लार्जर बेंच से पूछे गए 3 मुख्य कानूनी सवाल
गुजरात हाईकोर्ट ने लार्जर बेंच के समक्ष निर्णय के लिए निम्नलिखित सवाल रखे हैं:
- क्या 120 दिन पूरे होने पर रिहाई अनिवार्य है?क्या धारा 132B(1)(i) के दूसरे प्रावधान के तहत 120 दिन की अवधि बीतने पर जब्त संपत्तियों को वापस करना अनिवार्य है, यदि करदाता ने 30 दिनों के भीतर आवेदन दायर किया हो?
- बिना टैक्स देनदारी तय हुए क्या संपत्ति लौटाई जा सकती है?यदि निर्धारण अधिकारी (Assessing Officer – AO) ने करदाता के आवेदन पर कोई निर्णय नहीं लिया है और असेसमेंट में टैक्स देनदारी का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ है, तो क्या 120 दिन पूरे होने पर संपत्ति लौटाई जा सकती है?
- स्रोत की जानकारी न देने पर क्या आवेदन स्वतः खारिज या स्वीकार माना जाएगा?यदि करदाता का आवेदन संपत्ति की प्रकृति और स्रोत (Nature & Source) के विवरण से रहित है, तो क्या अधिकारी के लिए उसका संज्ञान लेना अनिवार्य है? और क्या अधिकारी द्वारा इसकी सूचना न दिए जाने पर 120 दिनों के बाद संपत्ति की स्वतः रिहाई हो जाएगी?
हाईकोर्ट की पीठ का तर्क और दृष्टिकोण
- कानून की मंशा और शब्द ‘Shall’: पीठ ने कहा कि किसी कानून में ‘Shall’ शब्द का इस्तेमाल हर परिस्थिति में उसे “बाध्यकारी/अपरिहार्य” नहीं बनाता। कानून की समग्र मंशा और योजना को देखा जाना चाहिए।
- दोनों प्रावधानों को एक साथ पढ़ना अनिवार्य: धारा 132B के पहले प्रावधान के तहत करदाता को जब्ती के महीने के अंत से 30 दिनों के भीतर आवेदन करना होता है और संपत्ति के स्रोत की सही व्याख्या प्रस्तुत करनी होती है। यदि करदाता ने स्रोत का खुलासा ही नहीं किया है, तो 120 दिनों के बाद स्वचालित रिहाई का आदेश देना कानून की मूल भावना को विफल कर देगा।
- धारा 132B(4) का ब्याज प्रावधान (Compensatory Aspect): पीठ ने ध्यान दिलाया कि आयकर अधिनियम की धारा 132B(4) में 120 दिन बीत जाने के बाद रिटेन की गई राशि पर केंद्र सरकार द्वारा साधारण ब्याज देने का प्रावधान है। यह ब्याज करदाता के लिए एक प्रकार का मुआवजा है और आयकर विभाग पर जल्द असेसमेंट पूरा करने का वित्तीय दबाव बनाता है। इसलिए, 120 दिन बीतने पर संपत्ति की जब्ती तुरंत गैर-कानूनी नहीं हो जाती।
अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ ने आयकर अधिनियम, 1961 (IT Act) की धारा 132B(1)(i) के पहले और दूसरे परंतुक (Provisos) की व्याख्या पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न को वृहद पीठ (Larger Bench) को संदर्भित कर दिया है।
न्यायमूर्ति ए.एस. सुपेहिया और न्यायमूर्ति वैभवी डी. नानावती की खंडपीठ ने अपने पूर्व के स्थापित निर्णयों—विशेषकर नदीम दिलीप भाई पंजवानी बनाम आईटीओ और आशीष जयंतीलाल सांघवी बनाम आईटीओ—में अपनाए गए दृष्टिकोण से प्रथम दृष्टया असहमति जताते हुए यह संदर्भ (Reference) तैयार किया है। अदालत यह तय करने के लिए विस्तृत परीक्षण की आवश्यकता मान रही है कि क्या तलाशी एवं जब्ती (Search & Seizure) के दौरान जब्त की गई नकदी या परिसंपत्तियों को केवल इसलिए अनिवार्य और स्वतः (Automatic/Routine) रूप से रिलीज किया जाना चाहिए क्योंकि करदाता ने 30 दिनों के भीतर अर्जी दे दी थी और कर निर्धारण अधिकारी (AO) ने 120 दिनों के भीतर उस पर कोई औपचारिक आदेश पारित नहीं किया।
लार्जर बेंच को संदर्भित 3 प्रमुख विधिक प्रश्न
खंडपीठ ने मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष वृहद पीठ के गठन हेतु भेजते हुए निम्नलिखित तीन औपचारिक प्रश्न तय किए हैं:
- क्या 120 दिन पूरे होने पर जब्ती की रिहाई अनिवार्य है?
- क्या आयकर अधिनियम की धारा 132B(1)(i) के दूसरे परंतुक में प्रयुक्त वाक्यांश “shall be released” को अनिवार्य (Mandatory) मानकर, पहले परंतुक के तहत 30 दिनों में आवेदन दायर किए जाने पर, 120 दिन की अवधि समाप्त होते ही जब्त संपत्ति को जारी करना बाध्यकारी है?
- क्या कर देनदारी के निर्धारण के अभाव में स्वतः रिहाई संभव है?
- क्या धारा 132B(1)(i) के तहत विचारित कर निर्धारण (Assessment) कार्यवाहियों में वास्तविक कर देयता का निर्धारण हुए बिना, केवल इसलिए संपत्ति रिलीज की जा सकती है क्योंकि एओ ने पहले परंतुक के तहत दायर अर्जी पर कोई निर्णय नहीं लिया?
- स्रोत व प्रकृति का खुलासा न करने वाली अर्जियों पर कानूनी प्रभाव क्या होगा?
- क्या निर्धारण अधिकारी ऐसी अर्जी पर संज्ञान लेने और उसे खारिज करने की सूचना देने के लिए बाध्य है जिसमें संपत्ति की प्रकृति और स्रोत (Nature and Source) का कोई खुलासा ही न किया गया हो? और क्या ऐसी सूचना न दिए जाने का परिणाम 120 दिन बीतने पर संपत्ति की स्वतः रिहाई होगा?
खंडपीठ के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं वैधानिक विश्लेषण
1. ‘Shall’ का अर्थ हर जगह स्वतः या अनिवार्य नहीं होता न्यायमूर्ति ए.एस. सुपेहिया और न्यायमूर्ति वैभवी डी. नानावती की पीठ ने सांविधिक व्याख्या के मूल सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए कहा: “धारा 132B के वैधानिक ढांचे के सूक्ष्म परीक्षण से हम पाते हैं कि धारा 132B(1)(i) के दूसरे परंतुक के तहत 120 दिन पूरे होने पर जब्त परिसंपत्तियों की रिहाई रूटीन या स्वतः (Automatic) नहीं है, भले ही उसमें ‘shall be released’ शब्द का प्रयोग किया गया हो। यह स्थापित विधिक सिद्धांत है कि कानून में ‘shall’ शब्द का प्रयोग विधायिका के अनिवार्य संचालन के इरादे का एकमात्र प्रमाण नहीं होता। विधायिका का वास्तविक आशय कानून के समग्र दायरे और योजना से समझा जाना चाहिए। शाब्दिक व्याख्या (Literal Construction) यदि कानून के उद्देश्य को विफल करती हो, तो वह मान्य नहीं हो सकती।”
2. दोनों परंतुक (First & Second Proviso) एक साथ पढ़े जाने चाहिए
- पहला परंतुक: करदाता को जब्ती के महीने के अंत से 30 दिनों के भीतर आवेदन करना होता है, जिसमें उसे निर्धारण अधिकारी की संतुष्टि के स्तर तक संपत्ति की ‘प्रकृति और उसके स्रोत’ का स्पष्टीकरण देना अनिवार्य है।
- संतुष्टि का अभाव: अदालत ने कहा कि अर्जी दाखिल करना कोई “खोखली औपचारिकता” (Empty Formality) नहीं है। यदि करदाता अर्जी में स्रोत नहीं बताता, तो एओ पर यह बाध्यता नहीं है कि वह उसे अलग से नोटिस देकर स्पष्टीकरण मांगे। जब तक एओ की वैधानिक संतुष्टि (Satisfaction) दर्ज नहीं होती, तब तक महज 120 दिन बीतने पर संपत्ति रिलीज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
3. धारा 132B(4) के तहत ब्याज का प्रावधान: वित्तीय संतुलन
- पीठ ने रेखांकित किया कि पिछले फैसलों में धारा 132B(4) के प्रभाव का परीक्षण नहीं किया गया था।
- धारा 132B(4) का सुरक्षा चक्र: यह उपधारा प्रावधान करती है कि यदि 120 दिन की समाप्ति के बाद भी विभाग द्वारा नकदी या संपत्ति रोकी जाती है, तो केंद्र सरकार उस पर 120 दिन खत्म होने के अगले दिन से लेकर असेसमेंट/री-असेसमेंट पूरा होने की तारीख तक साधारण ब्याज (Simple Interest) का भुगतान करेगी।
- अदालत ने माना कि यह ब्याज प्रावधान करदाता के लिए एक क्षतिपूर्ति (Compensatory Measure) के रूप में कार्य करता है और साथ ही आयकर विभाग पर समय पर असेसमेंट पूरा करने का वित्तीय दबाव बनाता है। अतः जब कानून स्वयं 120 दिन बाद रोकी गई राशि पर ब्याज देने की व्यवस्था करता है, तो यह विधायिका के इस इरादे को दर्शाता है कि 120 दिन बाद जब्ती का स्वतः निरस्त होना अनिवार्य नहीं है।
पूर्व निर्णयों से असहमति का आधार
- नदीम दिलीप भाई पंजवानी मामला: इस पूर्व फैसले में माना गया था कि यदि 120 दिनों में एओ कोई निर्णय नहीं लेता, तो जब्ती की रिहाई आसन्न और अनिवार्य (Imminent) हो जाती है।
- मिताबेन आर. शाह मामला: इस मामले में कावासजी नुसेरवानजी दिनशॉ फैसले का सहारा लिया गया था। वर्तमान पीठ ने पाया कि कावासजी दिनशॉ का फैसला धारा 132(8) के तहत खाता-बही और दस्तावेजों (Books of Account/Documents) को रोके रखने से संबंधित था, न कि धारा 132B के तहत परिसंपत्तियों की रिहाई से।
- चूंकि इन पूर्व फैसलों में धारा 132B(4) के क्षतिपूर्ति ब्याज तंत्र का विश्लेषण किए बिना सीधे रिहाई का निर्देश दिया गया था, इसलिए कानून में एकरूपता और स्थिरता लाने के लिए इस विषय को तीन या अधिक न्यायाधीशों की लार्जर बेंच के पास भेजना अनिवार्य समझा गया।
IT Act: विधिक विवरण
- न्यायालय: गुजरात उच्च न्यायालय, अहमदाबाद
- पीठ: न्यायमूर्ति ए.एस. सुपेहिया और न्यायमूर्ति वैभवी डी. नानावती
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 132B(1)(i) (जब्त परिसंपत्तियों का उपयोजन एवं रिहाई)
- धारा 132B(1)(i) का पहला परंतुक (30 दिनों के भीतर अर्जी व स्रोत का प्रकटीकरण)
- धारा 132B(1)(i) का दूसरा परंतुक (120 दिनों के भीतर रिहाई का नियम)
- आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 132B(4) (120 दिन से अधिक रोकी गई राशि पर केंद्र सरकार द्वारा ब्याज का भुगतान)
- संबद्ध न्यायिक दृष्टांत जिनका परीक्षण होगा:
- नदीम दिलीप भाई पंजवानी बनाम आयकर अधिकारी (ITO) [गुजरात हाईकोर्ट]
- आशीष जयंतीलाल सांघवी बनाम आयकर अधिकारी (ITO) [गुजरात हाईकोर्ट]
- मिताबेन आर. शाह बनाम आयकर उपायुक्त (DCIT) [गुजरात हाईकोर्ट]
- वर्तमान स्थिति: तीन विधिक प्रश्न औपचारिक रूप से तैयार कर मुख्य न्यायाधीश को वृहद पीठ (Larger Bench) के गठन हेतु प्रेषित किए गए।

