Tuesday, October 27, 2026
HomeConsumer NewsInsurance Claim: पति की मृत्यु के बाद क्लिनिकल डिप्रेशन परिसीमा में देरी...

Insurance Claim: पति की मृत्यु के बाद क्लिनिकल डिप्रेशन परिसीमा में देरी माफ करने का पर्याप्त कारण; बीमा दावे में 250 दिनों का विलंब किया माफ, जानिए

FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp

मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?

  1. पति की अचानक मृत्यु और मेडिक्लेम क्लेम:याचिकाकर्ता प्रिया मेहरोत्रा के पति डॉ. सौरभ मेहरोत्रा (पेशे से दंत चिकित्सक) 16 अगस्त 2021 को अचानक बीमार पड़ गए थे। उन्हें कुकरेजा अस्पताल, सर गंगा राम अस्पताल और बाद में यकृत एवं पित्त विज्ञान संस्थान (ILBS) ले जाया गया, जहाँ लिवर की गंभीर क्षति के कारण 27 अक्टूबर 2021 को उनका निधन हो गया।
  2. बीमा कंपनी द्वारा क्लेम खारिज करना (जनवरी 2022):प्रिया मेहरोत्रा ने टाटा एआईजी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत इलाज पर खर्च हुए ₹25.73 लाख के पुनर्भुगतान (Reimbursement) का दावा किया। हालांकि, बीमा कंपनी ने जनवरी 2022 में यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि सिरोसिस (Cirrhosis) का इलाज पॉलिसी की 2 साल की वेटिंग अवधि के तहत आता है।
  3. जिला आयोग द्वारा खारिज याचिका (फरवरी 2026):बीमा लोकपाल (Ombudsman) से राहत न मिलने पर प्रिया मेहरोत्रा ने जिला उपभोक्ता आयोग का रुख किया। हालांकि, 2 फरवरी 2026 को जिला आयोग ने शिकायत को समय-सीमा पार (Time-barred) होने के आधार पर खारिज कर दिया। इसके खिलाफ उन्होंने राज्य आयोग में अपील दायर की।

राज्य आयोग के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

1. “मानसिक स्थिति देरी का न्यायसंगत स्पष्टीकरण है”:

आयोग ने सीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 69 (जो शिकायत दर्ज करने हेतु 2 वर्ष की समय-सीमा निर्धारित करती है) का विश्लेषण करते हुए माना: “रिकॉर्ड के अवलोकन से, हम पाते हैं कि जिला आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज करने में 250 दिनों की देरी हुई है, जिसके लिए अपीलकर्ता ने पर्याप्त कारण दिया है कि वह अपने पति के निधन के बाद नैदानिक अवसाद (Clinical Depression) का इलाज करा रही थी। इसलिए, न्याय के हित में देरी को माफ करना उचित होगा।”

2. तकनीकी आधार पर न्याय से वंचित न करना:

  • राज्य आयोग ने प्रिया मेहरोत्रा द्वारा पेश किए गए मेडिकल पर्चों (Medical Prescriptions) को स्वीकार किया और पाया कि अवसाद और मानसिक आघात के कारण वे समय पर कानूनी कार्रवाई करने में असमर्थ थीं।

नई दिल्ली: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (CPA, 2019) की धारा 69 (शिकायत दाखिल करने की दो वर्ष की परिसीमा अवधि व पर्याप्त कारण होने पर विलंब माफी / Condonation of Delay), परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) की धारा 5 (‘पर्याप्त कारण’ / Sufficient Cause का मानवीय व उदारवादी दृष्टिकोण), जीवनसाथी के निधन के उपरांत गंभीर मनोवैज्ञानिक आघात (Clinical Depression) की साक्ष्यिक स्वीकार्यता, तथा स्वास्थ्य बीमा दावों में ‘वेटिंग पीरियड’ के आधार पर अस्वीकृति की मेरिट पर सुनवाई की अनिवार्यता पर दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक संवेदनशील और मानवीय विधिक व्यवस्था दी है।

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग की अध्यक्षा न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल (Justice Sangita Dhingra Sehgal) और सदस्या बिमला कुमारी की खंडपीठ ने 7 अक्टूबर 2026 को दिए गए अपने आदेश में जिला उपभोक्ता आयोग के 2 फरवरी 2026 के उस आदेश को निरस्त (Set Aside) कर दिया, जिसने याचिकाकर्ता की शिकायत को समय-बाधित (Time-barred) मानते हुए खारिज कर दिया था।

राज्य आयोग ने प्रिया मेहरोत्रा द्वारा प्रस्तुत मेडिकल पर्चियों और मनोचिकित्सीय उपचार के रिकॉर्ड को स्वीकार करते हुए शिकायत दाखिल करने में हुए 250 दिनों के विलंब को माफ कर दिया। आयोग ने जिला उपभोक्ता आयोग को निर्देश दिया कि वह टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा खारिज किए गए ₹25.73 लाख के मेडिकल क्लेम की शिकायत पर अगले तीन महीनों के भीतर गुण-दोष (Merits) के आधार पर अंतिम निर्णय पारित करे।

राज्य उपभोक्ता आयोग के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘क्लिनिकल डिप्रेशन का उपचार देरी का पर्याप्त और वैध कारण’

न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल और सदस्या बिमला कुमारी की पीठ ने परिसीमा माफी के कानूनी मानकों का विश्लेषण करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट किया: “अभिलेखों के अवलोकन से हम पाते हैं कि जिला आयोग के समक्ष शिकायत दाखिल करने में 250 दिनों का विलंब हुआ है, जिसके लिए अपीलकर्ता ने पर्याप्त कारण (Sufficient Cause) प्रस्तुत किया है—अर्थात वह अपने पति के निधन के उपरांत क्लिनिकल डिप्रेशन (Clinical Depression) के उपचार से गुजर रही थीं। अतः न्याय के हित में अपीलकर्ता की शिकायत दाखिल करने में हुई देरी को माफ करना सर्वथा उचित होगा। विलंब को माफ करते हुए, जिला आयोग को निर्देश दिया जाता है कि वह उक्त शिकायत का गुण-दोष (Merits) के आधार पर तीन माह में निस्तारण करे।”

2. धारा 69 CPA, 2019 बनाम धारा 5 परिसीमा अधिनियम:

  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 69(1) के तहत वाद हेतुक (Cause of Action) उत्पन्न होने की तिथि से दो वर्ष के भीतर शिकायत दाखिल करना अनिवार्य है।
  • हालांकि, धारा 69(2) आयोग को यह विशेषाधिकार देती है कि यदि शिकायतकर्ता के पास निर्धारित समय के भीतर न आ पाने का ‘पर्याप्त कारण’ (Sufficient Cause) मौजूद है, तो कारणों को दर्ज करते हुए देरी को माफ किया जा सकता है।
  • राज्य आयोग ने माना कि पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद एक विधवा का मानसिक अवसाद और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग से गुजरना कोई काल्पनिक बहाना नहीं, बल्कि एक अकाट्य चिकित्सीय वास्तविकता है, जिसे ‘पर्याप्त कारण’ के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।

3. बीमा अस्वीकृति की मेरिट पर आयोग का रुख:

  • राज्य आयोग ने स्पष्ट किया कि उसने इस चरण पर टाटा एआईजी द्वारा दावे को खारिज किए जाने के मूल कारण (सिरोसिस हेतु 2 साल का वेटिंग पीरियड) के औचित्य पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
  • यह विषय पूरी तरह खुला रखा गया है ताकि जिला आयोग दोनों पक्षों के साक्ष्यों का परीक्षण कर स्वतंत्र रूप से सेवा में कमी (Deficiency in Service) का निर्धारण कर सके।

Also Read; News Portal: बिना कारण बताए समाचार पोर्टल का फेसबुक पेज ब्लॉक करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात; डिजिटल मीडिया ‘NoCap’ का केस जानें

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2021–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
शिकायतकर्ता (अपीलकर्ता)प्रिया मेहरोत्रा — स्वर्गीय डॉ. सौरभ मेहरोत्रा (दंत चिकित्सक) की विधवा।
प्रतिवादी बीमा कंपनीटाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (Tata AIG)।
दावाकृत चिकित्सा राशि₹25,73,000 (₹25.73 लाख) — स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी के तहत अस्पताल में हुए वास्तविक इलाज का खर्च।
बीमारी और मृत्यु का इतिहास16 अगस्त 2021 को डॉ. सौरभ मेहरोत्रा अपने क्लिनिक में अचानक बीमार पड़े। प्रारंभिक जांच में कोई गंभीर असामान्यता नहीं दिखी, किंतु बाद में लिवर में गंभीर खराबी पाई गई। 27 अक्टूबर 2021 को ILBS अस्पताल में उनका निधन हो गया।
बीमा कंपनी का रुख (जनवरी 2022)टाटा एआईजी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि सिरोसिस (Cirrhosis) का उपचार पॉलिसी के दो वर्षीय वेटिंग पीरियड (Two-year Waiting Period) के अंतर्गत आता है।
जिला आयोग का आदेश (02.02.2026)ओम्बड्समैन के पास असफलता के बाद जब याचिकाकर्ता ने जिला आयोग में शिकायत की, तो जिला फोरम ने 2 वर्ष की समय-सीमा पार होने के आधार पर 250 दिन की देरी को अस्वीकार कर केस खारिज कर दिया।
अपील में प्रस्तुत साक्ष्यअपीलकर्ता ने मनोचिकित्सक की पर्चियां और परामर्श रिकॉर्ड प्रस्तुत किए, जिससे साबित हुआ कि पति की असामयिक मृत्यु के बाद वे गहरे क्लिनिकल अवसाद से जूझ रही थीं।
राज्य आयोग का अंतिम आदेशजिला आयोग का आदेश रद्द; 250 दिनों का विलंब माफ; 3 माह के भीतर गुण-दोष के आधार पर फैसला करने का निर्देश।

विधिक एवं उपभोक्ता न्यायशास्त्र: ‘तकनीकी औपचारिकता बनाम वास्तविक न्याय’

  • सर्वोच्च न्यायालय की नजीरें — कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन बनाम कातीजी [(1987) 2 SCC 107]:
    • शीर्ष अदालत ने स्थापित किया है कि परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत “पर्याप्त कारण” की व्याख्या अत्यधिक उदारवादी और न्यायोन्मुख होनी चाहिए।
    • अदालतें सामान्यतः यह मानकर चलती हैं कि कोई भी वादी जानबूझकर देरी करके अपने ही अधिकारों को खतरे में नहीं डालता। जब तक घोर लापरवाही या दुर्भावना साबित न हो, देरी माफ की जानी चाहिए।
  • उपभोक्ता फोरम की कल्याणकारी प्रकृति:
    • उपभोक्ता संरक्षण कानून एक सामाजिक-कल्याणकारी विधान (Socio-Economic Welfare Legislation) है। इसका उद्देश्य तकनीकी और प्रक्रियात्मक जटिलताओं के आधार पर उपभोक्ताओं के दावों का गला घोंटना नहीं है।
    • यदि किसी उपभोक्ता ने अपने परिवार के मुख्य कमाऊ सदस्य को खोया हो और वह अवसादग्रस्त हो, तो उससे एक स्वस्थ व्यक्ति की तरह समय-सीमा के कठोर गणितीय पालन की अपेक्षा करना अन्यायपूर्ण होगा।

विधिक विवरण

  • अधिकरण: दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (नई दिल्ली)
  • केस संदर्भ: प्रिया मेहरोत्रा बनाम टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड [प्रथम अपील संख्या]
  • पीठ: न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल (अध्यक्षा) एवं बिमला कुमारी (सदस्या)
  • आदेश की तिथि: 7 अक्टूबर 2026
  • अपीलकर्ता का विधिक प्रतिनिधित्व: नेहा गुंड एंड एसोसिएट्स (Neha Gund & Associates)
  • अधिनिर्णीत समय-सीमा: जिला आयोग को आदेश प्राप्ति के 3 महीने के भीतर शिकायत का निस्तारण करने का निर्देश।

प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:

  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (CPA) — धारा 69 (परिसीमा अवधि एवं विलंब माफी की शक्तियां) तथा धारा 35/47
  • परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act) — धारा 5 (पर्याप्त कारण के आधार पर विलंब की माफी)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • जीवनसाथी की मृत्यु और परिसीमा माफी का विधिक मानक: ‘पति की मृत्यु के बाद क्लिनिकल अवसाद का शिकार होना और मनोचिकित्सीय उपचार लेना परिसीमा में देरी को माफ करने हेतु एक पूर्णतः वैध और पर्याप्त कारण है; उपभोक्ता अदालतों को तकनीकी आधारों पर शिकायतों को खारिज करने के बजाय मानवीय आधार पर विचार कर मामलों को गुण-दोष पर तय करना चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति: 250 दिनों की देरी माफ हो चुकी है; जिला उपभोक्ता आयोग अब टाटा एआईजी की 2-वर्षीय वेटिंग पीरियड वाली अस्वीकृति और ₹25.73 लाख के बीमा दावे की वैधता पर गुण-दोष के आधार पर 3 महीने में सुनवाई पूरी कर अंतिम फैसला सुनाएगा।

Insurance Claim:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित आयोगदिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (State Consumer Commission)
पीठअध्यक्ष न्यायमूर्ति संगीता धिंगड़ा सहगल एवं सदस्य विमला कुमारी
मामला/साइटेशनप्रिया मेहरोत्रा बनाम टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (Priya Mehrotra v. Tata AIG)
अपीलकर्ताप्रिया मेहरोत्रा (पति स्व. डॉ. सौरभ मेहरोत्रा की मृत्यु के बाद डिप्रेशन का इलाज करा रही विधवा)
मूल विवादटाटा एआईजी द्वारा ₹25.73 लाख के मेडिक्लेम (Health Insurance Claim) को खारिज करना।
समय-सीमा देरी250 दिन की देरी से जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दायर।
आयोग का फैसलादेरी माफ; जिला आयोग का आदेश रद्द कर शिकायत पर गुण-दोष (Merits) के आधार पर 3 महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
26.9 ° C
26.9 °
26.9 °
62 %
1.2kmh
75 %
Tue
32 °
Wed
30 °
Thu
22 °
Fri
23 °
Sat
30 °

Recent Comments