First Education Minister: मेरे पिता पुरानी जीवनशैली में विश्वास रखते थे। उन्हें पश्चिमी शिक्षा पर कोई भरोसा नहीं था…यह शब्द स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के हैं। उनके पिता मौलाना खैरउद्दीन ने उन्हें कभी किसी मदरसे या स्कूल नहीं भेजा, बल्कि घर पर ही पढ़ाया।
एक बच्चा जिसने कभी औपचारिक कक्षा (कक्षा) में कदम नहीं रखा, उसने स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में 11 वर्षों तक आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली की मजबूत नींव रखी।
2026 में जब देश में एक बार फिर शिक्षा प्रणाली, परीक्षाओं और संस्थागत जवाबदेही पर बहस छिड़ी हुई है, तो ऐसे समय में मौलाना आज़ाद की कहानी को याद करना प्रासंगिक हो जाता है। यह कहानी यह बताने के लिए नहीं है कि डिग्रियां बेमानी हैं, बल्कि यह समझने के लिए है कि कैसे घर पर पढ़े एक विद्वान ने उन संस्थानों का निर्माण किया जिन्होंने पीढ़ियों को शिक्षित किया।
बिना स्कूल-कॉलेज के कैसे बने महाविद्वान?
1888 में मक्का में जन्मे मौलाना आज़ाद का परिवार बाद में कलकत्ता (अब कोलकाता) में बस गया। उनके पिता ने घर पर ही उनके लिए बेहतरीन विद्वानों को शिक्षक के रूप में नियुक्त किया।
- 10 साल से पहले: फ़ारसी शब्दकोश (Dictionary) पर काम शुरू किया।
- 12 से 16 साल की उम्र: फ़ारसी, अरबी, तर्कशास्त्र, दर्शन और गणित की पढ़ाई पूरी की।
- 16 साल में शिक्षक: जिस उम्र में लोग कॉलेज शुरू करते हैं, उस उम्र में वे 15 से अधिक छात्रों को दर्शन और गणित पढ़ा रहे थे।
- खुद सीखी अंग्रेजी: पारंपरिक पाठ्यक्रम को सीमित पाकर उन्होंने खुद से (Autodidacts) अंग्रेजी, आधुनिक दर्शन और विज्ञान सीखा।
पत्रकारिता को बनाया आजादी का हथियार
मौलाना आज़ाद का सार्वजनिक जीवन बहुत कम उम्र में शुरू हो गया था।
- 15 साल की उम्र में: ‘लिसान-उस्-सिद्क़’ नाम की पत्रिका का संपादन शुरू किया।
- 1912 में ‘अल-हिलाल’: इस समाचार पत्र के जरिए उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत पर सीधा हमला बोला और हिंदू-मुस्लिम एकता का आह्वान किया। अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद उन्होंने ‘अल-बलाग’ निकाला।
- 35 साल की उम्र में इतिहास: 1923 में वे कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने।
विभाजन का डटकर विरोध और जामा मस्जिद का भाषण
1930 और 1940 के दशक में जब मुस्लिम लीग ने अलग देश की मांग की, तब आज़ाद ने ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ का पुरजोर विरोध किया। उनका मानना था कि धर्म राष्ट्र का आधार नहीं हो सकता।
विभाजन के दर्दनाक दौर के बाद, उन्होंने दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों से डरे हुए मुसलमानों को संबोधित करते हुए भारत न छोड़ने और देश के निर्माण में योगदान देने की भावुक अपील की थी।
राष्ट्र निर्माण: IIT, UGC और सांस्कृतिक अकादमियों की स्थापना
आज़ाद ने जिस भारत में शिक्षा मंत्रालय संभाला, वह गरीबी और अशिक्षा से जूझ रहा था। उन्होंने समझा कि सिर्फ किताबी पढ़ाई से देश का विकास नहीं होगा, बल्कि इसके लिए वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की जरूरत है।
अंतिम विचार
मौलाना आज़ाद के जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास यही था कि जो व्यक्ति कभी किसी स्कूल की बेंच पर नहीं बैठा, उसने 11 साल का कार्यकाल एक पूरे गणराज्य के लिए इतनी बड़ी ‘कक्षा’ बनाने में बिता दिया, जिसमें आज पूरा देश पढ़ रहा है।

