हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ और कानूनी तर्क (Key Observations)
- व्हाट्सएप मैसेजिंग भी ‘Public View’ के दायरे में:अदालत ने आरोपी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि सार्वजनिक स्थान पर मौखिक गाली-गलौज न होने से SC/ST एक्ट लागू नहीं होगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया (WhatsApp) के माध्यम से पति, रिश्तेदारों और अन्य लोगों तक आपत्तिजनक सामग्री पहुंचाना “सार्वजनिक दृष्टि” (Public View) की आवश्यकता को पूरा करता है।“रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि मोबाइल से WhatsApp पर आपत्तिजनक वीडियो/तस्वीरें प्रसारित करने के कारण SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(w)(ii) और 3(2)(va) के तहत अपराध घटित होता है, जो कि पब्लिक व्यू के दायरे में है।”
- धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक:कोर्ट ने किरण बनाम राजकुमार जीवराज जैन (2025) मामले का हवाला देते हुए कहा कि एक बार जब प्रथम दृष्टया SC/ST एक्ट के तहत अपराध बनता है, तो धारा 18 का वैधानिक प्रतिबंध (Statutory Bar) लागू हो जाता है और अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।
- फरार आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं:न्यायालय ने इस बात पर कड़ा संज्ञान लिया कि आरोपी एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही लगातार फरार चल रहा है और जांच अधिकारी को साक्ष्य (जैसे मोबाइल फोन) जुटाने में बाधा उत्पन्न कर रहा है।“आरोपी अपराध दर्ज होने की तारीख से फरार है। वह खुद गिरफ्तारी से बच रहा है और जांच अधिकारी के लिए साक्ष्य एकत्र करने में बाधा पैदा कर रहा है। इसलिए, वह अग्रिम जमानत के विवेकाधीन संरक्षण का हकदार नहीं है।”
नागपुर/मुंबई: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत ‘पब्लिक व्यू’ (Public View / सार्वजनिक दृष्टि) के डिजिटल विस्तार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (विशेषकर व्हाट्सएप) पर आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार और धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) पर वैधानिक रोक के विधिक दायरे पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति वाई.जी. खोबरागड़े की एकल पीठ ने अभियुक्त द्वारा विशेष न्यायाधीश (अत्याचार निवारण अदालत) के उस आदेश के खिलाफ दायर आपराधिक अपील (धारा 14-A) को खारिज कर दिया, जिसके तहत उसे अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने दो-टूक कहा कि प्रथम दृष्टया अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद होने के कारण अधिनियम की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर पूर्ण वैधानिक प्रतिबंध (Statutory Bar) लागू होता है। साथ ही अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि अपराध दर्ज होने के बाद से अभियुक्त लगातार फरार रहा और साक्ष्य संकलन (मोबाइल फोन की जब्ती) में बाधा उत्पन्न कर रहा था। उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि किसी अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग की महिला की सहमति के बिना उसकी आपत्तिजनक/नग्न तस्वीरें और वीडियो व्हाट्सएप पर उसके पति, रिश्तेदारों और अन्य लोगों को भेजना SC/ST एक्ट की धारा 3 के अर्थ में ‘सार्वजनिक दृष्टि’ के अंतर्गत आता है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘व्हाट्सएप पर वीडियो भेजना सार्वजनिक दृष्टि (Public View) के दायरे में है’ न्यायमूर्ति वाई.जी. खोबरागड़े की एकल पीठ ने सोशल मीडिया और डिजिटल संचार माध्यमों के प्रसार की विधिक व्याख्या करते हुए कहा: “रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर विचार करने के बाद, प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(w)(ii) और धारा 3(2)(va) के तहत अपराध गठित करने के आवश्यक तत्व मौजूद हैं; क्योंकि अपीलार्थी/अभियुक्त ने अपने मोबाइल से पीड़िता के आपत्तिजनक वीडियो/तस्वीरें व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर प्रसारित किए, जो सार्वजनिक दृष्टि (Within the Public View) के दायरे में आता है। अतः अधिनियम, 1989 की धारा 18 के तहत अपीलार्थी को अग्रिम जमानत पर रिहा करने पर वैधानिक रोक (Bar) लागू होती है।”
2. सार्वजनिक स्थान पर जातिसूचक गाली न होने का तर्क खारिज: अभियुक्त का मुख्य तर्क था कि घटना किसी सार्वजनिक भौतिक स्थान पर नहीं हुई और न ही कोई जातिसूचक गाली-गलौज दी गई, अतः SC/ST एक्ट लागू नहीं होता। अदालत ने इस दलील को सिरे से नकारते हुए स्पष्ट किया:
- धारा 3(1)(w)(ii) विशेष रूप से किसी अनुसूचित जाति की महिला की सहमति के बिना उसके शील, गरिमा और निजता को ठेस पहुंचाने वाले यौन प्रकृति के कृत्यों को दंडित करती है।
- पीड़िता के पति, निकट संबंधियों और अन्य परिचितों के मोबाइल फोन पर आपत्तिजनक सामग्री भेजना उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करने और उपहास का पात्र बनाने के लिए पर्याप्त है, जो ‘पब्लिक व्यू’ की शर्त को पूरी तरह संतुष्ट करता है।
3. यौन इच्छा पूर्ति न होने पर प्रतिशोध: अदालत ने तथ्यात्मक रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए दर्ज किया: “रिकॉर्ड के अवलोकन से प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि अपीलार्थी/अभियुक्त ने सूचनाकर्ता/पीड़िता के नग्न वीडियो और तस्वीरें केवल इसलिए रिकॉर्ड कीं और व्हाट्सएप के माध्यम से प्रसारित कीं, क्योंकि पीड़िता ने अभियुक्त की यौन इच्छाओं (Sexual Desires) को पूरा करने से इनकार कर दिया था।”
4. फरार आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं:
- अदालत ने अभियुक्त के आचरण पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मामला दर्ज होने के बाद से वह लगातार गिरफ्तारी से बच रहा था और उसका मोबाइल फोन—जो अपराध का मुख्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य था—अब तक जब्त नहीं किया जा सका था:“वर्तमान मामले में अपीलार्थी/अभियुक्त अपराध दर्ज होने की तिथि से ही फरार (Absconding) रहा है। अतः वह अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है। प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि वह स्वयं अपनी गिरफ्तारी से बच रहा है और विवेचना अधिकारी (IO) के समक्ष साक्ष्य एकत्र करने में बाधाएं (Hurdles) उत्पन्न कर रहा है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: ब्लैकमेलिंग से व्हाट्सएप प्रसार तक का घटनाक्रम
- परिचय और यौन संबंध की मांग:
- अभियोजन के अनुसार, पीड़िता अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित महिला है, जबकि अभियुक्त गैर-एससी/एसटी वर्ग का है।
- दोनों एक ही इलाके में रहते थे, जिसके चलते अभियुक्त पीड़िता की जाति से पूरी तरह भली-भांति अवगत था।
- अभियुक्त ने महिला पर शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डाला। जब पीड़िता ने उसके अनैतिक प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया, तो उसने महिला की आपत्तिजनक और निजी तस्वीरों व वीडियो को हथियार बना लिया।
- व्हाट्सएप पर प्रसार:
- प्रतिशोध की भावना से अभियुक्त ने अपने मोबाइल से पीड़िता के नग्न/आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें उसके पति, करीबी रिश्तेदारों और अन्य परिचितों को व्हाट्सएप चैट व संदेशों के जरिए भेज दिए, जिससे महिला की वैवाहिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा।
- प्राथमिकी और वैधानिक धाराएं:
- पीड़िता की शिकायत पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के प्रावधानों, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 66E/67, और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
- निचली अदालतों का दौर:
- विशेष न्यायाधीश ने अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज कर दी।
- इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां शुरुआत में अंतरिम राहत मिली थी। परंतु विस्तृत अंतिम सुनवाई और केस डायरी के अवलोकन के बाद अदालत ने पाया कि मामला गंभीर है और एससी/एसटी एक्ट की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत वर्जित है।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की प्रासंगिक धाराएं:
- धारा 3(1)(w)(ii): यदि कोई व्यक्ति, जो अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य नहीं है, किसी एससी/एसटी महिला की सहमति के बिना लैंगिक प्रकृति के शब्दों, कृत्यों या संकेतों का प्रयोग करता है या उसकी तस्वीरों/वीडियो को उसकी गरिमा के विरुद्ध प्रसारित करता है, तो वह दंडनीय अपराध है।
- धारा 3(2)(va): भारतीय दंड संहिता (वर्तमान BNS) की अनुसूची में उल्लिखित अपराधों को यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल इस ज्ञान के साथ किया जाए कि वह एससी/एसटी समुदाय से है, तो बढ़ी हुई सजा का प्रावधान।
- धारा 18 एवं 18A:
- धारा 18 स्पष्ट रूप से प्रावधान करती है कि इस कानून के तहत किए गए किसी भी अपराध के आरोपी पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 [वर्तमान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 — अग्रिम जमानत] के प्रावधान लागू नहीं होंगे।
- पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020, 3-जज बेंच, सुप्रीम कोर्ट) में शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी थी कि यदि प्राथमिकी के अवलोकन से प्रथम दृष्टया अपराध बनता दिखता है, तो धारा 18 की वैधानिक रोक पूर्ण रूप से प्रभावी रहेगी।
- ‘पब्लिक व्यू’ का आधुनिक डिजिटल विस्तार:
- सूचना प्रौद्योगिकी के युग में ‘पब्लिक व्यू’ केवल किसी सड़क, चौराहे या खुले मैदान तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया समूह, व्हाट्सएप फॉरवर्ड और डिजिटल प्रसारण—जहां एक से अधिक व्यक्ति सामग्री को देख और प्राप्त कर सकते हैं—कानून की नजर में ‘पब्लिक व्यू’ की कसौटी को पूरी तरह संतुष्ट करते हैं।
- अदालत ने इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु किरण बनाम राजकुमार जीवराज जैन व अन्य (2025) के निर्णय पर भी भरोसा किया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अभियुक्त / अपीलार्थी बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य [आपराधिक अपील संख्या – धारा 14-A, SC/ST Act – बॉम्बे उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति वाई.जी. खोबरागड़े (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलार्थी (अभियुक्त) की ओर से: अधिवक्ता महेश राय
- प्रतिवादी राज्य की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) जी.एस. उमले
- पीड़िता (प्रतिवादी संख्या 2) की ओर से: अधिवक्ता संकेत जोशी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989:
- धारा 3(1)(w)(ii) (महिला के शील और गरिमा को लैंगिक रूप से ठेस पहुंचाना)
- धारा 3(2)(va) (अनुसूची में निर्दिष्ट अपराधों के लिए विशेष दंड)
- धारा 14-A (जमानत आदेशों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील)
- धारा 18 एवं 18A (अग्रिम जमानत के आवेदन पर पूर्ण वैधानिक रोक)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) [शील भंग, महिला की गरिमा पर आघात एवं आपराधिक धमकी से संबंधित प्रावधान]
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act):
- धारा 66E (निजता के हनन के लिए दंड – सहमति के बिना निजी अंगों के चित्र खींचना या प्रसारित करना)
- धारा 67 / 67A (इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील या कामुक सामग्री का प्रकाशन व संचरण)
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989:
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि प्रथम दृष्टया एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध का गठन होता है, तो धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर पूर्ण रोक लागू होगी; अग्रिम जमानत केवल उन्हीं दुर्लभ मामलों में दी जा सकती है जहां शिकायत स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण या आधारहीन हो।’
- किरण बनाम राजकुमार जीवराज जैन (2025, बॉम्बे हाईकोर्ट) — ‘डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर जाति या गरिमा को आघात पहुंचाने वाले संदेशों और मीडिया का प्रसारण ‘पब्लिक व्यू’ के वैधानिक परीक्षण को पूरा करता है।’
- लवेश बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (सुप्रीम कोर्ट) — ‘घोषित या फरार (Absconding) आरोपी जो कानून की प्रक्रिया और गिरफ्तारी से बच रहा हो, वह अग्रिम जमानत जैसी असाधारण व विवेकाधीन राहत का दावा नहीं कर सकता।’
- अंतिम निर्णय: आपराधिक अपील पूरी तरह खारिज; अग्रिम जमानत देने से इनकार करने का विशेष अदालत का आदेश बरकरार; विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़िता की ओर से नियुक्त अधिवक्ता का पारिश्रमिक नियमानुसार भुगतान करने का निर्देश।
Whatsapp Chat: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति वाई. जी. खोब्रागड़े (Justice Y.G. Khobragade) |
| संबद्ध अधिनियम | BNS 2023, IT Act 2000 एवं SC/ST Act, 1989 (धारा 3(1)(w)(ii), 3(2)(va) और 18) |
| मुख्य मुद्दा | क्या WhatsApp पर आपत्तिजनक कंटेंट शेयर करना SC/ST एक्ट के तहत “Public View” की शर्त पूरी करता है? |
| अदालत का फैसला | हाँ, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर परिजनों/अन्यों को शेयर करना ‘Public View’ माना जाएगा। धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत खारिज। |

