मुख्य संकेतक (Key Indicators)
- CrPC (1973) से BNSS (2023) में बड़ा बदलाव:पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 200 के तहत, मजिस्ट्रेट शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करने के बाद सीधे संज्ञान ले सकता था और आरोपी को उस शुरुआती चरण में सुनवाई का कोई अधिकार नहीं था। इसके विपरीत, BNSS की धारा 223(1) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि आरोपी को सुने बिना कोई संज्ञान नहीं लिया जा सकता।
- आरोपी को नोटिस जारी करने का सही चरण:अदालत ने तय किया कि मजिस्ट्रेट BNSS की धारा 223(1) के तहत आरोपी को नोटिस तब जारी करेगा जब:
- शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों के बयान शपथ पर दर्ज कर लिए गए हों।
- मजिस्ट्रेट का यह प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मत बन जाए कि शिकायत खारिज करने योग्य (धारा 226 BNSS) नहीं है और अपराध का संज्ञान लिया जा सकता है।
- अदालती विवेक (Discretion) की दलील खारिज:हाईकोर्ट ने उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि मजिस्ट्रेट के पास शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करने से पहले या बाद में कभी भी नोटिस देने का विवेक होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बयान दर्ज होने के बाद ही आरोपी प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रख पाएगा।
- विधायिका का उद्देश्य और आरोपी का सीमित अधिकार:खंडपीठ ने रेखांकित किया कि विधायिका CrPC की पुरानी व्यवस्था से दूर जाना चाहती थी, जहां आरोपियों को वर्षों तक मुकदमे का सामना करना पड़ता था जो अंततः विफल होते थे। अब आरोपी मजिस्ट्रेट के सामने यह साबित कर सकता है कि शिकायत और बयानों को पूरी तरह सच मानने पर भी कोई अपराध नहीं बनता।
नई दिल्ली: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत निजी आपराधिक शिकायतों (Private Complaints) के विचारण, मजिस्ट्रेट द्वारा अपराध का विधिक संज्ञान (Taking Cognisance) लेने की प्रक्रिया और प्रस्तावित आरोपी को सुनवाई का अवसर देने के चरण पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक विधिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा की खंडपीठ ने दो रिट याचिकाओं से उपजे संदर्भों (Legal References) का निस्तारण करते हुए व्यवस्था दी कि BNSS की धारा 223(1) के तहत शिकायतकर्ता व उपस्थित गवाहों का परीक्षण तथा आरोपी को नोटिस जारी कर उसकी बात सुनना, संज्ञान लेने के बाद की नहीं बल्कि संज्ञान लेने से पहले की अनिवार्य प्रक्रियाएं (Steps prior to taking cognisance) हैं। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की पुरानी व्यवस्था के विपरीत, नए आपराधिक कानून (BNSS) में मजिस्ट्रेट किसी निजी शिकायत पर अपराध का संज्ञान तभी ले सकता है जब वह शिकायतकर्ता और गवाहों का शपथ पर परीक्षण कर ले और प्रस्तावित आरोपी को सुनवाई का वैधानिक अवसर प्रदान कर दे।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. CrPC धारा 200 बनाम BNSS धारा 223: विधायिका का स्पष्ट विधायी बदलाव
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा की खंडपीठ ने दोनों संहिताओं के प्रक्रियात्मक अंतर का विश्लेषण करते हुए रेखांकित किया:
“विधायिका स्पष्ट रूप से CrPC के तहत पूर्ववर्ती स्थिति से अलग हटना चाहती थी, जहां प्रस्तावित आरोपी को उस आरंभिक चरण में सुने जाने का कोई विधिक अधिकार नहीं था और उसे एक लंबी, थकाऊ सुनवाई (Prolonged Trial) का सामना करना पड़ता था जो अंततः विफल होने के लिए ही बाध्य थी। अब नए कानून के तहत आरोपी मजिस्ट्रेट के समक्ष यह दर्शा सकता है कि यदि शिकायत तथा शिकायतकर्ता व गवाहों के बयानों को उनके अंकित मूल्य (Face Value) पर भी मान लिया जाए, तब भी प्रथम दृष्टया कोई संज्ञेय अपराध प्रकट नहीं होता। यह आरोपी को प्रदान किया गया एक सीमित अधिकार है, परंतु इसे अदालत द्वारा पूर्ण रूप से दिया जाना अनिवार्य है।”
2. आरोपी को नोटिस किस चरण पर जारी होगा? (Stage of Notice)
अदालत ने उस केंद्रीय विधिक प्रश्न का निपटारा किया कि क्या मजिस्ट्रेट शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करने से पहले नोटिस जारी कर सकता है या बाद में:
- खंडपीठ ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि मजिस्ट्रेट के पास बयान से पहले या बाद में कभी भी नोटिस जारी करने का अनियंत्रित विवेकाधिकार है।
- अदालत ने निर्धारित किया:“मजिस्ट्रेट को BNSS की धारा 223(1) के पहले परंतुक (First Proviso) के अनुपालन में प्रस्तावित आरोपी को नोटिस शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों के शपथ पर परीक्षण के बाद ही (जब तक कि उन्हें छूट न दी गई हो) जारी करना अनिवार्य है, और वह भी तब जब मजिस्ट्रेट इस प्रथम दृष्टया राय पर पहुंचे कि शिकायत BNSS की धारा 226 के तहत खारिज किए जाने योग्य नहीं है बल्कि अपराध का संज्ञान लिया जा सकता है।”
- अदालत ने माना कि गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद नोटिस जारी करने से ही आरोपी को शिकायतों की सामग्री का पता चलेगा और वह एक प्रभावी व सार्थक प्रतिवेदन (Effective Representation) प्रस्तुत कर सकेगा।
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CrPC और BNSS में प्रक्रियात्मक अंतर: तुलनात्मक विश्लेषण
| प्रक्रियात्मक चरण | पुरानी व्यवस्था: CrPC, 1973 | नई व्यवस्था: BNSS, 2023 |
| संज्ञान का चरण | मजिस्ट्रेट शिकायत प्राप्त होते ही CrPC की धारा 190(1)(a) के तहत संज्ञान ले लेता था, जिसके बाद धारा 200 में बयान दर्ज होते थे। | संज्ञान धारा 223(1) के तहत गवाहों के परीक्षण और आरोपी की सुनवाई के बाद लिया जाएगा। |
| आरोपी की सुनवाई का अधिकार | संज्ञान या सम्मन (धारा 204) जारी होने से पूर्व आरोपी को अदालत में खड़े होने या बहस करने का कोई विधिक अधिकार नहीं था (चंद्र देव सिंह नजीर)। | धारा 223(1) का प्रथम परंतुक: आरोपी को संज्ञान लेने से पहले सुनवाई का अवसर (Opportunity of being heard) देना अनिवार्य है। |
| शिकायत की प्रारंभिक जांच | धारा 200 व 202 के तहत जांच संज्ञान के पश्चात की प्रक्रिया मानी जाती थी। | शपथ पर परीक्षण और आरोपी की दलीलें संज्ञान लेने की पूर्व-शर्त (Pre-requisite) हैं। |
| खारिज करने की शक्ति | संज्ञान के बाद CrPC की धारा 203 के तहत शिकायत खारिज की जाती थी। | BNSS की धारा 226 के तहत शिकायत को संज्ञान से पूर्व ही खारिज किया जा सकता है। |
मामले की तथ्यात्मक एवं विधिक पृष्ठभूमि
- विधिक संदर्भ (Reference): दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल पीठों के समक्ष यह सवाल उठा था कि क्या BNSS की धारा 223 के तहत आरोपी को दिया गया सुनवाई का अधिकार संज्ञान से पहले है या संज्ञान लेने के बाद, तथा मजिस्ट्रेट को किस सटीक बिंदु पर आरोपी को नोटिस तामील करना चाहिए।
- संबद्ध पक्षकार: यह संदर्भ डॉ. रीता बख्शी, सीमा बजाज, अनीता रानी मेहरा और नीना कपूर से जुड़े निजी शिकायत मामलों से उत्पन्न हुआ था।
- केंद्र व राज्य का रुख: केंद्र सरकार और राज्य अभियोजन ने स्वीकार किया कि नए कानूनों का उद्देश्य तुच्छ, फर्जी और दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के जरिए निर्दोष नागरिकों के न्यायिक उत्पीड़न को रोकना और आरंभिक स्तर पर ही शिकायतों की छंटनी करना है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डॉ. रीता बख्शी, सीमा बजाज व अन्य बनाम राज्य व अन्य [आपराधिक संदर्भ / रिट याचिकाएं – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा (खंडपीठ)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता राकेश मल्होत्रा, राजन चावला, वरिष्ठ अधिवक्ता पवन नारंग, अधिवक्ता स्मृति वर्मा व अन्य
- राज्य (NCT of Delhi) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) अमन उस्मान एवं अधिवक्ता मानवेंद्र यादव
- भारत संघ (Union of India) की ओर से: केंद्र सरकार के स्थायी वकील (CGSC) अमित तिवारी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- धारा 223(1) (शिकायतकर्ता का परीक्षण एवं आरोपी को सुने जाने का अनिवार्य परंतुक)
- धारा 226 (शिकायत को खारिज करने की मजिस्ट्रेट की शक्ति)
- धारा 210 (मजिस्ट्रेट द्वारा अपराधों का संज्ञान)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की पूर्ववर्ती धारा 190, 200, 202 एवं 203
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया और निष्पक्ष विचारण का अधिकार)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- संबद्ध पूर्ववर्ती न्यायिक नजीरें:
- चंद्र देव सिंह बनाम प्रकाश चंद्र बोस (1963, सुप्रीम कोर्ट) — ‘CrPC के तहत आरोपी को संज्ञान और सम्मन जारी होने से पूर्व कार्यवाही में भाग लेने का कोई अधिकार नहीं था’ (BNSS 2023 द्वारा इस स्थिति को विधायी रूप से उलट दिया गया है)।
- सुब्रमण्यम स्वामी बनाम मनमोहन सिंह (2012, सुप्रीम कोर्ट) — ‘निजी शिकायत पर संज्ञान लेने से पूर्व न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग अनिवार्य है।’
- अंतिम विधिक व्यवस्था: मजिस्ट्रेट निजी शिकायत में संज्ञान लेने से पहले धारा 223(1) के तहत शिकायतकर्ता/गवाहों का शपथ पर परीक्षण करेगा और यदि मामला धारा 226 में खारिज होने योग्य नहीं दिखता, तभी आरोपी को नोटिस जारी कर उसकी दलीलें सुनेगा; इसके बाद ही विधिवत संज्ञान लिया जा सकेगा।
Examine Private Complaint: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति नवीन चावला एवं न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा |
| मुख्य विषय | BNSS की धारा 223(1) के तहत निजी शिकायतों में संज्ञान लेने का चरण और आरोपी को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया। |
| मुख्य कानूनी निष्कर्ष | शिकायतकर्ता/गवाहों की जांच और आरोपी की सुनवाई संज्ञान लेने से पहले के चरण हैं। आरोपी को नोटिस बयान दर्ज होने के बाद जारी होगा। |

