Enhancement Matter: पारिवारिक मुकदमों में प्रक्रियात्मक नियमों को स्पष्ट करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।
गुजारा भत्ता बढ़ाने (Enhancement) का एकमात्र कानूनी रास्ता BNSS की धारा 146
हाईकोर्ट के जस्टिस द्वारका धीश बंसल की एकल पीठ ने कटनी के फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को ₹10,000 प्रति माह का नया भरण-पोषण देने के आदेश को त्रुटिपूर्ण मानते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही मांग के लिए दूसरा मुकदमा कानूनी रूप से विचारणीय (Maintainable) नहीं है। कहा, यदि किसी पत्नी के पक्ष में आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत पहले से ही भरण-पोषण (Maintenance) का आदेश पारित है, तो परिस्थितियों में बदलाव आने या महंगाई बढ़ने के आधार पर वह दोबारा धारा 125 के तहत नया मुकदमा दायर नहीं कर सकती। गुजारा भत्ता बढ़ाने (Enhancement) का एकमात्र कानूनी रास्ता CrPC की धारा 127 (अब BNSS की धारा 146) के तहत राशि में सुधार/वेतन वृद्धि की अर्जी दाखिल करना है।
मामला क्या है?: 1989 की कानूनी लड़ाई, एकतरफा तलाक और ₹300 का सफर
यह मामला तीन दशकों से अधिक पुरानी विधिक जटिलताओं और पारिवारिक विवाद से जुड़ा हुआ है।
शुरुआती आदेश (1989): पत्नी ने सबसे पहले वर्ष 1989 में धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण का केस जीता था, जिसमें उसे ₹300 प्रति माह मंजूर हुए थे। बाद में, वर्ष 1991 में हाई कोर्ट ने निगरानी (Revision) सुनवाई के दौरान इसे घटाकर ₹200 प्रति माह कर दिया था।
दशकों बाद नया केस: दशकों बाद, बदली हुई परिस्थितियों और बढ़ती महंगाई का हवाला देकर पत्नी ने फैमिली कोर्ट, कटनी में धारा 125 के तहत बिल्कुल नया आवेदन पेश कर दिया। फैमिली कोर्ट ने तकनीकी नियमों (प्रांगन्याय या Res Judicata) को दरकिनार करते हुए पत्नी के पक्ष में ₹10,000 प्रति माह का नया आदेश जारी कर दिया। इसके खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दायर की।
पति की विधिक आपत्ति: पति की ओर से पेश अधिवक्ता पुरुषोत्तम दास जायसवाल ने तर्क दिया कि जब पहले से ही एक अदालती आदेश मौजूद है, तो धारा 125 का दूसरा केस पूरी तरह अवैध है। पत्नी को धारा 127 के तहत केवल राशि बढ़ाने की मांग करनी चाहिए थी।
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: “एकतरफा डिक्री भी उतनी ही प्रभावी है”
जस्टिस द्वारका धीश बंसल ने पति की दोनों मुख्य कानूनी आपत्तियों को सही पाया और फैमिली कोर्ट के फैसले की विधिक कमियों को रेखांकित किया।
धारा 127 का अनिवार्य मार्ग: हाई कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, बदली हुई परिस्थितियों के आलोक में, प्रतिवादी/पत्नी भरण-पोषण की राशि में वृद्धि (Enhancement) के लिए धारा 127 CrPC के तहत आवेदन करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र थी। लेकिन भरण-पोषण की मांग के लिए धारा 125 CrPC के तहत दूसरा आवेदन किसी भी सूरत में विचारणीय नहीं था।
एकतरफा तलाक की डिक्री का प्रभाव: पति ने यह भी दलील दी थी कि वर्ष 2002 में उसने क्रूरता/व्यभिचार (Adultery) के आधार पर पत्नी से एकतरफा तलाक (Ex-parte Divorce Decree) ले लिया था, जिसे रद्द कराने की पत्नी की अर्जी (Order 9 Rule 13) भी 2003 में खारिज हो चुकी थी। फैमिली कोर्ट ने इसे यह कहकर नजरअंदाज कर दिया था कि एकतरफा आदेश बाधक नहीं होता।
नजीर का हवाला: हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि “एकतरफा डिक्री का विधिक प्रभाव भी उतना ही मजबूत होता है जितना दोनों पक्षों की उपस्थिति में पारित डिक्री का होता है।” जब तक उसे उचित कानूनी प्रक्रिया से पलटा न जाए, वह पूरी तरह प्रभावी रहती है।
न्यायालय का अंतिम निर्देश और अंतरिम राहत
उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के विवादित आदेश को खारिज करते हुए मामले को पुनर्विचार (Remand) के लिए वापस भेज दिया है।
केस की बहाली: कटनी फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह पत्नी के पुराने आवेदन को उसके मूल नंबर पर बहाल (Restore) करे और कानून के अनुसार नए सिरे से विचार करे।
अंतरिम भरण-पोषण: जब तक फैमिली कोर्ट कोई नया आदेश पारित नहीं करता, तब तक पति हाई कोर्ट द्वारा वर्ष 2018 में तय की गई ₹4,000 प्रति माह की अंतरिम भरण-पोषण राशि पत्नी को देता रहेगा।
पेशी की तारीख: हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों (पति और पत्नी) को 17 अगस्त 2026 को फैमिली कोर्ट के समक्ष अनिवार्य रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
विधिक केस शीट: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बनाम भरण-पोषण क्षेत्राधिकार (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस द्वारका धीश बंसल (एकल पीठ) |
| मूल कानूनी प्रावधान | दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 बनाम धारा 127 |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | पूर्व आदेश की मौजूदगी में धारा 125 का दूसरा नया मुकदमा कानूनन वर्जित है |
| एकतरफा डिक्री पर रुख | ‘Ex-parte decree is as good as bi-party decree’ (उतनी ही प्रभावी) |
| अगली अदालती तारीख | पक्षकारों को 17 अगस्त 2026 को फैमिली कोर्ट में हाजिर होना होगा |

