Tuesday, August 4, 2026
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Legal Duty: मुवक्किल का केस लड़ने पर वकील को आपराधिक मामले में घसीटना चिंताजनक…क्यों कहा, यह वकालत की स्वतंत्रता पर सीधा हमला

Legal Duty: कर्नाटक हाईकोर्ट ने सिविल और दीवानी विवादों को जबरन आपराधिक रंग देकर वकीलों को डराने-धमकाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर बेहद सख्त और गंभीर विधिक रुख अपनाया है।

एक वकील और अन्य व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज हुआ है केस

हाई कोर्ट के जस्तित एम. नागाप्रसन्ना की एकल पीठ ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में एक वकील और अन्य व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज तीन आपराधिक मामलों (FIR/Criminal Cases) को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया। अदालत ने पाया कि इस मामले में आपराधिकता (Criminality) का एक अंश भी मौजूद नहीं था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल अपने पेशेवर विधिक कर्तव्य (Professional Duty) का पालन करने और अपने मुवक्किल का पक्ष अदालत या राजस्व अधिकारियों के सामने रखने मात्र के लिए किसी भी वकील को आपराधिक अभियोजन के भंवर में नहीं घसीटा जा सकता।

आपराधिक कानून को उत्पीड़न के हथियार के रूप में नहीं करने देंगे इस्तेमाल

न्यायालय ने वकीलों को झूठे मामलों में फंसाने की इस नई प्रवृत्ति पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हुए विधिक निष्कर्ष में कहा, दीवानी लड़ाई (Civil Contest) जीतने के लिए आपराधिक कानून को उत्पीड़न के हथियार (Weapon of Oppression) के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हाल के दिनों में एक बेहद परेशान करने वाली प्रवृत्ति (Disturbing Trend) सामने आई है, जहां वकीलों को केवल इसलिए आरोपी बना दिया जाता है क्योंकि उन्होंने अपने मुवक्किलों की पैरवी की। यदि हर वकील को जांच और आपराधिक मुकदमों के आघात से गुजरना पड़ेगा, तो इसका वकालत के पेशे की निडरता पर बहुत ही घातक और पंगु बना देने वाला प्रभाव (Chilling and Paralyzing Effect) पड़ेगा।

मामला क्या था? (20 साल पुराने जमीन विवाद को ‘आपराधिक’ चोला)

शिकायतकर्ता का आरोप: यह पूरा विधिक विवाद [एस. राजेंद्र बनाम कर्नाटक राज्य] के मामले से जुड़ा है, जिसकी जड़ें लगभग दो दशक पुरानी हैं। वर्ष 2023 में एक वकील और उनके मुवक्किलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि वकील ने अपने मुवक्किलों के साथ विवादित संपत्ति पर प्रवेश किया, गाली-गलौज की और धमकी दी। इसके अलावा, आरोप लगाया गया कि वकील ने एक फर्जी विभाजन विलेख (Partition Deed) तैयार कर सहकारी बैंक से धोखाधड़ी से लोन लिया।

हाई कोर्ट की पड़ताल: अदालत ने मामले के सभी तथ्यों और राजस्व रिकॉर्ड की बारीकी से जांच की। कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच पिछले 20 सालों से दीवानी और जमीन का विवाद चल रहा था। वकील का एकमात्र रोल यह था कि उन्होंने राजस्व अधिकारियों और दीवानी अदालतों में अपने मुवक्किल का केस लड़ा था। शिकायत में लगाए गए आरोप पूरी तरह से निराधार और केवल “कोरे दावे” (Bald Assertions) थे।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘कोर्ट के अधिकारी हैं वकील’

जस्टिस एम. नागाप्रसन्ना ने अपने फैसले में वकालत के पेशे की गरिमा और सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किए।

वकालत की स्वतंत्रता न्याय की शुद्धता के लिए जरूरी

अदालत ने कहा कि एडवोकेट्स ‘कोर्ट के अधिकारी’ (Officers of the Court) होते हैं। वे पूरी तरह से कानून के दायरे में रहकर और अपने मुवक्किल के निर्देशों के आधार पर काम करते हैं। असंतुष्ट मुकदमों के पक्षकारों (Disgruntled Litigants) द्वारा वकीलों को डराने के लिए आपराधिक कानून का दुरुपयोग करना न्याय प्रशासन की शुद्धता पर सीधा प्रहार है।

पुलिस और निचली अदालतें ‘फिल्टर’ के रूप में काम करें

सुप्रीम कोर्ट (Apex Court) के पुराने फैसलों की नजीर देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस को चार्जशीट दाखिल करते समय और आपराधिक कोर्ट को आरोप तय (Framing of Charge) करते समय एक ‘अहम फिल्टर’ (Vital Filter) के रूप में काम करना चाहिए। उन्हें शुरुआती स्तर पर ही यह सुनिश्चित करना चाहिए कि केवल वही मामले ट्रायल (सुनवाई) तक जाएं जहां दोषसिद्धि की उचित संभावना हो, न कि सिविल विवादों वाले झूठे केस।

शुरुआती स्तर पर ही केस खत्म करना जरूरी

अदालत ने साफ किया कि जो विवाद पूरी तरह दीवानी प्रकृति (Civil in complexion) का है, उसमें राज्य की जांच मशीनरी (पुलिस) को घुसने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) है। इसलिए अदालतों का यह विधिक कर्तव्य है कि वे ऐसे दुर्भावनापूर्ण मामलों को शुरुआत (Threshold) में ही पूरी तरह समाप्त कर दें।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुकर्नाटक उच्च न्यायालय का अंतिम विधिक निर्णय (12 जून 2026)
याचिकाकर्ता (आरोपी)एस. राजेंद्र (अधिवक्ता) एवं अन्य।
प्रतिवादी पक्षकर्नाटक राज्य (पुलिस) एवं मूल शिकायतकर्ता।
सुनवाई करने वाले जजजस्टिस एम. नागाप्रसन्ना।
वकीलों का प्रतिनिधित्वयाचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट सत्यनारायण चाल्के एस. और देवराजा एम.।
मुख्य विधिक सिद्धांतपेशेवर दायित्व निभाने के लिए वकीलों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करना विधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
अदालत का अंतिम आदेशअधिवक्ता के खिलाफ दर्ज तीनों आपराधिक मामले पूरी तरह रद्द (Quashed)।
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