Overcrowding In Court: कर्नाटक हाईकोर्ट में अदालतों के भीतर वकीलों के बैठने की जगह की कमी और बढ़ती अत्यधिक भीड़ (Overcrowding) को लेकर एक दिलचस्प और गंभीर विधिक बहस देखने को मिली।
हाईकोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 14 का हाल
हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने वरिष्ठ वकीलों से इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए व्यावहारिक विधिक सुझाव मांगे और स्पष्ट किया कि वकीलों के विधिक कार्य में बाधा डालने वाली इस भीड़ को कम करने के लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे। कोर्ट रूम नंबर 14 में पीठ (Bench) और बार (Bar) के बीच हुए इस विधिक संवाद में जजों की अत्यधिक कार्यशैली, वकीलों की परेशानी और कानून की पढ़ाई कर रहे इंटर्न्स (Interns) के अदालती आचरण पर खुलकर चर्चा हुई।
इंटर्न्स के आचरण पर तल्ख विधिक टिप्पणी: ‘कॉलेज में बुनियादी बातें नहीं सिखाई जातीं’
बहस के दौरान कोर्ट रूम में इंटर्न्स (विधिक प्रशिक्षण ले रहे छात्र) द्वारा वरिष्ठ वकीलों के लिए कुर्सियां खाली न करने का मुद्दा जोर-शोर से उठा। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना का रुख: जब कोर्ट को बताया गया कि इंटर्न्स वकीलों को जगह नहीं देते, तो जज साहब ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं इन इंटर्न्स का क्या करूं? इन्हें कोर्ट आने से मना कर दें? वे अदालती कुर्सियों पर कब्जा (Occupy) करके नहीं बैठ सकते।” वरिष्ठ अधिवक्ता के. एन. फनींद्र की चिंता: उन्होंने कोर्ट रूम में जगह और कुर्सियों की भारी कमी का मुद्दा उठाते हुए कहा, “मुझे खुद इंटर्न्स से खड़े होने और कुर्सी देने का अनुरोध करना पड़ा। दुर्भाग्यपूर्ण है कि कॉलेजों में उन्हें यह बुनियादी विधिक शिष्टाचार (Basic Etiquette) नहीं सिखाया जाता, लेकिन उन्हें सीधे हाई कोर्ट में इंटर्नशिप के लिए भेज दिया जाता है।”
भीड़ बढ़ने के मुख्य कारण और वकीलों के सुझाव
- सीनियर एडवोकेट के. एन. फनींद्र और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) अरविंद कामथ ने कोर्ट के सामने भीड़ बढ़ने के व्यावहारिक कारण और सुझाव रखे।
- मल्टीपल कॉज-लिस्ट (Cause List) की समस्या: फनींद्र ने सुझाव दिया कि कोर्ट को अलग-अलग कॉज-लिस्ट (जैसे फ्रेश मामले, पुराने मामले आदि) के बजाय केवल एक ही एकीकृत सूची रखनी चाहिए और मामलों को बिना आगे-पीछे किए क्रमानुसार (Predictably) सुनना चाहिए।
- लंच के बाद मुकदमों की भीड़: दोपहर के भोजन के बाद उन मुवक्किलों (Litigants) की भीड़ बहुत बढ़ जाती है जो आपसी समझौते या निपटारे (Settlement) के लिए आते हैं। वे वकीलों के निकलने तक का रास्ता नहीं छोड़ते।
- समय का विभाजन: एएसजी अरविंद कामथ ने सुझाव दिया कि कॉज-लिस्ट को सुबह और दोपहर (आफ्टरनून सेशन) के मामलों में विभाजित किया जाना चाहिए, ताकि वकील अपने समय के अनुसार ही कोर्ट रूम में आएं।
हाई कोर्ट का व्यावहारिक विधिक समाधान और जजों का कार्यभार
जस्टिस नागप्रसन्ना ने वकीलों के कई सुझावों पर अपनी विधिक और व्यावहारिक व्यावहारिक असहमतियां भी जताईं, लेकिन त्वरित राहत के लिए एक बड़ा विधिक फॉर्मूला दिया।
समझौते वाले मुवक्किलों की एंट्री पर 4 बजे तक रोक
कोर्ट रूम की 25 प्रतिशत भीड़ को तुरंत कम करने के लिए जस्टिस नागप्रसन्ना ने विधिक निर्देश दिया। कहा, हम एक काम करेंगे। आपसी समझौते (Settlement) के लिए आने वाले किसी भी पक्षकार को शाम 4 बजे से पहले कोर्ट रूम के भीतर नहीं आने दिया जाएगा। हम पुलिसकर्मियों को तैनात करेंगे और कहेंगे कि सेटलमेंट वाले पक्षकार 4 बजे तक कोर्ट हॉल के बाहर रहें। इससे 25% भीड़ तुरंत साफ हो जाएगी।
फ्रेश मामलों की दैनिक सुनवाई से बढ़ी भीड़
जज ने याद दिलाया कि पहले जब सप्ताह में केवल कुछ दिन ही नए (Fresh) मामले सुने जाते थे, तब भीड़ कम होती थी। लेकिन वकीलों की ही मांग पर जब से रोजाना 75-100 नए मामलों को सुनना अनिवार्य किया गया है, तब से कॉज-लिस्ट लंबी और जटिल हो गई है, जिससे भीड़ का बढ़ना स्वाभाविक है।
जजों पर काम का अत्यधिक दबाव (Overworking)
अदालती मामलों के प्रबंधन (Case Management) की चुनौतियों को साझा करते हुए जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा कि यह जजों के लिए बहुत कठिन काम है। उन्होंने भावुक होकर कहा, हम सभी अपनी क्षमता से अधिक काम (Overworking) कर रहे हैं। मैं रात को 9:30 बजे कोर्ट से घर जाता हूँ। उसके बाद मुझे घर जाकर अगले दिन की अदालती फाइलों को पढ़ना पड़ता है।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक/मुख्य बिंदु | कर्नाटक उच्च न्यायालय की अदालती कार्यवाही (जून 2026) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एम. नागप्रसन्ना (कर्नाटक हाई कोर्ट, कोर्ट रूम 14)। |
| विवाद का विषय | कोर्ट रूम के भीतर वकीलों के लिए जगह की कमी, इंटर्न्स का व्यवहार और अत्यधिक भीड़। |
| तय विधिक निर्देश (तात्कालिक) | समझौते (Settlement) से जुड़े मुवक्किलों की कोर्ट रूम में शाम 4 बजे तक नो-एंट्री; पुलिस को सख्त निर्देश। |
| इंटर्न्स के लिए विधिक रुख | वे वकीलों के बैठने वाली मुख्य कुर्सियों पर अधिकार नहीं जता सकते; कोर्ट रूम शिष्टाचार अनिवार्य। |
| भविष्य की विधिक योजना | एएसजी अरविंद कामथ के सुझाव पर ‘ट्रायल एंड एरर’ (Trial-and-Error) पद्धति से अन्य समाधान तलाशे जाएंगे। |

