Mens Rea: तेलंगाना हाईकोर्ट ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से जुड़े मामलों में कानून के दुरुपयोग को रोकने और विधिक बारीकियों को स्पष्ट करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A की व्याख्या
हाईकोर्ट के जस्टिस एन. तुकारामजी की एकल पीठ ने हैदराबाद की एक प्रिंटिंग और बाइंडिंग प्रेस के मालिक के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना सरकारी मंजूरी और बिना आपराधिक मंशा के ऐसे मुकदमों को चलाना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत ने कहा, किसी बाइंडिंग प्रेस में पवित्र कुरान की प्रतियों का फर्श पर रखा होना या उन पर धूल-मिट्टी जमा होना, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। जब तक किसी कृत्य के पीछे किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से ठेस पहुंचाने का इरादा (Deliberate and Malicious Intent) साबित नहीं होता, तब तक उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। लापरवाही, असावधानी या बिना आपराधिक मंशा (Mens Rea) के किया गया कार्य इस धारा के दायरे में नहीं आता।
मामला क्या है?: बाइंडिंग प्रेस में रखी पवित्र प्रतियां और शिकायत
यह विवाद हैदराबाद के अंबरपेट स्थित एक प्रिंटिंग प्रेस से जुड़ा है।
शिकायतकर्ता का आरोप: 24 जनवरी 2024 को शिकायतकर्ता जब ‘शारदा प्रिंटिंग एंड बाइंडिंग प्रेस’ गया, तो उसने देखा कि बाइंडिंग के लिए आई पवित्र कुरान की प्रतियों के बंडल बिना किसी कवर या सुरक्षा के फर्श पर रखे हुए थे। कुछ पन्नों पर धूल-मिट्टी भी जमी थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि यह पवित्र ग्रंथ का अनादर है और इससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं, जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया।
आरोपी का बचाव: आरोपी ने इस कार्यवाही के खिलाफ हाई कोर्ट का रुख किया। उसके वकील ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष के अपने मामले के अनुसार भी किताबें वहां केवल बाइंडिंग के काम के लिए रखी गई थीं। आरोपी का इरादा किसी का अपमान करना नहीं था।
अनिवार्य सरकारी मंजूरी का अभाव: आरोपी ने एक मजबूत तकनीकी आपत्ति भी उठाई कि CrPC की धारा 196 (अब BNSS की धारा 218) के तहत धारा 295A के मामलों में अदालत द्वारा संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी (Prior Sanction) लेना अनिवार्य है, जो इस मामले में नहीं ली गई थी। अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने भी इस तकनीकी खामी को स्वीकार किया।
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: लापरवाही और दुर्भावना में फर्क होता है
जस्टिस एन. तुकारामजी ने इस मामले में दो मुख्य विधिक सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए निचली अदालत (IV एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, हैदराबाद) के संज्ञान को अवैध ठहराया।
आपराधिक मंशा (Mens Rea) का अभाव: हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसलों—’रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ और ‘महेंद्र सिंह धोनी बनाम येरागुंटला श्यामसुंदर’ का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि धारा 295A केवल धार्मिक अपमान के उन ‘गंभीर रूपों’ पर लागू होती है जो जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से किए जाते हैं। स्वीकार्य तथ्यात्मक स्थिति यह दर्शाती है कि पुस्तकें बाइंडिंग के उद्देश्य से प्रेस में रखी गई थीं। जानबूझकर किए गए अपमान को दर्शाने वाली किसी भी सामग्री के अभाव में, धारा 295A IPC के तहत आवश्यक ‘मेंस रिया’ (criminal intent) का आवश्यक तत्व गायब है।
अनिवार्य मंजूरी एक ‘मौलिक विधिक सुरक्षा’ (Mandatory Sanction): धारा 196 CrPC के तहत सरकार की पूर्व मंजूरी की अनिवार्यता पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि धर्म और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े संवेदनशील मामलों में बिना सोचे-समझे या दुर्भावना से मुकदमेबाजी शुरू न कर दी जाए। मंजूरी के बिना मजिस्ट्रेट द्वारा लिया गया संज्ञान एक “संवैधानिक और प्रक्रियात्मक दोष” है।
विधिक केस शीट: तेलंगाना हाई कोर्ट बनाम धारा 295A क्षेत्राधिकार (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित न्यायालय | तेलंगाना उच्च न्यायालय, हैदराबाद |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एन. तुकारामजी (एकल पीठ) |
| मुख्य कानूनी प्रावधान | IPC की धारा 295A और CrPC की धारा 196 |
| प्रासंगिक सुप्रीम कोर्ट नजीर | रामजी लाल मोदी केस (1957) एवं एम.एस. धोनी केस (2017) |
| स्थापित कानूनी सिद्धांत | हर वो काम जो अनजाने में धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाए, अपराध नहीं है |
| न्यायालय का अंतिम आदेश | निचली अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह रद्द |
अदालत ने यह साफ कर दिया है कि किसी किताब पर धूल जमना या काम के दौरान उसका जमीन पर रखा होना व्यावसायिक मजबूरी या असावधानी हो सकती है, लेकिन इसे किसी समुदाय के खिलाफ सोची-समझी साजिश नहीं माना जा सकता। सरकारी मंजूरी की अनिवार्यता को बरकरार रखकर कोर्ट ने नागरिकों को बेवजह की कानूनी प्रताड़ना से बचाया है।

