केस का संक्षिप्त ब्योरा (Case Snapshot)
| पहलू | विधिक विवरण |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस (Justice Bechu Kurian Thomas) |
| केस का नाम | यशवंत शेनॉय बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया [W.P.(C) No.25168 & 26232 of 2026] |
| याचिकाकर्ता | एडवोकेट यशवंत शेनॉय (व्यक्तिगत रूप से पेश हुए) |
| प्रतिवादी वकील | एडवोकेट रजीत (BCI के लिए), एडवोकेट एम.यू. विजयलक्ष्मी (BCK के लिए) |
| अदालत का अंतरिम आदेश | BCI के अंतरिम निकाय संबंधी आदेश पर रोक; AG और BCK सचिव को अधिकृत प्राधिकारी घोषित किया गया। |
Interim Authority: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष द्वारा बार काउंसिल ऑफ केरल (BCK) के कामकाज को चलाने के लिए एक ‘अंतरिम प्राधिकार’ (Interim Body) गठित करने के आदेशों पर केरल हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है।
अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि BCI अध्यक्ष के ये आदेश अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) के प्रावधानों और उसकी योजना के विपरीत हैं [यशवंत शेनॉय बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया (Yeshwanth Shenoy v Bar Council of India)]।
जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस (Justice Bechu Kurian Thomas) की पीठ ने नवनिर्वाचित सदस्य और अधिवक्ता यशवंत शेनॉय द्वारा व्यक्तिगत रूप से दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
केरल हाई कोर्ट का कड़ा रुख और मुख्य टिप्पणियां
बार काउंसिल ऑफ केरल अंतरिम निकाय विवाद
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Advocates Act के सिद्धांतों का उल्लंघन अवैध स्वाक्षरी (Authorised Signatory)
• BCI अध्यक्ष के पास ऐसा निकाय बनाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं। • कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी पूर्व अध्यक्ष का नाम देना गलत।
• बिना सोच-विचार (Without Application of Mind) का आदेश। • केवल एजी (AG) और सचिव को ही अधिकृत माना जाए।
बिना विचार किए जारी किए गए आदेश
हाई कोर्ट ने BCI के आदेशों पर रोक लगाते हुए स्पष्ट कहा, यह अदालत प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि रिट याचिकाओं में आक्षेपित आदेश (BCI के 24 जून और 30 जून के पत्र) बिना सोच-विचार के और अधिवक्ता अधिनियम की योजना के खिलाफ जारी किए गए हैं।
प्रमाण पत्रों पर पूर्व अध्यक्ष के नाम पर कड़ी आपत्ति
कोर्ट ने उन नामांकन प्रमाण पत्रों (Enrolment Certificates) पर सख्त आपत्ति जताई, जिन पर कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद पूर्व अध्यक्ष अजीत टी.एस. (Ajith TS) का नाम ‘अध्यक्ष’ के रूप में लिखा गया था। कोर्ट ने कहा कि कार्यकाल खत्म होने के बाद ऐसे प्रमाणपत्रों पर केवल एडवोकेट जनरल (AG) और BCK सचिव के ही हस्ताक्षर होने चाहिए थे।
विवाद का पूरा घटनाक्रम
- अप्रैल 2026: XIIIवीं बार काउंसिल ऑफ केरल (BCK) के चुनाव संपन्न हुए।
- 16 जून 2026: नवनिर्वाचित राज्य काउंसिल के गठन की आधिकारिक अधिसूचना केरल राजपत्र (Kerala Gazette) में प्रकाशित हुई।
- 24 जून व 30 जून 2026 (BCI के आदेश): BCI अध्यक्ष ने एक अंतरिम निकाय का गठन कर दिया ताकि नामांकन (Enrolment), सनद (Sanad), AIBE परीक्षा और वकीलों के कल्याण कोष जैसे दैनंदिन प्रशासनिक कार्य रुक न जाएं। इसमें एडवोकेट जनरल जाजू बाबू, मनोज कुमार एन, संतोष कुमार पी और बाद में पूर्व अध्यक्ष अजित टी.एस. को शामिल किया गया।
- याचिकाकर्ता (यशवंत शेनॉय) की चुनौतियां:
- जब 16 जून को नई काउंसिल की अधिसूचना जारी हो चुकी है, तो सचिव पहली बैठक (First Meeting) क्यों नहीं बुला रहे?
- BCI अध्यक्ष के पास धारा 58 के तहत मौजूद वैधानिक तंत्र के इतर ऐसा कोई ‘अतिरिक्त-वैधानिक अंतरिम निकाय’ (Extra-Statutory Interim Body) गठित करने का अधिकार नहीं है।
- आशंका जताई गई कि अंतरिम निकाय का गठन पिछली (XIIवीं) काउंसिल के दौरान हुई वित्तीय अनियमितताओं के सबूतों को नष्ट करने के लिए किया जा सकता है।
उच्च न्यायालय का अंतरिम निर्देश
- आदेशों पर रोक: BCI अध्यक्ष के 24 जून और 30 जून के पत्रों/आदेशों के संचालन पर पूरी तरह रोक लगाई गई।
- नई व्यवस्था (Authorised Signatories): जब तक XIIIवीं बार काउंसिल ऑफ केरल अपनी पहली बैठक आयोजित नहीं कर लेती, तब तक केरल के एडवोकेट जनरल (जाजू बाबू) और BCK के सचिव ही सभी प्रशासनिक और कानूनी कार्यों के लिए अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (Authorised Signatories) के रूप में कार्य करेंगे।
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
केरल हाई कोर्ट का यह आदेश स्पष्ट करता है कि अधिवक्ताओं की नियामक संस्थाओं (Bar Councils) में लोकतांत्रिक और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है। BCI या उसका नेतृत्व बिना कानून की अनुमति के राज्य परिषदों के अधिकारों में मनमर्जी से हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

