Same Gotra Marriage: सगोत्र विवाह (Sagotra Marriage) को लेकर खाप पंचायत जैसी रूढ़िवादी मानसिकता और सामाजिक प्रताड़ना के खिलाफ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है।
राज्य सरकार सहित रूढ़िवादी संगठन के पदाधिकारियों को नोटिस जारी
हाईकोर्ट के जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ (Division Bench) ने एक सामाजिक संगठन द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे नवदंपति को अंतरिम पुलिस सुरक्षा (Interim Protection) प्रदान करने का आदेश दिया है और राज्य सरकार सहित रूढ़िवादी संगठन के पदाधिकारियों को नोटिस जारी किया है। कहा, एक ही गोत्र (Same Gotra/Sagotra) में विवाह करने के कारण किसी बालिग जोड़े या उनके परिवारों का सामाजिक बहिष्कार करना, उन पर आर्थिक जुर्माना लगाना या समाज से बेदखल करने की धमकी देना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है। यदि किसी सहमति देने वाले वयस्क जोड़े का विवाह कानूनन वैध है, तो कोई भी जातिगत या सामाजिक संगठन अपनी समानांतर अदालत चलाकर उन्हें प्रताड़ित नहीं कर सकता।
मामला क्या है?: 10 पीढ़ियों की वंशावली की जांच, फिर भी ₹51,000 का जुर्माना
यह गंभीर मामला मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले और स्थानीय सामाजिक संगठन (संगठन) की मनमानी से जुड़ा है।
तार्किक विवाह: याचिकाकर्ता जोड़े ने शादी से पहले पूरी सावधानी बरतते हुए अपनी पिछली 10 पीढ़ियों की वंशावली (Genealogy) का सत्यापन किया था ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनके बीच कोई साझा रक्तसंबंध (Common Bloodline) नहीं है। जब कोई सीधा रक्तसंबंध नहीं पाया गया, तो उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत कानूनी रूप से शादी कर ली।
संगठन का तुगलकी फरमान: जोड़े के एक ही गोत्र के होने के कारण स्थानीय सामाजिक संगठन भड़क गया। संगठन ने बिना जोड़े का पक्ष सुने एकतरफा प्रस्ताव पारित कर दिया, जिसके तहत पीड़ित परिवारों पर 11 वर्ष का पूर्ण सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) थोप दिया गया। लड़के और लड़की के परिवारों पर ₹51,000 का आर्थिक जुर्माना लगाया गया। शादी में शामिल होने वाले हर मेहमान/रिश्तेदार पर ₹2,100 का जर्माना और उन्हें भी समाज से बाहर करने की धमकी दी गई।
पुलिस की निष्क्रियता: जोड़े ने इस प्रताड़ना के खिलाफ पुलिस विभाग और बड़वानी के पुलिस अधीक्षक (SP) के समक्ष कई अभ्यावेदन (Representations) दिए, लेकिन पुलिस द्वारा कोई ठोस कार्रवाई न किए जाने पर उन्हें अदालत की शरण लेनी पड़ी।
सिंगल जज से खंडपीठ तक: कानूनी लड़ाई के मुख्य बिंदु
इससे पहले, इस जोड़े ने हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश (Single Judge) के समक्ष रिट याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने यह कहकर खारिज कर दिया था कि मामला “तथ्यों के विवाद” (Disputed Question of Fact) से जुड़ा है। इसके बाद दंपति ने डिवीजन बेंच के समक्ष रिट अपील (Writ Appeal) दायर की। अपील में दंपति ने देश की न्यायपालिका के सामने दो बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाए हैं।
पहला सवाल: क्या कोई जाति, समुदाय या सामाजिक संगठन दो वयस्कों (Consenting Adults) के वैध/सगोत्र विवाह करने पर उन पर सामाजिक बहिष्कार या मौद्रिक दंड जैसा कोई दंडात्मक कदम उठाने का कानूनी अधिकार रखता है?
दूसरा सवाल: क्या ऐसे मामलों में राज्य प्रशासन (State Authorities) की नाकामी, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) और 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का हनन करती है, अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग करती है?
हाई कोर्ट का सख्त निर्देश: तुरंत दी जाए पुलिस सुरक्षा
डिवीजन बेंच ने मामले की गंभीरता और नवदंपति के जीवन को खतरे में देखते हुए तुरंत हस्तक्षेप किया।
तत्काल सुरक्षा का आदेश: कोर्ट ने संबंधित क्षेत्र के पुलिस प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिया है। कहा, राज्य सरकार के वकील को इस पर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया जाता है। इस बीच, यह निर्देश दिया जाता है कि यदि अपीलकर्ताओं (दंपति) को प्रताड़ित किया जा रहा है और उन्हें पुलिस सुरक्षा की आवश्यकता है, तो संबंधित पुलिस द्वारा तत्काल पर्याप्त और पुख्ता सुरक्षा उपाय किए जाएं।
सख्त नोटिस: न्यायालय ने राज्य सरकार, पुलिस अधीक्षक (बड़वानी), जिला महिला अधिकारिता अधिकारी और सामाजिक संगठन के पदाधिकारियों (प्रतिवादी नंबर 9 से 16) को 7 कार्य दिवसों के भीतर नोटिस जारी कर 6 सप्ताह में जवाब तलब किया है।
विधिक केस शीट: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बनाम सगोत्र विवाह प्रताड़ना वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (खंडपीठ – इंदौर/जबलपुर) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी |
| संबंधित संवैधानिक अनुच्छेद | अनुच्छेद 14, 19, 21 (मौलिक अधिकार) और अनुच्छेद 226 |
| संबद्ध सामाजिक कुप्रथा | सगोत्र विवाह पर खाप नुमा सामाजिक बहिष्कार और अवैध जुर्माना |
| क्षेत्राधिकार/प्रभावित जिला | बड़वानी जिला, मध्य प्रदेश |
| न्यायालय का अंतरिम आदेश | पीड़ित जोड़े को तत्काल पुलिस सुरक्षा देने का आदेश; विपक्ष को कड़ा नोटिस |
हाई कोर्ट द्वारा इस रिट अपील को स्वीकार करना और तुरंत सुरक्षा देना यह सुनिश्चित करता है कि सामाजिक रीति-रिवाजों के नाम पर किसी भी नागरिक को मानसिक, आर्थिक या सामाजिक रूप से बंधक नहीं बनाया जा सकता।

