Monday, October 19, 2026
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Adoption Of Girls: प्राचीन हिंदू कानून में लड़कियों को गोद लेने की विधिक मान्यता नहीं थी… हिंदुओं में संपत्ति विवाद पर बड़ा फैसला, जरूर पढ़ें

Adoption Of Girls: वर्ष 1956 से पहले के पारिवारिक और संपत्ति विवादों पर एक महत्वपूर्ण विधिक स्पष्टीकरण देते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने एक महिला की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम को लेकर टिप्पणी

हाईकोर्ट के जस्टिस जे.सी. दोशी की एकल पीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसने महिला को उसके सौतेले पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया था। “हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) के लागू होने से पहले, प्राचीन हिंदू कानून में केवल बेटों को गोद लेने (Dattaka) की मान्यता थी। 1956 के अधिनियम से पूर्व किसी बेटी को कानूनी रूप से गोद नहीं लिया जा सकता था। ऐसे में, भले ही किसी सौतेले पिता ने अपनी दूसरी पत्नी की पहली शादी से जन्मी बेटी को सगे बच्चों की तरह पाला-पोषा हो, लेकिन वह प्राचीन कानून के तहत वैध कानूनी वारिस नहीं बन सकती और पिता की अचल संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकती।

मामला क्या है?: ‘अंगलियात’ (सौतेली) बेटी का संपत्ति पर दावा

यह कानूनी विवाद गुजरात की एक पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और स्वतंत्रता के ठीक बाद के कालखंड से जुड़ा है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि: मुख्य याचिकाकर्ता (वादी) महिला की मां (मनिबेन) की पहली शादी छगनभाई नामक व्यक्ति से हुई थी, जिससे इस बेटी का जन्म हुआ। जैविक पिता की मृत्यु के बाद, मां ने साल 1949 में भोवनभाई नरसीभाई रंगपरिया नामक व्यक्ति से दूसरी शादी कर ली।

शादी की शर्त और पालन-पोषण: वादी का दावा था कि उसकी मां की यह दूसरी शादी इसी शर्त पर हुई थी कि भोवनभाई (जिनके अपने बेटे का निधन हो चुका था) इस बच्ची को अपनी बेटी के रूप में गोद लेंगे। गोद लेने की सभी सामाजिक रस्में पूरी की गईं, भोवनभाई ने जीवनभर उसे अपनी इकलौती संतान की तरह पाला और उसकी शादी भी कराई।

संपत्ति का विवाद: सौतेले पिता की मृत्यु के बाद, उनके भाइयों और भतीजों ने संपत्ति पर दावा ठोक दिया और कथित तौर पर एक वसीयत के आधार पर महिला को बेदखल कर दिया। महिला ने खुद को वैध दत्तक पुत्री (Adopted Daughter) बताते हुए अचल संपत्तियों पर अपने मालिकाना हक के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

‘अंगलियात’ परंपरा और कोर्ट की कानूनी व्याख्या

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या 1956 के अधिनियम से पहले हिंदू कानून में किसी बेटी को गोद लेना विधिक रूप से मान्य था?

जस्टिस जे.सी. दोशी ने प्राचीन हिंदू कानूनी ग्रंथों, संहिताओं और प्रथाओं का विस्तृत विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि अंगलियात’ (Angaliyat) का अर्थ: अदालत ने भगवद्गोमंडल (प्रसिद्ध गुजराती शब्दकोश) का हवाला देते हुए माना कि गुजरात के पाटीदार, कनबी और दलित समुदायों में ‘अंगलियात’ एक स्थापित सामाजिक प्रथा है। इसका अर्थ है—”वह बच्चा (बेटा या बेटी) जो मां की पिछली शादी से पैदा हुआ हो और मां की दूसरी शादी होने पर उंगली पकड़कर उसके नए घर में आता है।

पोषित पुत्री बनाम कानूनी वारिस: कोर्ट ने भावुकता से परे हटकर विधिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, यह निर्विवाद है कि वादी को सौतेले पिता के परिवार में पूरी तरह स्वीकार किया गया था और उसकी परवरिश अपनी संतान की तरह हुई। परंतु, प्राचीन हिंदू कानून के स्रोतों और प्रथाओं में महिला बच्चे को गोद लेने की कोई विधिक मान्यता नहीं थी। इसलिए, कानून की नजर में उसे एक ‘पोषित बच्ची’ (Foster Child) या सौतेले पिता के कर्तव्य के तहत पाली गई ‘अंगलियात बेटी’ से अधिक का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

1956 के बाद बदला कानून: अब बेटियों को भी समान अधिकार

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि प्राचीन कानून की यह रूढ़िवादी व्यवस्था अब पूरी तरह बदल चुकी है।

क्रांतिकारी बदलाव: संसद द्वारा हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के लागू होने के बाद कानून में व्यापक और प्रगतिशील बदलाव किए गए।

वर्तमान स्थिति: वर्तमान कानून के तहत बेटियों को गोद लेना न केवल पूरी तरह से वैध है, बल्कि गोद ली गई बेटियों को जैविक संतानों की तरह ही पिता की संपत्ति में पूर्ण और समान उत्तराधिकार प्राप्त होता है।

अधिनियम का प्रभाव: चूंकि यह मामला 1949 (1956 से पहले) का था, इसलिए इस पर नया कानून भूतप्रेक्षी (Retrospective) रूप से लागू नहीं किया जा सकता। इसके चलते कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया।

विधिक केस शीट: गुजरात हाई कोर्ट बनाम प्राचीन हिंदू दत्तक कानून (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतगुजरात उच्च न्यायालय, अहमदाबाद
माननीय न्यायाधीशजस्टिस जे.सी. दोशी
केस साइटेशनR/First Appeal No 4560 of 2006
ऐतिहासिक संदर्भवर्ष 1956 से पूर्व (प्रस्तुत मामला वर्ष 1949 का है)
प्रमुख गुजराती सामाजिक प्रथा‘अंगलियात’ (Remarriage के बाद मां के साथ आने वाला बच्चा)
न्यायालय का विधिक निष्कर्षप्राचीन हिंदू कानून में बेटियों को गोद लेना अमान्य था; अतः संपत्ति पर अधिकार नहीं।

यह निर्णय 1956 से पहले के संपत्ति विवादों को सुलझाने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल (Precedent) साबित होगा।

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