हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- ‘सचिदा नंद सिंह’ मामले की नजीर (Sachida Nand Singh Precedent):अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए माना कि BNSS की धारा 379 (धारा 195(1)(b) CrPC) का बार तभी लागू होता है जब जालसाजी तब की गई हो जब दस्तावेज अदालत की हिरासत (Custodia Legis) में था।“इस मामले में, कूटरचना/जालसाजी अदालत के बाहर की गई थी।” — मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
- सिविल कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां (CPC Section 151):अदालत ने कहा कि गंभीर कूटरचना के मामले सामने आने पर सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 151 के तहत सिविल कोर्ट को शिकायत पुलिस को भेजने या निर्देश देने से नहीं रोका जा सकता।
इंदौर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर खंडपीठ) ने दीवानी मुकदमे (Civil Suit), जाली दस्तावेजों (Forged Will) के उपयोग और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 379 (पूर्ववर्ती CrPC की धारा 340) तथा धारा 215 (पूर्ववर्ती CrPC की धारा 195) के तहत प्रक्रियात्मक बाधाओं पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्पष्ट किया है।
न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की एकल पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 (पूर्ववर्ती CrPC धारा 482) के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए धरमपुरी थाने में दर्ज एफआईआर (अपराध क्रमांक 242/2026) को निरस्त करने से इनकार कर दिया। अदालत ने व्यवस्था दी है कि यदि किसी दस्तावेज (जैसे वसीयत) में जालसाजी अदालत में पेश किए जाने से पहले यानी अदालत के बाहर (Outside the Court) की गई थी, तो पुलिस द्वारा सीधे आपराधिक प्राथमिकी दर्ज करने में कोई रोक नहीं है। इसके लिए अदालत द्वारा औपचारिक शिकायत या प्रारंभिक जांच की कोई सांविधिक बाध्यता नहीं होती।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. ‘सच्चिदानंद सिंह’ और ‘इकबाल सिंह मारवाह’ संविधान पीठ के सिद्धांतों की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय सच्चिदानंद सिंह बनाम बिहार राज्य के विधिक सिद्धांतों का विश्लेषण करते हुए न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह ने कहा: “इस मामले में जालसाजी अदालत की कार्यवाही के बाहर (Outside of the Court) की गई थी। ऐसी स्थिति में BNSS की धारा 379 के तहत प्रारंभिक जांच की कोई आवश्यकता नहीं थी और पुलिस द्वारा सीधे मामला दर्ज करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है।”
- अदालत ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता / BNSS के तहत अदालत की लिखित शिकायत की अनिवार्यता केवल उन मामलों पर लागू होती है जहां दस्तावेज अदालत की अभिरक्षा (Custody of Court) में आने के बाद कूटरचित किया गया हो। यदि जालसाजी पहले ही हो चुकी थी और उस जाली दस्तावेज को अदालत में सबूत के तौर पर पेश किया गया, तो पीड़ित पक्ष या पुलिस सीधे संज्ञान ले सकती है।
2. सिविल कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां (Section 151 CPC)
- अदालत ने माना कि जब दीवानी मुकदमे में गंभीर जालसाजी का तथ्य सामने आता है, तो सिविल कोर्ट को सीपीसी की धारा 151 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए पुलिस को आपराधिक जांच या प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने से कोई कानून नहीं रोकता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (धार जिले का पारिवारिक भूमि विवाद)
- विवाद की उत्पत्ति: धार जिले की धरमपुरी तहसील अंतर्गत ग्राम लुन्हेरा खुर्द और पिपलनगरगढ़ी की कृषि भूमि को लेकर सगे भाई-बहनों के बीच स्वामित्व का विवाद चल रहा था।
- दीवानी मुकदमा (RCS No. A-34/2022): प्रतिवादी भाई-बहनों ने द्वितीय सिविल जज (सीनियर डिवीजन), धरमपुरी के समक्ष स्वत्व घोषणा (Declaration of Title) का दीवानी वाद दायर किया।
- जाली वसीयत का सहारा (Ex. D/154): मुकदमे के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अपने पिता स्वर्गीय शेरसिंह द्वारा निष्पादित एक कथित वसीयत पेश की, जिसके आधार पर याचिकाकर्ता नरेंद्र सिंह को भूमि का एकमात्र उत्तराधिकारी बताया गया। याचिकाकर्ता संख्या 3 और 4 (शिवराज सिंह और धर्मेंद्र सिंह) इसके गवाह बने थे।
- सिविल कोर्ट का फैसला (28 जुलाई 2026): सिविल जज ने साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद वसीयत को पूरी तरह ‘फर्जी और कूटरचित’ घोषित कर दिया तथा याचिकाकर्ताओं व अन्य संलिप्त व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दिया।
- दर्ज एफआईआर: सिविल कोर्ट के आदेश पर धरमपुरी थाना पुलिस ने अपराध क्रमांक 242/2026 के तहत भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 61(2) (आपराधिक षड्यंत्र), 336(3) (जालसाजी), 338 (न्यायालय के रिकॉर्ड या सार्वजनिक रजिस्टर की जालसाजी) और 340(2) (जाली दस्तावेज को असली के रूप में इस्तेमाल करना) के तहत केस दर्ज किया।
- हाईकोर्ट में चुनौती: याचिकाकर्ताओं ने धारा 528 BNSS के तहत याचिका दाखिल कर तर्क दिया कि चूंकि दस्तावेज अदालत में पेश किया गया था, इसलिए सीधे एफआईआर दर्ज कराने के बजाय अदालत को BNSS की धारा 379/215 के तहत औपचारिक प्रक्रिया का पालन करना चाहिए था।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- एफआईआर रद्द करने से इनकार: उच्च न्यायालय ने माना कि जालसाजी अदालत के बाहर घटित हुई थी, अतः पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर विधि-सम्मत है।
- याचिका खारिज: धारा 528 BNSS के तहत दायर निरस्तीकरण याचिका को गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दिया गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: नरेंद्र सिंह एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य [विविध आपराधिक याचिका – धारा 528 BNSS]
- प्रासंगिक कानून: भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 61(2), 336(3), 338 एवं 340(2); भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 215, 379 एवं 528; सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 151
- संबद्ध संविधान पीठ नजीर: सच्चिदानंद सिंह बनाम बिहार राज्य (1998) एवं इकबाल सिंह मारवाह बनाम मीनाक्षी मारवाह (2005, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ)
- पीठ: न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह (मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर पीठ)
मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (इंदौर पीठ) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति गजेन्द्र सिंह (Justice Gajendra Singh) |
| संबंधित कानून | BNS, 2023 (धारा 61(2), 336(3), 338, 340(2)) व BNSS, 2023 धारा 528 (पूर्व CrPC 482) |
| मूल मामला | सिविल कोर्ट के आदेश पर फर्जी वसीयत (Ex.D/154) के खिलाफ दर्ज अपराध (Crime No. 242/2026) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या अदालत के बाहर हुई कूटरचना में पुलिस FIR से पहले BNSS 379 की प्रक्रिया आवश्यक है? |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; अदालत से बाहर हुई जालसाजी में सीधे FIR वैध है। |

