऑर्डर शीट के आधार पर बीटीएफ जारी करवाएं।
सुनवाई के दौरान वकीलों द्वारा उजागर की गई प्रशासनिक बाधाएं
- बार-बार आपत्तियां (Endless Queries): अधिवक्ता ऋषिकेश कुमार ने अदालत को बताया कि उनके द्वारा जमा किए गए लगभग 500 बिलों में से करीब 250 बिलों पर आपत्तियां लगा दी गईं। स्थिति यह है कि एक आपत्ति का जवाब देने पर अधिकारी दूसरी नई आपत्ति खड़ी कर देते हैं, जिससे महीनों तक बिल लंबित रहते हैं।
- BTF न मिलने से पोर्टल का लॉक होना: अधिवक्ता उदित मलिक ने रेखांकित किया कि सरकार की ओर से अदालतों में बहस करने और मुकदमों का बचाव करने के बावजूद कई मामलों में संबंधित विभाग बीटीएफ जारी नहीं करते। बीटीएफ के अभाव में ऑनलाइन पोर्टल बिल स्वीकार ही नहीं करता।
- स्टेटस अपडेट का अभाव: अधिवक्ता दिव्यम नंदराजोग ने प्रस्तुत किया कि कुछ चुनिंदा बिल पास होते हैं, जबकि अधिकांश लंबित रहते हैं। पोर्टल पर कोई ट्रैकिंग सिस्टम न होने के कारण यह जानना असंभव हो जाता है कि रुकावट कहां है।
सरकार का पक्ष और अदालत की निगरानी
- दिल्ली सरकार के वकील तुषार सन्नू ने अदालत में दो स्टेटस रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि सचिव-सह-संभागीय आयुक्त (राजस्व) की अध्यक्षता में इस मुद्दे को सुलझाने के लिए उच्च स्तरीय बैठकें आयोजित की जा रही हैं।
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित डिप्टी कमिश्नर ने आश्वासन दिया कि बिलों की कमियों को दूर करने के लिए लगातार सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं।
- 2021 से हाईकोर्ट की सतत निगरानी: उच्च न्यायालय 2021 से इस ऑनलाइन पोर्टल की कार्यप्रणाली की निगरानी कर रहा है। नवंबर 2023 और वर्ष 2024 में भी अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि बिल जमा करने की प्रक्रिया को दोषमुक्त बनाया जाए और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के तहत निर्धारित समयसीमा में भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश
अदालत ने निर्देश दिया कि सरकारी वकीलों के लंबित बिलों का त्वरित निस्तारण किया जाए। संबंधित राजस्व विभाग के अधिकारी को अगली सुनवाई पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उपस्थित रहने और प्रगति की नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर को तय की गई है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अंजना गोसाईं एवं अन्य बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (GNCTD)
- प्रासंगिक प्रणाली व नियम: दिल्ली सरकार का ऑनलाइन सिंगल विंडो सिस्टम (OSWS Portal); दिल्ली सरकार पैनल अधिवक्ताओं की फीस भुगतान हेतु मानक संचालन प्रक्रिया (SOP); भारत का संविधान – अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- संजीव सचदेवा बनाम GNCTD (दिल्ली उच्च न्यायालय) — ‘अदालतों में न्याय प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने में सरकारी वकीलों की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान है; राज्य सरकार द्वारा उनकी वैधानिक फीस के भुगतान में अनावश्यक प्रशासनिक या प्रक्रियात्मक देरी उनके पेशेवर स्वाभिमान और न्याय प्रणाली के सुचारू संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता पैनल अधिवक्ताओं की ओर से: अधिवक्ता अंजना गोसाईं, अधिवक्ता ऋषिकेश कुमार, अधिवक्ता उदित मलिक, अधिवक्ता दिव्यम नंदराजोग (व्यक्तिगत रूप से उपस्थित)
- दिल्ली सरकार की ओर से: अधिवक्ता तुषार सन्नू
- पीठ: न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- अगली सुनवाई: 4 नवंबर 2026
Delhi Govt: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा (Justice Mini Pushkarna) |
| मामला / साइटेशन | ———– |
| मुख्य याचिकाकर्ता | पैनल काउंसिल अंजना गोसैन और अन्य अधिवक्ता |
| मुख्य मुद्दा | दिल्ली सरकार के वकीलों के लंबे समय से बकाया फीस बिल और पोर्टल की खामियां |
| अगली सुनवाई | 4 नवंबर 2026 (अद्यतन स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश) |

