Tuesday, August 4, 2026
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Financial impropriety: सद्भावना से काम करने वाले बैंक न्यायिक जवाबदेही के दायरे में नहीं

Financial impropriety: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा, अगर बैंक सद्भावना (बोनाफाइड) के साथ अपने आर्थिक फैसले लेते हैं, तो वे अदालतों के प्रति जवाबदेह नहीं ठहराए जा सकते।

बिना ठोस सबूत के वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों को जगह नहीं

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अनुमान और बिना ठोस सबूत के वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों को अदालतों में जगह नहीं मिलनी चाहिए। न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति अजय दिगपॉल की खंडपीठ ने कहा, देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बैंकिंग सेक्टर है। अदालतों को ऐसे मामलों में जांच शुरू करने से पहले तथ्यों को परखना चाहिए। बैंक अगर ईमानदारी से काम कर रहे हैं, तो उनके आर्थिक फैसलों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

पीआईएल अदालत से खारिज

यह टिप्पणी अदालत ने उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए की, जिसमें एनजीओ ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर वॉचडॉग’ ने हयात रीजेंसी होटल के ‘वन-टाइम सेटलमेंट’ (OTS) सौदे में कथित रूप से होटल की कीमत कम आंकने और बैंकों — पंजाब नेशनल बैंक (PNB) और बैंक ऑफ महाराष्ट्र (BoM) — के खिलाफ CBI और CVC जांच की मांग की थी। अदालत ने कहा कि यह याचिका “सिर्फ अटकलों और अनुमान पर आधारित थी, जिसमें कोई ठोस सामग्री नहीं थी।”

व्यावसायिक सौदे में लाभ कमाना बैंक की कानूनी जिम्मेदारी नहीं

हाईकोर्ट ने कहा, किसी भी व्यावसायिक सौदे में लाभ कमाना बैंक की कानूनी जिम्मेदारी नहीं है। बस यह सुनिश्चित होना चाहिए कि उन्होंने आवश्यक जांच-पड़ताल और सावधानी बरती हो। “अगर ऐसा किया गया है, तो केवल इस आधार पर कि सौदा आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं रहा, अदालत उस पर सवाल नहीं उठा सकती। अटॉर्नी जनरल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि ऐसी याचिकाओं को स्वीकार करने से बैंकिंग प्रणाली अस्थिर हो सकती है और बैंक भविष्य में सही नीयत से भी व्यावसायिक फैसले लेने से कतराएंगे। अदालत ने इस तर्क से सहमति जताई और कहा कि इस तरह की जनहित याचिकाएं “ब्लैकमेलिंग के हथियार” बन सकती हैं।

हर कॉरपोरेट लेन-देन को कोर्ट में खींचना ठीक नहीं

पीठ ने कहा, “ऐसे प्रयासों को शुरू में ही रोकना आवश्यक है। हर कॉरपोरेट लेन-देन को कोर्ट में खींचना गंभीर असर डाल सकता है, कंपनी की साख और कारोबारी स्थिति पर। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता एनजीओ ने केवल एक वैल्यूएशन रिपोर्ट के आधार पर होटल के अवमूल्यन का अनुमान लगाया और मान लिया कि बैंक भी इसमें शामिल थे, जबकि कोई ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया। अंत में अदालत ने कहा कि सिर्फ अटकलों और अंशिक जानकारी के आधार पर जांच एजेंसियों से किसी कंपनी के खिलाफ जांच की मांग करना न केवल न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि इससे देश की आर्थिक स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।

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