Monday, August 24, 2026
HomeDelhi High CourtArbitral Tribunal: व्हाट्सएप (WhatsApp) पर मिली आर्बिट्रेशन फैसले की कॉपी पर कहा...

Arbitral Tribunal: व्हाट्सएप (WhatsApp) पर मिली आर्बिट्रेशन फैसले की कॉपी पर कहा थैंक्स, तो बाद में मुकर नहीं सकते…संपत्ति विवाद का केस पढ़ें

Arbitral Tribunal: पारिवारिक संपत्ति विवादों और डिजिटल साक्ष्यों की कानूनी मान्यता को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बेहद दूरगामी और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस हरीश वैद्यानाथन शंकर की एकल पीठ ने साफ किया कि व्हाट्सएप पर दी गई रसीद और उसके बाद का आचरण (Conduct) यह साबित करने के लिए काफी है कि पक्षकार को फैसले की पूरी जानकारी थी। कोर्ट ने कहा कि कानून किसी को भी एक ही समय में ‘हाँ और ना’ यानी ‘एप्रोबेट एंड रीप्रोबेट’ (Approbate and Reprobate) करने की इजाजत नहीं देता।

फैसले की ‘हस्ताक्षरित प्रति’ नहीं मिलने का तकनीकी बहाना

अदालत ने कहा, “डिजिटल युग में अगर कोई पक्षकार किसी मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) के फैसले (Arbitral Award) की कॉपी व्हाट्सएप (WhatsApp) ग्रुप पर प्राप्त करने की पुष्टि (Acknowledgment) कर देता है और ‘नोटेड थैंक्स’ (Noted thanks) लिखकर उस फैसले को लागू करने की प्रक्रिया में शामिल हो जाता है, तो वह बाद में कानूनी दांव-पेंच का सहारा लेकर अपनी बात से मुकर नहीं सकता। ऐसा पक्षकार बाद में यह तकनीकी बहाना नहीं बना सकता कि उसे फैसले की ‘हस्ताक्षरित प्रति’ (Signed Copy) नहीं मिली थी, इसलिए अपील करने की समय-सीमा (Limitation Period) शुरू नहीं हुई।

मामला क्या है?: मवांडिया परिवार का आपसी संपत्ति विवाद

यह मामला मवांडिया परिवार के भाइयों के बीच पारिवारिक व्यवसाय और संपत्तियों के बंटवारे से जुड़ा है।

विवाद और मध्यस्थता: भाइयों (विनय, बिमल और बिजय मवांडिया) के बीच 2019 में संपत्तियों के विभाजन को लेकर एक समझौता (MoU) हुआ था। बाद में विवाद बढ़ने पर जून 2021 में मामला मध्यस्थता (Arbitration) के लिए भेजा गया।

अंतरिम फैसला (2021): मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने 13 नवंबर, 2021 को दो संपत्तियों को लेकर एक अंतरिम फैसला (Interim Award) सुनाया। न्यायाधिकरण ने इस फैसले की कॉपी को मवांडिया परिवार के उस व्हाट्सएप ग्रुप में अपलोड कर दिया, जो विशेष रूप से इस विवाद को सुलझाने के लिए बनाया गया था।

व्हाट्सएप पर जवाब: इस मैसेज को देखकर विनय मवांडिया (याचिकाकर्ता) ने ग्रुप में जवाब दिया— “नोटेड थैंक्स” (Noted thanks)। इसके बाद भाइयों के बीच फैसले को लागू करने के लिए गिफ्ट डीड, ट्रांसफर डीड और बैंक से एनओसी (NOC) लेने जैसी प्रक्रियाओं पर लगातार व्हाट्सएप पर चर्चा चलती रही, जिसमें विनय ने सक्रिय रूप से भाग लिया और संशोधन भी सुझाए।

कानूनी पैंतरा: जब मामला फंसा तो ‘साइंड कॉपी’ का लिया सहारा

विवाद तब बढ़ा जब बिमल और बिजय मवांडिया ने इस फैसले को लागू कराने के लिए कोर्ट में निष्पादन याचिका (Execution Petition) दायर की। इसके जवाब में विनय मवांडिया ने साल 2024 में (लगभग 3 साल बाद) आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 34 के तहत इस फैसले को रद्द करने के लिए हाई कोर्ट में याचिका लगा दी।

विनय का तर्क: विनय ने अदालत में दलील दी कि आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 31(5) के तहत उन्हें फैसले की कोई आधिकारिक ‘हस्ताक्षरित प्रति’ (Signed Copy) नहीं सौंपी गई थी। इसलिए, व्हाट्सएप पर मैसेज आने से अपील करने की वैधानिक समय-सीमा (Limitation Period – जो आमतौर पर 3 महीने होती है) शुरू नहीं मानी जा सकती। उन्होंने दावा किया कि उन्हें फैसले की वास्तविक जानकारी तब हुई जब उनके खिलाफ निष्पादन की कार्यवाही शुरू हुई। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि फैसले पर तीन में से केवल दो ही मध्यस्थों (Arbitrators) के हस्ताक्षर थे।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: ‘यह केवल फॉर्मल रिस्पॉन्स नहीं था’

जस्टिस हरीश वैद्यानाथन शंकर ने विनय मवांडिया की इन सभी तकनीकी दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने व्हाट्सएप चैट के रिकॉर्ड को देखने के बाद कहा, रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि व्हाट्सएप ग्रुप में अवार्ड अपलोड होने के तुरंत बाद याचिकाकर्ता ने ‘नोटेड थैंक्स’ लिखकर इसकी प्राप्ति स्वीकार की थी। यह केवल एक औपचारिक (Formal) जवाब नहीं था, बल्कि इसके बाद पार्टियों के बीच अवार्ड को लागू करने को लेकर लगातार बातचीत हुई। इन चर्चाओं में याचिकाकर्ता ने न केवल सक्रिय रूप से भाग लिया, बल्कि ट्रांसफर दस्तावेजों को निष्पादित करने के लिए शर्तें रखीं और डीड के ड्राफ्ट में संशोधन भी सुझाए। यह आचरण अकाट्य रूप से स्थापित करता है कि याचिकाकर्ता ने अवार्ड के अस्तित्व को स्वीकार किया था और होशोहवास में उस पर काम किया था।”

कोर्ट के महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत: परिवर्तित मन (Change of Heart) की कानून में जगह नहीं: कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति और सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए फैसले की पवित्रता बहुत अधिक होती है। बिना किसी धोखाधड़ी या जबरदस्ती के, कोई भी पक्ष सिर्फ इसलिए फैसले से पीछे नहीं हट सकता क्योंकि बाद में उसका मन बदल गया है।

समय-सीमा की घोर अनदेखी: अदालत ने माना कि विनय को नवंबर 2021 में ही फैसले की पूरी जानकारी थी। इसके बावजूद उन्होंने 2024 में याचिका दायर की, जो कि कानूनन पूरी तरह ‘टाइम-बार्ड’ (Limitation से बाहर) है।

अदालत ने विनय मवांडिया की याचिका को भारी कानूनी देरी और विरोधाभासी आचरण के कारण पूरी तरह खारिज कर दिया। मामले में विनय मवांडिया की ओर से अधिवक्ता अमित भगत और आरजू राज पेश हुए थे, जबकि बिमल और बिजय का पक्ष अधिवक्ता नियति कोहली, ऋषभ पारिख और प्रथम वीर अग्रवाल ने रखा।

केस शीट: दिल्ली उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस हरीश वैद्यानाथन शंकर
मामले का शीर्षकविनय मवांडिया बनाम बिमल मवांडिया व अन्य
मूल विधिक कानूनमध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (धारा 34 और धारा 31(5))
मुख्य कानूनी विषयक्या व्हाट्सएप पर डिजिटल रसीद और आचरण ‘साइंड कॉपी’ की तकनीकी अनिवार्यता को प्रतिस्थापित कर सकते हैं?
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका खारिज; व्हाट्सएप पावती और फैसले के क्रियान्वयन में भागीदारी के बाद देर से दी गई चुनौती कानूनन मान्य नहीं है।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
overcast clouds
33 ° C
33 °
33 °
66 %
5.7kmh
97 %
Mon
33 °
Tue
33 °
Wed
34 °
Thu
34 °
Fri
33 °

Recent Comments