Paramilitary Forces: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अर्धसैनिक बलों के भीतर अनुशासन, सत्ता के दुरुपयोग और अधीनस्थ जवानों के शोषण को लेकर एक बेहद संवेदनशील और युगांतकारी विधिक निर्णय सुनाया है।
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ (Division Bench) ने कांस्टेबल की सेवामुक्ति के आदेश को रद्द करते हुए उसे ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ (Compulsory Retirement) में बदल दिया है, जिससे अब उसे उसके 11 साल के सेवाकाल के सभी सेवानिवृत्ति और वित्तीय लाभ (Service & Pensionary Benefits) मिल सकेंगे। अदालत ने भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के एक कांस्टेबल को बड़ी विधिक राहत दी है, जिसे उसके असिस्टेंट कमांडेंट (सीनियर अधिकारी) की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में 2010 में नौकरी से बर्खास्त (Remove from Service) कर दिया गया था।
क्या था पूरा मामला? (The Sordid Scandal at Leh)
यह मामला वर्ष 2006 से 2009 के बीच का है, जब पीड़ित कांस्टेबल लेह (लद्दाख) में आईटीबीपी के एक असिस्टेंट कमांडेंट के आधिकारिक आवास पर ‘सुरक्षा सहायक’ (Security Assistant) के रूप में तैनात था।
सीनियर अधिकारी की घिनौनी साजिश: मामले के अनुसार, असिस्टेंट कमांडेंट ने खुद अपनी पत्नी को शराब पिलाकर कांस्टेबल को उसके साथ अवैध कृत्य करने के लिए मजबूर किया था। इतना ही नहीं, उस अधिकारी ने अपने लैपटॉप की मदद से इस पूरे कृत्य की फिल्म (CD) भी रिकॉर्ड की थी। कांस्टेबल ने जब भी इसका विरोध करने की कोशिश की, उसे गंभीर दंडात्मक कार्रवाई और कोर्ट-मार्शल की धमकियां दी गईं।
तलाक और शिकायतों का दौर: इस घिनौने सच का खुलासा तब हुआ जब असिस्टेंट कमांडेंट ने अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक की अर्जी दायर की। इसके जवाब में पत्नी ने अपने पति और कांस्टेबल दोनों के खिलाफ यौन, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई। उसने आरोप लगाया कि उसके पति ने ही कांस्टेबल को उसके साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर किया और फिल्म बनाई।
सजा में विधिक असमानता (Disparity in Punishment): आईटीबीपी के आंतरिक कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के बाद कांस्टेबल को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। वहीं दूसरी तरफ, मुख्य साजिशकर्ता असिस्टेंट कमांडेंट को केवल ‘दो साल के लिए वेतन वृद्धि रोकने’ (Stoppage of Increment for two years) की बेहद मामूली सजा दी गई, क्योंकि उस पर पत्नी को मजबूर करने का आरोप तो सिद्ध नहीं हुआ लेकिन अपने लैपटॉप पर उस यौन कृत्य की रिकॉर्डिंग करने का दोषी पाया गया।
हाई कोर्ट का विधिक रुख: ‘अनुशासन जरूरी, लेकिन सजा में भेदभाव अवैध’
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कांस्टेबल द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए आईटीबीपी के इस दोहरे रवैये पर कड़ी विधिक आपत्ति जताई।
जब सीनियर ही दोषी, तो जूनियर को इतनी सख्त सजा क्यों?
खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया। कहा, “जब यह स्थापित हो चुका है कि वरिष्ठ अधिकारी (Assistant Commandant) अपने लैपटॉप की मदद से सीडी तैयार करने और अपने कनिष्ठ (Junior) को इस कदाचार के लिए मजबूर करने का दोषी था, तो वर्तमान अपीलकर्ता (कांस्टेबल) को सेवा से हटाने जैसी गंभीर और क्रूर सजा नहीं दी जा सकती। सजा का यह असंतुलन विधिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।”
अनुशासित बल के जवान से आत्मनियंत्रण की अपेक्षा
हालांकि, अदालत ने कांस्टेबल को पूरी तरह क्लीन चिट नहीं दी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि एक अनुशासित बल (Disciplined Force) के सदस्य के रूप में याचिकाकर्ता से अपने दिमाग और वासना पर नियंत्रण रखने की अपेक्षा की जाती थी। उसने अपने आत्मनियंत्रण, कर्मठता और इच्छाशक्ति को पूरी तरह ताक पर रख दिया था।
धमकी और मजबूरी का विधिक सच
लेकिन कोर्ट ने इस तथ्य को भी प्रमुखता से स्वीकार किया कि यह संबंध असिस्टेंट कमांडेंट की शह और साजिश के तहत शुरू हुआ था। अधिकारी की पत्नी ने भी लंबे समय तक स्वेच्छा से संबंध बनाए रखे और जब भी कांस्टेबल ने पीछे हटने का प्रयास किया, उसे वर्दी और नौकरी छीनने की सीधी विधिक धमकी दी गई।
अदालत का अंतिम विधिक आदेश और राहत
हाई कोर्ट ने माना कि यह मामला बेहद घिनौना (Sordid) था, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए सेवा से हटाने की सजा पूरी तरह अनुचित थी। चूंकि कांस्टेबल ने 1999 में बल ज्वाइन किया था और 2010 तक सेवा की थी, इसलिए कोर्ट ने न्याय का संतुलन बनाने के लिए आदेश दिए। कांस्टेबल की ‘सेवा से बर्खास्तगी’ के आदेश को संशोधित कर ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ में बदला जाता है। विभाग कांस्टेबल को इस अनिवार्य सेवानिवृत्ति के परिणामस्वरूप मिलने वाले सभी आनुषंगिक विधिक लाभ (Consequential Benefits) और पेंशन का भुगतान करे।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक/मुख्य बिंदु | हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (जून 2026) |
| माननीय न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी। |
| याचिकाकर्ता | आईटीबीपी कांस्टेबल (सेवाकाल: 1999-2010)। |
| मूल विवाद | सीनियर अधिकारी की साजिश और धमकी के कारण उसकी पत्नी से संबंध बनाने पर कांस्टेबल की बर्खास्तगी। |
| विधिक विसंगति | वीडियो बनाने वाले मुख्य आरोपी अधिकारी को केवल 2 साल इंक्रीमेंट रोकने की सजा, जबकि मजबूर जवान को नौकरी से निकाला गया। |
| संशोधित विधिक सजा | अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) के साथ पूर्ण पेंशनरी लाभ। |
| विधिक प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट विनोद कुमार शर्मा; केंद्र सरकार की ओर से डिप्टी सॉलिसिटर जनरल बलराम शर्मा। |

