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Juvenile Justice: ढाई साल तक वयस्क जेल में रहा डबल मर्डर केस का आरोपी नाबालिग…यह तो संवैधानिक अत्याचार है, यूं चला सिस्टम पर चाबुक

Juvenile Justice: सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस सिस्टम की एक बड़ी विफलता पर कड़ा प्रहार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को एक नाबालिग को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसने नाबालिग की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने इसे केवल एक कानूनी प्रक्रिया की कमी नहीं, बल्कि एक “गंभीर और प्रणालीगत” (Serious and Systemic) विफलता माना। कोर्ट ने पाया कि एक किशोर को डबल मर्डर केस में ‘नाबालिग’ घोषित किए जाने के बावजूद ढाई साल तक अवैध रूप से वयस्क जेल में रखा गया।

मामला क्या था? (The Tragic Timeline)

  • अपराध: 2 जुलाई, 2022 को उत्तर प्रदेश में एक दोहरे हत्याकांड का मामला।
  • नाबालिग की उम्र: अपराध के समय आरोपी की उम्र 16 साल, 11 महीने और 21 दिन थी।
  • घोषणा: 23 जून, 2023 को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB), आगरा ने स्कूल रिकॉर्ड के आधार पर उसे औपचारिक रूप से ‘नाबालिग’ घोषित किया।
  • विफलता: घोषित होने के बावजूद, वह अगले 2.5 वर्षों तक वयस्कों की जेल में बंद रहा। जेल प्रशासन का कहना था कि उन्हें कभी JJB का आदेश मिला ही नहीं।

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियां: “संवैधानिक अत्याचार”

  • अदालत ने सिस्टम में समन्वय की कमी पर गहरी नाराजगी जताई।
  • मौलिक अधिकारों का हनन: कोर्ट ने कहा कि किसी नाबालिग को वयस्क जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
  • संवेदनहीनता: “Stakeholders के बीच समन्वय और संवेदनशीलता की कमी रिफॉर्मेटिव (सुधारात्मक) दर्शन की जड़ों पर प्रहार करती है।”
  • संवैधानिक टॉर्ट (Constitutional Tort): कोर्ट ने इसे राज्य की शक्ति का दुरुपयोग माना, जिसके लिए सरकार को मुआवजे के रूप में हर्जाना देना होगा।

हाई कोर्ट की “गलत” दलीलें खारिज

  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमानत देने से इनकार करते हुए तर्क दिया था कि अपराध ‘जघन्य’ (Heinous) है और आरोपी को वयस्क के रूप में आजमाया (Trial) जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
  • दो-चरणीय प्रक्रिया: 16-18 वर्ष के किशोर को वयस्क मानने के लिए JJB (धारा 15) और चिल्ड्रेन कोर्ट (धारा 19) का स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी है, जो इस केस में नहीं हुआ था।
  • सुधारात्मक दृष्टिकोण: JJ एक्ट का उद्देश्य सजा देना नहीं, बल्कि सुधार करना है। जिला प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट में भी बच्चे के व्यवहार में कोई गंभीर जोखिम नहीं पाया गया था।

भविष्य के लिए कड़े निर्देश (Nationwide Reforms)

  • सुप्रीम कोर्ट ने केवल मुआवजा ही नहीं दिया, बल्कि पूरे देश के लिए SOP (Standard Operating Procedure) जारी करने को कहा।
  • त्वरित संचार: JJB के आदेशों को तुरंत जेल प्रशासन तक पहुँचाने के लिए संस्थागत तंत्र बनाया जाए।
  • SOP का पालन: जेल से ‘ऑब्जर्वेशन होम’ (सुधार गृह) में नाबालिगों के ट्रांसफर के लिए तय प्रक्रिया का पालन अनिवार्य हो।
  • न्यायिक प्रशिक्षण: ज्यूडिशियल एकेडमी के माध्यम से न्यायिक अधिकारियों को संवेदनशील बनाया जाए।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मुआवजा₹5 लाख (उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा देय)।
अवैध हिरासतलगभग 2.5 साल (वयस्क जेल में)।
कानूनी आधारअनुच्छेद 21 और JJ एक्ट, 2015।
अदालत का संदेश“लोकतंत्र में ऐसी खामियों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।”

सुधारात्मक न्याय की जीत

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो कागजी कार्यवाही के चक्कर में किसी बच्चे के भविष्य और उसके मौलिक अधिकारों को भूल जाते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘जघन्य अपराध’ का ठप्पा किसी नाबालिग से उसके संवैधानिक अधिकार नहीं छीन सकता और सिस्टम की ढिलाई के लिए राज्य को जवाबदेह ठहराया जाएगा।

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