Tuesday, October 27, 2026
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Limitation Period: डॉग शो जज की नियुक्ति विवाद सुलझाने के लिए कलकत्ता HC के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मध्यस्थ नियुक्त; यह मामला पढ़कर समझें

आपत्तियां और निष्कर्ष

  • समय-सीमा (Limitation) का नियम: क्लब का तर्क था कि याचिका समय-बाधित है। हाईकोर्ट ने माना कि अपील प्रक्रियाओं में बिताए गए समय को परिसीमा अवधि (Limitation Period) की गणना करते समय बाहर रखा जाएगा।
  • धारा 21 का नोटिस (Notice under Section 21): क्लब का कहना था कि धारा 21 के तहत मध्यस्थता शुरू करने का अलग नोटिस नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि जब विवाद पहले से ही सिविल मुकदमे में उजागर था और प्रतिवादियों ने खुद इसे मध्यस्थता में ले जाने की मांग की थी, तो अलग से नोटिस की आवश्यकता नहीं है।

चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने केनेल क्लब ऑफ इंडिया (Kennel Club of India – KCI) द्वारा आयोजित होने वाले डॉग शो में ‘ऑल ब्रीड जज’ (All Breed Judge) की नियुक्ति से जुड़े विवाद के समाधान के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी.एस. शिवगणनम को एकमात्र मध्यस्थ (Sole Arbitrator) नियुक्त किया है।

न्यायमूर्ति के. कुमारेश बाबू की एकल पीठ ने सी.एस. संजय रेड्डी द्वारा मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत दायर याचिका पर 1 सितंबर को यह आदेश पारित किया।

विवाद की पृष्ठभूमि और ‘ऑल ब्रीड जज’ की भूमिका

  • विवाद की जड़: याचिकाकर्ता सी.एस. संजय रेड्डी ने गौरी नारगोलकर को केनेल क्लब ऑफ इंडिया का ‘ऑल ब्रीड जज’ नियुक्त किए जाने को चुनौती दी थी। रेड्डी का आरोप था कि नारगोलकर के पास इस पद के लिए आवश्यक वैधानिक योग्यताएं नहीं हैं और उन्हें अनुचित रूप से पदोन्नत किया गया है।
  • ‘ऑल ब्रीड जज’ का कार्य: डॉग शो में विभिन्न मान्यता प्राप्त नस्लों के श्वानों के मूल्यांकन, नस्लीय मानकों की परख और निर्णय देने के लिए ‘ऑल ब्रीड जज’ का पद अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • नियुक्ति पर आपत्ति
  • ‘ऑल ब्रीड जज’ वह व्यक्ति होता है जो डॉग शो में विभिन्न नस्लों के कुत्तों का मूल्यांकन करने के लिए योग्य होता है।
  • याचिकाकर्ता संजय रेड्डी का आरोप था कि गौरी नारगोलकर के पास आवश्यक योग्यता न होने के बावजूद उन्हें इस पद पर पदोन्नत किया गया।
  • सिविल सूट से मध्यस्थता (Arbitration) तक
  • रेड्डी ने शुरुआत में इस नियुक्ति को अमान्य घोषित करने के लिए सिविल कोर्ट में दीवानी मुकदमा दायर किया था।
  • केनेल क्लब ने अपने उप-नियमों (By-laws) में मौजूद मध्यस्थता क्लॉज का हवाला देते हुए धारा 8 के तहत मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने की मांग की। सिविल कोर्ट और अपीलीय अदालतों से राहत न मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने मध्यस्थ नियुक्त करने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।

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कानूनी प्रक्रिया और मध्यस्थता तक का सफर

  1. शुरुआती सिविल सूट: रेड्डी ने पहले नियुक्ति को शून्य घोषित करने के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था।
  2. क्लब द्वारा धारा 8 का उपयोग: केनेल क्लब ने अपने उपनियमों (By-laws) में मौजूद मध्यस्थता क्लॉज का हवाला देते हुए मध्यस्थता अधिनियम की धारा 8 के तहत विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने की मांग की। सिविल कोर्ट ने क्लब की मांग स्वीकार कर ली।
  3. अपीलों का दौर और धारा 11 याचिका: सिविल कोर्ट के आदेश के खिलाफ रेड्डी की अपील और दूसरी अपील खारिज होने के बाद, उन्होंने मध्यस्थता का रास्ता चुना और स्वतंत्र मध्यस्थ नियुक्त करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

केनेल क्लब की आपत्तियां और हाईकोर्ट का फैसला

केनेल क्लब ने मध्यस्थता याचिका का विरोध करते हुए दो मुख्य आपत्तियां दर्ज कराई थीं:

  • आपत्ति 1 (समयसीमा/Limitation): दावा किया गया कि याचिका समय-बाधित है।
    • कोर्ट का रुख: हाईकोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि अपील प्रक्रियाओं में बिताए गए समय को परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) की गणना से बाहर रखने का अधिकार याचिकाकर्ता को है।
  • आपत्ति 2 (धारा 21 का नोटिस न होना): दलील दी गई कि मध्यस्थता शुरू करने के लिए औपचारिक धारा 21 का नोटिस नहीं भेजा गया।
    • कोर्ट का रुख: अदालत ने स्पष्ट किया कि अलग से धारा 21 का नोटिस भेजना आवश्यक नहीं था, क्योंकि विवाद का पूरा ब्योरा पहले ही सिविल सूट में आ चुका था और खुद प्रतिवादियों ने ही मामले को मध्यस्थता में भेजने की मांग की थी।

अंतिम आदेश

मद्रास उच्च न्यायालय ने मध्यस्थता में कोई कानूनी बाधा न पाते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी.एस. शिवगणनम को विवाद के निस्तारण के लिए एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया और उन्हें अपनी फीस स्वयं निर्धारित करने की अनुमति दी।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • याचिकाकर्ता (सी.एस. संजय रेड्डी) की ओर से: अधिवक्ता वी.जी. सुरेश कुमार।
  • प्रतिवादी (केनेल क्लब एवं अन्य) की ओर से: अधिवक्ता मैथिली श्रीनिवास के निर्देश पर वरिष्ठ अधिवक्ता आर. श्रीनिवास।

Limitation Period: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति के. कुमारेश बाबू
नियुक्त मध्यस्थ (Arbitrator)न्यायमूर्ति टी.एस. शिवगणनम (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, कलकत्ता हाईकोर्ट)
मुख्य विवादकेनेल क्लब ऑफ इंडिया द्वारा बिना आवश्यक योग्यताओं के ‘ऑल ब्रीड जज’ की नियुक्ति
कानूनी प्रावधानमध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 (धारा 8, 11 एवं 21)

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