HomeArticlesJustice's Talk: पर्यावरण कानून का विकास ज्यादातर PIL की देन… एक केस...

Justice’s Talk: पर्यावरण कानून का विकास ज्यादातर PIL की देन… एक केस में जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह ने यह कह डाला

Justice’s Talk: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह ने कहा कि भारत में पर्यावरण कानून का विकास काफी हद तक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से हुआ है।

UN क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस 2025 (COP30) का आयोजन

ब्राजील के बेलेम में आयोजित UN क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस 2025 (COP30) में जस्टिस सिंह ने कहा कि न्यायिक सक्रियता के दौर में शुरू हुई पर्यावरण जागरूकता उसी समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए जा रहे अहम कानूनी सुधारों से जुड़ी रही। “भारत में 1970 के आखिर और 1980 के दशक में PIL के उभार ने पर्यावरण कानून को नई दिशा दी।उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने locus standi की अवधारणा का विस्तार करके किसी भी जन-हितैषी नागरिक या संगठन को बड़े जनहित के मुद्दों पर अदालत आने का अधिकार दिया, जो पारंपरिक नियमों से बिल्कुल अलग था।

संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्याख्या

जस्टिस सिंह ने कहा कि इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्याख्या को व्यापक बनाते हुए उसमें पर्यावरण संरक्षण को भी शामिल कर लिया। “PIL और विस्तृत अनुच्छेद 21 का यह मेल भारत की पर्यावरणीय न्यायशास्त्र की बुनियाद बन गया। उन्होंने बताया कि अदालत को कई बार वैज्ञानिक और पर्यावरणीय जटिलताओं पर राय बनानी पड़ी, जबकि उस समय विशेषज्ञ ढांचा उपलब्ध नहीं था। 1984 की भोपाल गैस त्रासदी ने सख्त और कठोर जवाबदेही की जरूरत को स्पष्ट कर दिया, जिसके बाद कोर्ट ने स्ट्रिक्ट लायबिलिटी के सिद्धांत को अपनाया और फिर 1986 के एम.सी. मेहता बनाम भारत सरकार केस में इसे विकसित कर एब्सोल्यूट लायबिलिटी का “भारतीय सिद्धांत” गढ़ा—जहां खतरनाक गतिविधि करने वाली कंपनियां किसी भी नुकसान की पूरी तरह जिम्मेदार होंगी।

पॉल्यूटर पेज़ और प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल जैसे सिद्धांत भी स्थापित

जस्टिस सिंह ने बताया कि आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट ने पॉल्यूटर पेज़ और प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल जैसे सिद्धांत भी स्थापित किए। जस्टिस सिंह ने कहा कि 1990 के दशक में भारत की पर्यावरण न्याय प्रणाली और मजबूत हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों के जरिए व्यापक पर्यावरण नीति तैयार की, जो संविधान के अनुच्छेद 141 और 142 के तहत पूरे देश पर बाध्यकारी हो गईं। उन्होंने कहा कि अदालत ने PIL का अभिनव इस्तेमाल, विस्तृत रिट अधिकार, नीतिनिर्देशक तत्वों और मौलिक अधिकारों को जोड़कर खुद को पर्यावरण शासन का संरक्षक बना दिया।

NGT की स्थापना ने न्यायिक प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया

जस्टिस सिंह ने बताया कि 2010 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की स्थापना ने इस न्यायिक प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया और पर्यावरण विवादों के वैज्ञानिक व तेज समाधान का मंच प्रदान किया। जस्टिस सिंह ने कहा कि इन सभी प्रयासों ने पर्यावरण संरक्षण को एक नीति मुद्दे से आगे बढ़ाकर एक “निरंतर संवैधानिक प्रतिबद्धता” का रूप दे दिया, जिसमें न्यायपालिका कानून की व्याख्याकार होने के साथ-साथ पर्यावरणीय अंतरात्मा की संरक्षक भी बनी। उन्होंने कहा, अदालत ने जहां ज़रूरत पड़ी वहां कानून की कमी को पूरा किया, वहीं न्यायिक सक्रियता और संयम के बीच संतुलन भी बनाए रखा, ताकि उसकी विश्वसनीयता बनी रहे।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
haze
30 ° C
30 °
30 °
58 %
3.6kmh
65 %
Thu
37 °
Fri
39 °
Sat
39 °
Sun
35 °
Mon
39 °

Recent Comments