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Sabarimala Hearing: हार्वर्ड के प्रोफेसरों के लेख इतनी जगह घेरते हैं तो…एक भारतीय प्रोफेसर के लेख में क्या गलत है?, पढ़ें पूरी खबर

Sabarimala Hearing: सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला (Sabarimala) संदर्भ मामले की सुनवाई के दौरान संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) के सिद्धांत पर एक तीखी बहस देखने को मिली।

विदेशी लेखों और निवेदिता मेनन के उद्धरणों पर सवाल उठाए

सुप्रीम कोर्ट के नौ न्यायाधीशों की बेंच के सामने बहस करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तत्कालीन जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ द्वारा एडल्ट्री (व्यभिचार) को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले फैसले में इस्तेमाल किए गए ‘विदेशी लेखों’ और ‘निवेदिता मेनन’ के उद्धरणों पर सवाल उठाए। सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए 2018 के जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (Joseph Shine vs Union of India) फैसले में प्रयुक्त तर्कों और संदर्भों पर गंभीर आपत्ति जताई।

मार्टिन सीगल और निवेदिता मेनन” पर आपत्ति

  • तुषार मेहता ने कहा कि जोसेफ शाइन फैसले में मार्टिन सीगल (एक अमेरिकी वकील) और JNU की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन के लेखों को आधार बनाया गया है।
  • SG का तर्क: “मार्टिन सीगल को लगभग ‘दूसरे अंबेडकर’ की तरह उद्धृत किया गया है। उनके विचार अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिस्सा हैं, जो एक ‘कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड’ है। यह भारतीय न्यायशास्त्र (Jurisprudence) के लिए चिंताजनक है।”
  • निवेदिता मेनन पर स्टैंड: मेहता ने कहा कि प्रो. मेनन अपने भारत विरोधी बयानों के लिए जानी जाती हैं, ऐसे में उनके लेखों को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में जगह मिलना आपत्तिजनक है।

CJI सूर्यकांत का करारा जवाब

SG की आपत्ति पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक बहुत ही व्यावहारिक टिप्पणी की। अगर हार्वर्ड के उन प्रोफेसरों ने इतनी जगह घेर रखी है जिनका भारतीय समाज से कोई लेना-देना नहीं है, तो एक भारतीय प्रोफेसर (निवेदिता मेनन) के लेख में क्या गलत है?” इस पर सॉलिसिटर जनरल मुस्कुराए और सम्मानपूर्वक सहमति जताई।

‘संवैधानिक नैतिकता’ बनाम ‘सामाजिक नैतिकता

  • बहस का मुख्य बिंदु यह था कि क्या संविधान की नैतिकता समाज की स्थापित मान्यताओं (जैसे विवाह में निष्ठा) को पूरी तरह खारिज कर सकती है?
  • SG की दलील: “विवाह में निष्ठा (Fidelity) केवल पितृसत्तात्मक सोच नहीं है, यह पति-पत्नी दोनों पर लागू होती है। अगर विवाह में वफादारी को ‘यौन स्वतंत्रता पर बेड़ियाँ’ माना जाएगा, तो यह भारत का न्यायशास्त्र नहीं हो सकता।”
  • बेंच की प्रतिक्रिया: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि भारत में विवाह की अवधारणा पत्नी और पति दोनों की निष्ठा पर आधारित है। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश ने सवाल उठाया कि यदि एडल्ट्री को ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ माना जाएगा, तो एडल्ट्री के आधार पर तलाक कैसे मांगा जा सकेगा?

बहस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

पक्षदलील / टिप्पणी
तुषार मेहता (SG)एडल्ट्री को अपराध मुक्त करने के फैसले में इस्तेमाल किए गए तर्क ही सबरीमाला फैसले का आधार बने हैं, जो गलत है।
CJI सूर्यकांतधारा 497 (IPC) अपने आप में असंवैधानिक थी, उसे तो चार लाइनों में ही रद्द कर देना चाहिए था।
जस्टिस नागरत्नाविवाह और एकपत्नीत्व (Monogamy) की संस्था इसीलिए है ताकि एक से अधिक साथी न हों।
विदेशी संदर्भSG ने आपत्ति जताई कि भारतीय दार्शनिकों के बजाय केवल विदेशी वकीलों को क्यों उद्धृत किया गया।

न्यायिक समीक्षा का भविष्य

यह बहस दर्शाती है कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर अब इस बात पर मंथन शुरू हो गया है कि भारतीय कानूनों की व्याख्या करते समय विदेशी लेखों और पश्चिमी सिद्धांतों (जैसे ‘यौन गोपनीयता’ के अमेरिकी सिद्धांत) पर कितनी निर्भरता होनी चाहिए। सॉलिसिटर जनरल का तर्क था कि भारत का अपना एक सांस्कृतिक लोकाचार (Cultural Ethos) है जिसे ‘संवैधानिक नैतिकता’ के नाम पर पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता।

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