Tuesday, October 6, 2026
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Linguistic Minority: श्री अय्यप्पा कॉलेज फॉर विमेन; प्रबंधन में नायर समुदाय के दबदबे मात्र से कॉलेज का मलयालम भाषाई अल्पसंख्यक दर्जा खत्म नहीं होगा

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतमद्रास उच्च न्यायालय – मदुरै पीठ (Madras High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन एवं न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल
मामलाएस. श्रीनिवासन मेनन बनाम तमिलनाडु राज्य
संस्थानश्री अयप्पा कॉलेज फॉर विमेन, नागरकोइल (1987 में अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त)
मुख्य निर्णयभाषाई अल्पसंख्यक दर्जा जातिगत संरचना से प्रभावित नहीं होता; याचिका खारिज।

Linguistic Minority: मद्रास हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि भाषाई अल्पसंख्यक (Linguistic Minority) का दर्जा भाषा पर आधारित होता है, जाति पर नहीं। अदालत ने नागरकोइल स्थित ‘श्री अय्यप्पा कॉलेज फॉर विमेन’ (Sree Ayyappa College for Women) के प्रबंधन में नायर समुदाय के वर्चस्व के आरोपों के आधार पर उसके मलयालम भाषाई अल्पसंख्यक दर्जे को रद्द करने से इनकार कर दिया।

न्यायालय ने कहा कि यदि संस्थान के वर्तमान पदाधिकारी मुख्य रूप से नायर समुदाय से हैं, तब भी जब तक वे मलयाली हैं और तमिलनाडु में रह रहे मलयालम भाषी भाषाई अल्पसंख्यकों के हितों के विरुद्ध कार्य नहीं कर रहे हैं, तब तक इससे संस्थान का अल्पसंख्यक दर्जा प्रभावित नहीं होगा।

पीठ और मामले की पृष्ठभूमि

न्यायमूर्ति सी. वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने 18 अगस्त को श्रीनिवास मेनन बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में दायर जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। यह याचिका ‘देवी सेवा संगम’ के संस्थापक ट्रस्टी एस. श्रीनिवासन मेनन द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने कॉलेज और इसे संचालित करने वाली ‘श्री अय्यप्पा कॉलेज एजुकेशनल सोसाइटी’ का भाषाई अल्पसंख्यक दर्जा रद्द करने की मांग की थी। उल्लेखनीय है कि इस कॉलेज को वर्ष 1987 में मलयालम भाषाई अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया था और इसे तमिलनाडु सरकार से वित्तीय सहायता भी मिलती है।

याचिकाकर्ता के आरोप

याचिकाकर्ता का मुख्य आरोप था कि संस्थान औपचारिक रूप से भले ही भाषाई अल्पसंख्यक हो, लेकिन वास्तव में इस पर केरल स्थित ‘नायर सर्विस सोसाइटी’ (NSS) का नियंत्रण है।

  • कॉलेज और प्रबंधकीय सोसाइटी के महत्वपूर्ण पदों पर केरल के नायर समुदाय के लोग काबिज हैं।
  • कॉलेज के 49 में से 45 शिक्षक नायर समुदाय से हैं, और नियुक्तियों, दाखिलों व वित्तीय मामलों में अनियमितताएं की गई हैं।
  • कॉलेज अपने कैलेंडर, पत्रिका और प्रॉस्पेक्टस में नायर सर्विस सोसाइटी के संस्थापक मन्नथु पद्मनाभन की तस्वीरें प्रकाशित करता है तथा उनकी जयंती व पुण्यतिथि पर अवकाश घोषित करता है।

उच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष और संवैधानिक व्याख्या

खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए कई अहम कानूनी सिद्धांत रेखांकित किए।

  • भाषा बनाम जाति: अदालत ने कहा कि अल्पसंख्यक दर्जा भाषा के आधार पर निर्धारित होता है, जाति के आधार पर नहीं। पदाधिकारियों का नायर समुदाय से होना तब तक अप्रासंगिक है जब तक कि वे मलयाली हैं और तमिलनाडु के भाषाई अल्पसंख्यकों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं।
  • सोसाइटी के उद्देश्य: एजुकेशनल सोसाइटी के मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (MoA) से स्पष्ट है कि इसका मुख्य उद्देश्य तमिलनाडु में मलयालम भाषी अल्पसंख्यकों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देना है और कोई भी मलयाली इसका सदस्य बन सकता है। अदालत को ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह लगे कि यह उद्देश्य केवल एक दिखावा था।
  • अनुच्छेद 30 के तहत राज्य-वार जनसंख्या का पैमाना: अदालत ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि चूंकि केरल में मलयाली बहुसंख्यक हैं, इसलिए उन्हें तमिलनाडु में अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं मिलना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत भाषाई अल्पसंख्यक का दर्जा उस राज्य के संदर्भ में तय होता है जहां संस्थान स्थित है।“तमिलनाडु में मलयालम भाषियों की आबादी कुल जनसंख्या के 5% से भी कम है। जब तक राज्य में किसी भाषाई समूह की आबादी 50% से कम है, तब तक उसे अनुच्छेद 30 के प्रयोजनों के लिए भाषाई अल्पसंख्यक माना जाएगा। किसी अन्य राज्य में उनका बहुसंख्यक होना तमिलनाडु में उनके दर्जे को प्रभावित नहीं करता।””
  • अनियमितताओं के साक्ष्य का अभाव: अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता नियुक्तियों, दाखिलों और वित्तीय अनियमितताओं के अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री या साक्ष्य पेश करने में विफल रहे। कुछ संकाय सदस्यों के नायर समुदाय से होने मात्र से यह साबित नहीं होता कि नियमों का उल्लंघन किया गया है।

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी सिद्धांत

  1. अल्पसंख्यक दर्जा भाषा से तय होता है, जाति से नहीं
    • पीठ ने टिप्पणी की: “भले ही वर्तमान पदाधिकारी मुख्य रूप से नायर समुदाय से हों, जैसा कि याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है, जब तक वे मलयाली हैं और तमिलनाडु में रहने वाले मलयालम भाषी अल्पसंख्यकों के हितों के खिलाफ काम नहीं करते, तब तक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
  2. अनुच्छेद 30 (Article 30) के तहत भाषाई अल्पसंख्यक का मानदंड
    • कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत भाषाई अल्पसंख्यक दर्जे का निर्धारण संबंधित राज्य (जहां संस्थान स्थित है) की जनसंख्या के संदर्भ में किया जाता है।
    • राज्य सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु की कुल जनसंख्या में से 5% से भी कम लोग मलयालम बोलते हैं। जब तक किसी राज्य में कोई भाषी आबादी 50% से कम है, उसे उस राज्य में भाषाई अल्पसंख्यक ही माना जाएगा।
    • पड़ोसी राज्य केरल में मलयाली आबादी का बहुसंख्यक होना, तमिलनाडु में उनके अल्पसंख्यक दर्जे को प्रभावित नहीं करता।
  3. आरोप साबित करने में विफल रहा याचिकाकर्ता
    • अदालत ने पाया कि संस्थान की प्रबंधकीय सोसाइटी का मूल उद्देश्य तमिलनाडु में मलयालम भाषी अल्पसंख्यकों के बीच शिक्षा का प्रसार करना है।
    • याचिकाकर्ता का यह आरोप कि कॉलेज को केरल स्थित ‘नायर सर्विस सोसाइटी’ (NSS) द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है और नियुक्तियों में केवल नाइरों को प्राथमिकता दी जा रही है, किसी ठोस/सामग्री साक्ष्य से सिद्ध नहीं हो सका।

कानूनी प्रतिनिधित्व

  • याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता के. एन. थम्पी पेश हुए।
  • राज्य सरकार की ओर से: स्टेट काउंसिल के. के. उदयकुमार ने पक्ष रखा।
  • मनोनमनियम सुंदरनार विश्वविद्यालय की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता अजमल खान उपस्थित हुए।
  • कॉलेज और एजुकेशनल सोसाइटी की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता आइजक मोहनलाल तथा नायर सर्विस सोसाइटी की ओर से अधिवक्ता जे. आनंदवल्ली पेश हुईं।
  • राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (NCMEI) की ओर से: वरिष्ठ स्थायी वकील आर. नंदकुमार ने प्रतिनिधित्व किया।
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