Wednesday, November 4, 2026
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Railway Claims Tribunal: साक्षरता या वित्तीय स्थिति के आधार पर मुआवजा नहीं रोका जा सकता;रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल नियमों को सीमित का दिया आदेश

हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  • अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन:अदालत ने माना कि साक्षरता या गरीबी के आधार पर दावेदारों के बीच भेद करना असंवैधानिक है:“नियम 5.1 और 5.4.1(i) को जोड़कर दावेदारों के बीच उनकी साक्षरता और वित्तीय स्थिति के आधार पर एक कृत्रिम विभाजन किया गया है। विधायिका का उद्देश्य कभी भी सीमित लाभ देना नहीं था। 90% राशि रोकना एक बाधा उत्पन्न करता है, जिसे अनुच्छेद 14 के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता।” — इलाहाबाद हाईकोर्ट
  • जन धन योजना और आधार क्रांति का असर:पीठ ने कहा कि जन धन योजना और आधार-लिंक्ड बैंकिंग प्रणाली के विस्तार के बाद अब यह धारणा सही नहीं है कि अशिक्षित या गरीब दावेदार अपनी अधिकतम ₹8 लाख की मुआवजा राशि का प्रबंधन नहीं कर सकते।
  • कल्याणकारी कानून की मंशा:रेलवे अधिनियम, 1989 (अध्याय XIII) और रेलवे दावा अधिकरण अधिनियम, 1987 एक जनकल्याणकारी कानून हैं। अधीनस्थ नियम मूल अधिनियम के तहत मिले वैधानिक अधिकारों को छीन नहीं सकते।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेलवे दुर्घटनाओं में पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे के वितरण, वित्तीय समावेशन और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत वर्गीकरण की वैधता पर एक अत्यंत प्रगतिशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने रेलवे दुर्घटना और अप्रिय घटना (मुआवजा) नियमावली, 1990 के नियम 5.1 को ‘रीड डाउन’ (Read Down) करते हुए निर्देश दिया कि नाबालिगों (Minors) और विकृतचित्त व्यक्तियों (Persons of Unsound Mind) के मामलों को छोड़कर अन्य सभी बालिग दावेदारों को मुआवजे की पूरी 100% राशि सीधे उनके बैंक खातों में तुरंत जारी की जाए तथा पूर्व में एफडी में रखी गई राशियों को भी तत्काल रिलीज किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया है कि रेलवे दावा न्यायाधिकरण (RCT) किसी दावेदार की निरक्षरता, अशिक्षा या कमजोर वित्तीय स्थिति का हवाला देकर उसे मिलने वाले मुआवजे का 90% हिस्सा जबरन सावधि जमा (Fixed Deposit – FD) में नहीं रोक सकता। अदालत ने माना कि यह वर्गीकरण समाज के गरीब और अनपढ़ वर्ग के खिलाफ एक कृत्रिम बाधा (Artificial Barrier) खड़ी करता है जो असंवैधानिक है।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. साक्षरता और अमीरी-गरीबी के आधार पर भेदभाव असंवैधानिक रेलवे मुआवजा नियमावली, 1990 के नियम 5.1 और 5.4.1 के प्रभाव का विश्लेषण करते हुए न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा: “नियम 5.1 और नियम 5.4.1(i) को शामिल करके दावेदारों के बीच उनकी साक्षरता और वित्तीय स्थिति के आधार पर एक अनुचित भेद पैदा किया गया है। 1990 के नियम बनाते समय विधायिका का यह इरादा कभी नहीं था कि दावेदारों को सीमित लाभ दिया जाए। स्वीकृत मुआवजे की 90 प्रतिशत राशि को जबरन रोकना दावेदारों के बीच एक भेदभावपूर्ण बाधा खड़ी करता है, जिनके साथ साक्षरता या वित्तीय स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।”

2. मूल कानून के लाभ को अधीनस्थ नियम सीमित नहीं कर सकते

  • अदालत ने रेखांकित किया कि रेलवे दावा न्यायाधिकरण अधिनियम, 1987 और रेलवे अधिनियम, 1989 का अध्याय XIII एक कल्याणकारी कानून (Beneficial Legislation) है जिसका उद्देश्य पीड़ित यात्रियों या उनके आश्रितों को तत्काल राहत पहुंचाना है।
  • न्यायालय ने कहा कि एक बार जब मूल कानून का उद्देश्य दुर्घटना के पीड़ितों को पूरा मुआवजा देना स्पष्ट है, तो अधीनस्थ नियम (Subordinate Legislation) उस वैधानिक अधिकार में कटौती नहीं कर सकते।

3. जनधन योजना और डिजिटल बैंकिंग के दौर में पुरानी धारणाएं अप्रासंगिक

  • अदालत ने नोट किया कि यद्यपि नियम 5 की शुरुआत दिल्ली हाईकोर्ट के गीता देवी बनाम भारत संघ फैसले में बिचौलियों और दलालों से पीड़ितों को बचाने के नेक इरादे से हुई थी, लेकिन वर्तमान समय में परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं।
  • पीठ ने व्यवस्था दी कि प्रधानमंत्री जन-धन योजना और प्रत्यक्ष बैंक हस्तांतरण (DBT) के व्यापक प्रसार के बाद यह मान लेना कि गरीब या अशिक्षित व्यक्ति अधिकतम ₹8 लाख तक के मुआवजे का प्रबंधन नहीं कर सकता, अब पूरी तरह निराधार है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (90% मुआवजा एफडी में रोकने की चुनौती)

  • याचिकाकर्ताओं की स्थिति: याचिकाकर्ता रेल दुर्घटनाओं में मारे गए यात्रियों के गरीब आश्रित या स्वयं गंभीर रूप से घायल यात्री थे, जिनके पक्ष में रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल (RCT) ने मुआवजे का आदेश पारित किया था।
  • ट्रिब्यूनल का विवादित आदेश: आरसीटी ने 1990 की नियमावली के नियम 5 का सहारा लेते हुए दावेदारों को केवल 10% नकद राशि जारी की और शेष 90% राशि को उनकी निरक्षरता या वित्तीय सुभेद्यता का हवाला देते हुए लंबी अवधि के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में जमा करने का आदेश दे दिया।
  • संवैधानिक चुनौती: पीड़ितों ने अधिवक्ता पशुपति नाथ पांडे के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल कर नियम 5 की संवैधानिक वैधता को संविधान के अनुच्छेद 14 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश और निर्देश

  1. नियम 5.1 का निर्वचन (Read Down): उच्च न्यायालय ने नियम 5.1 और 5.4.1 के उस हिस्से को निष्प्रभावी घोषित किया जो ट्रिब्यूनल को दावेदारों की साक्षरता और वित्तीय स्थिति का आकलन करने तथा वयस्क दावेदारों के मुआवजे को एफडी में रोकने का अधिकार देता था।
  2. पूरी राशि तत्काल जारी करने का आदेश:
    • नाबालिगों और मानसिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को छोड़कर सभी सक्षम वयस्कों को संपूर्ण मुआवजा राशि जारी की जाएगी।
    • ट्रिब्यूनल द्वारा पूर्व में बैंकों में एफडी के रूप में रोकी गई समस्त 90% राशियों को भी बिना किसी देरी के तुरंत दावेदारों के बैंक खातों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: रेलवे दावा मुआवजा वितरण बैच याचिकाएं (नियम 5.1 की संवैधानिक वैधता)
  • प्रासंगिक कानून: रेलवे दुर्घटना और अप्रिय घटना (मुआवजा) नियमावली, 1990 का नियम 5.1 एवं नियम 5.4.1; रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 123, 124 एवं 124A; रेलवे दावा न्यायाधिकरण अधिनियम, 1987; भारत का संविधान – अनुच्छेद 14
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता पशुपति नाथ पांडे
    • रेलवे/प्रतिवादी की ओर से: अधिवक्ता गौरव बिशन
  • पीठ: न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)

Railway Claims Tribunal: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल (Justice Rohit Ranjan Agarwal)
संबंधित नियमरेलवे दावा अधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 1990 (नियम 5.1 और 5.4.1)
मूल मुद्दाRCT द्वारा अशिक्षित/गरीब पीड़ितों का 90% मुआवजा राशि फिक्स्ड डिपॉजिट में रोकना।
संविधान का प्रावधानअनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता)
अदालत का फैसलानियम 5.1 को ‘रीड डाउन’ किया गया; बैंक खातों में रोकी गई 90% राशि तुरंत जारी करने का आदेश।
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