केस का संक्षिप्त ब्योरा (Case Snapshot)
| पहलू | विधिक विवरण |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | जस्टिस विक्रम नाथ एवं जस्टिस संदीप मेहता |
| केस का नाम | नेशनल स्टॉक एक्सचेंज बनाम सीआईसी (National Stock Exchange vs. CIC) |
| NSE के वकील | सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता एवं सीनियर एडवोकेट बलबीर सिंह |
| मूल कानूनी मुद्दा | क्या सेबी (SEBI) से मान्यता प्राप्त नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) RTI एक्ट की धारा 2(h) के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ है? |
| सुप्रीम कोर्ट का आदेश | CIC के 2007 के आदेश पर अंतरिम रोक, याचिका पर नोटिस जारी। |
NSE Under RTI Or Not: नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NSE) को सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ (Public Authority) घोषित करने वाले केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 2007 के ऐतिहासिक आदेश के क्रियान्वयन पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक (Interim Stay) लगा दी है।
जस्टिस विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) और जस्टिस संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta) की पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ NSE द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया, जिसमें NSE पर RTI लागू करने के निर्णय को बरकरार रखा गया था [नेशनल स्टॉक एक्सचेंज बनाम सीआईसी (National Stock Exchange vs. CIC)]।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और मौखिक टिप्पणी
NSE पर सूचना का अधिकार (RTI) लागू होने का विवाद
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CIC आदेश के निष्पादन पर अंतरिम रोक सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी
• NSE की अपील पर नोटिस जारी किया गया। • "आज का दौर पारदर्शिता का है।"
• 2007 के CIC आदेश पर फिलहाल रोक। • "यह सुरक्षा ढाल (Shield) बहुत लंबे समय तक नहीं रहेगी।"
आज का दौर पारदर्शिता का है
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पारदर्शिता के बढ़ते महत्व को रेखांकित करते हुए मौखिक रूप से कहा, आज का दौर पारदर्शिता (Transparency) का है। यह ढाल (सुरक्षात्मक आदेश) बहुत लंबे समय तक नहीं टिकने वाली है। इसके बावजूद, कानूनी पहलुओं और अपीलीय प्रक्रियाओं का संज्ञान लेते हुए पीठ ने सीआईसी (CIC) के 7 जून 2007 के आदेश के क्रियान्वयन पर फिलहाल अंतरिम रोक लगा दी।
19 साल पुराने विवाद का इतिहास (2007 से 2026 तक)
[2007: सीआईसी का फैसला] ──► [2010: सिंगल जज का फैसला] ──► [2026: डिवीजन बेंच का फैसला] ──► [2026: सुप्रीम कोर्ट की रोक]
• NSE को 'पब्लिक अथॉरिटी' माना। • जस्टिस संजीव खन्ना ने CIC • डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के • सुप्रीम कोर्ट ने CIC आदेश
के आदेश को सही ठहराया। फैसले पर मुहर लगाई। के निष्पादन पर स्टे लगाया।
- जून 2007 (CIC का आदेश): केंद्रीय सूचना आयोग की पूर्ण पीठ ने निर्णय दिया कि स्टॉक एक्सचेंज RTI अधिनियम की धारा 2(h) के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ (Public Authority) के अंतर्गत आते हैं, इसलिए उन्हें आरटीआई आवेदनों के निपटारे का तंत्र बनाना होगा।
- अप्रैल 2010 (दिल्ली हाई कोर्ट – सिंगल जज): तत्कालीन जज (वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट जज) जस्टिस संजीव खन्ना ने NSE की याचिका खारिज कर दी। उन्होंने माना कि यद्यपि NSE एक प्राइवेट कंपनी के रूप में पंजीकृत है, लेकिन सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1956 के तहत मान्यता मिलने के बाद यह सार्वजनिक कार्य करने वाली संस्था बन जाती है।
- मई 2010 – जुलाई 2026 (16 साल तक अपील लंबित): हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के फैसले पर स्टे लगा दिया था, जो अपील लगभग 16 वर्षों तक लंबित रही।
- 1 जुलाई 2026 (दिल्ली हाई कोर्ट – डिवीजन बेंच): जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि SEBI की मान्यता (जो केंद्र सरकार का एक प्रतिनिधि अंग है) के बिना NSE काम नहीं कर सकता, और केंद्र सरकार का इस पर गहरा एवं व्यापक नियंत्रण (Deep and pervasive control) है।
सुप्रीम कोर्ट में NSE के तर्क
NSE की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने निम्नलिखित तर्क रखे-
- निजी कंपनी और शेयरहोल्डिंग: NSE एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है जिसमें सरकार की कोई हिस्सेदारी (Government shareholding) नहीं है। इसके 40% शेयर घरेलू निवेशकों के पास और 27% शेयर विदेशी निवेशकों के पास हैं।
- कानूनी नजीर का हवाला: NSE ने सुप्रीम कोर्ट के ‘थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य’ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया और तर्क दिया कि वह RTI अधिनियम की धारा 2(h) में वर्णित सार्वजनिक प्राधिकरण की किसी भी शर्त को पूरा नहीं करता है।
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
सुप्रीम कोर्ट का यह अंतरिम आदेश NSE के लिए फिलहाल एक बड़ी राहत है। हालांकि, कोर्ट की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों और स्टॉक एक्सचेंजों में पारदर्शिता (Transparency) और सार्वजनिक जवाबदेही के कानूनी दायरे पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला बेहद महत्वपूर्ण होगा।

