सुप्रीम कोर्ट में उठाए गए मुख्य बिंदु
- कानूनी अनुपालन में गंभीर कमियां:मामले में पेश हुए अधिवक्ता राहुल बजाज ने RPwD Act, 2016 और Mental Healthcare Act, 2017 के तहत वैधानिक अनुपालन में भारी अंतराल और कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया।
- अनिवार्य पंजीकरण और निगरानी का अभाव:अधिवक्ता ने तर्क दिया कि RPwD Act के तहत दिव्यांग व्यक्तियों के लिए बने पुनर्वास केंद्रों का राज्य स्तर पर पंजीकरण अनिवार्य है। हालांकि, यह जांचने के लिए अनुभवजन्य आंकड़ों (Empirical Data) की सख्त आवश्यकता है कि क्या राज्यों में वैधानिक प्राधिकरणों का वास्तव में गठन किया गया है और क्या वे इन संस्थानों की सक्रिय निगरानी कर रहे हैं।
- न्यूनतम मानकों की कमी:यह उजागर किया गया कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के लागू होने के बावजूद अब तक केवल 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के लिए आवश्यक न्यूनतम मानकों (Minimum Standards) को अधिसूचित किया है।
- आवधिक ऑडिट और निरीक्षण:इन केंद्रों में रहने वाले बच्चों के कल्याण की सुरक्षा और अनुपालन लागू करने के लिए अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले नियमित निरीक्षणों और ऑडिट के संबंध में डेटा/जानकारी का पूरी तरह अभाव है।
नई दिल्ली: देश भर में दिव्यांग बच्चों (Children with Disabilities) की देखभाल, पुनर्वास केंद्रों (Rehabilitation Centres) के अनिवार्य पंजीकरण, विधिक मानकों के निर्धारण, तथा मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों में निगरानी और निरीक्षण तंत्र के अभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
‘नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड’ (NPRD) द्वारा दायर याचिका
सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश ‘नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड’ (NPRD) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 (Mental Healthcare Act) के अनिवार्य वैधानिक प्रावधानों के जमीनी स्तर पर लचर अनुपालन की ओर शीर्ष अदालत का ध्यान आकर्षित किया गया था। अदालत ने केंद्र सरकार को सभी राज्यों के साथ तत्काल समन्वय स्थापित करने और मामले की अगली सुनवाई की तिथि 22 अक्टूबर 2026 से पहले अनुपालन रिपोर्ट रिकॉर्ड पर लाने का स्पष्ट निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से विस्तृत आंकड़े एकत्र करे और पुनर्वास केंद्रों के विनियमन, ऑडिट और वैधानिक निकायों के गठन पर एक व्यापक स्थिति रिपोर्ट शपथ पत्र के माध्यम से अदालत में पेश करे।
शीर्ष अदालत के समक्ष उठाए गए प्रमुख विधिक मुद्दे एवं विसंगतियां
मामले में उपस्थित अधिवक्ता राहुल बजाज ने दोनों प्रमुख केंद्रीय कानूनों के क्रियान्वयन में मौजूद गंभीर कमियों को उजागर किया:
1. RPwD एक्ट, 2016 के तहत अनिवार्य पंजीकरण और नियामक निकायों का अभाव:
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत दिव्यांग व्यक्तियों और बच्चों के लिए संचालित सभी पुनर्वास केंद्रों और संस्थाओं का राज्य स्तर पर सक्षम प्राधिकारी के पास अनिवार्य पंजीकरण (Compulsory Registration) होना विधिक रूप से आवश्यक है।
- अधिवक्ता राहुल बजाज ने दलील दी कि जमीनी स्तर पर यह जानने के लिए कोई ठोस अनुभवजन्य डेटा (Empirical Data) उपलब्ध नहीं है कि क्या राज्यों में इन विहित वैधानिक प्राधिकरणों (Statutory Authorities) का वास्तव में गठन हुआ भी है या नहीं, और क्या वे इन संस्थानों की सक्रिय निगरानी कर रहे हैं।
2. मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017: केवल 10 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने अधिसूचित किए मानक:
- अदालत को बताया गया कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के लागू होने के वर्षों बाद भी देश के केवल 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के लिए आवश्यक ‘न्यूनतम मानक’ (Minimum Standards) अधिसूचित किए हैं।
- अधिकांश राज्यों में अभी तक राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (State Mental Health Authorities) और मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड (Mental Health Review Boards) पूरी तरह सक्रिय नहीं हो सके हैं।
3. समयबद्ध ऑडिट और निरीक्षण प्रोटोकॉल की अनुपस्थिति:
- याचिकाकर्ता ने रेखांकित किया कि इन संस्थाओं में रहने वाले बेसहारा व दिव्यांग बच्चों के कल्याण और सुरक्षा की रक्षा के लिए अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले आवधिक निरीक्षणों (Periodic Audits and Inspections) से संबंधित कोई पुख्ता जानकारी या पारदर्शी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, जिससे बच्चे शोषण और अमानवीय परिस्थितियों के जोखिम में रहते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को जारी 3-सूत्रीय निर्देश
शीर्ष अदालत ने इन दलीलों का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार (सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय / दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग) को निर्देश दिया कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से समन्वय स्थापित कर निम्नलिखित बिंदुओं पर राज्यवार विस्तृत रिपोर्ट तैयार करे:
- वैधानिक प्राधिकरणों का गठन एवं कार्यप्रणाली: RPwD Act, 2016 के तहत प्रत्येक राज्य में सक्षम पंजीकरण प्राधिकारियों और राज्य सलाहकार बोर्डों का गठन हुआ है या नहीं और वे किस प्रकार कार्य कर रहे हैं।
- न्यूनतम मानकों का निर्धारण एवं अधिसूचना: Mental Healthcare Act, 2017 के तहत मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के संचालन हेतु न्यूनतम मानकों का निर्माण और संबंधित राज्यों द्वारा उनका औपचारिक गजट नोटिफिकेशन।
- निरीक्षण एवं निगरानी तंत्र (Monitoring Protocols): दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों का नियमित, आकस्मिक निरीक्षण करने और उनके कल्याण की निगरानी के लिए राज्यों में वर्तमान में लागू प्रोटोकॉल व तंत्र का संपूर्ण विवरण।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 21 एवं दिव्यांग बच्चों के अधिकार:
- सर्वोच्च न्यायालय ने निरंतर दोहराया है कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार समाज के सबसे कमजोर वर्ग—विशेषकर दिव्यांग बच्चों—पर पूर्ण रूप से लागू होता है। संस्थागत देखभाल (Institutional Care) में रहने वाले बच्चों को सुरक्षित और मानक-युक्त वातावरण प्रदान करना राज्य का सकारात्मक संवैधानिक दायित्व है।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016):
- अध्याय IX (संस्थाओं का पंजीकरण): धारा 50 से 53 स्पष्ट करती है कि बिना वैध पंजीकरण के कोई भी व्यक्ति या गैर-सरकारी संगठन दिव्यांगों के लिए कोई संस्था स्थापित या संचालित नहीं कर सकता।
- धारा 51: पंजीकरण के लिए न्यूनतम अवसंरचना, योग्य स्टाफ और सुरक्षा मानकों की पूर्ति अनिवार्य शर्त है।
- मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 (Mental Healthcare Act, 2017):
- धारा 65 एवं 66: प्रत्येक मानसिक स्वास्थ्य संस्थान का राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण के पास पंजीकरण अनिवार्य है और उन्हें निर्धारित न्यूनतम भौतिक, चिकित्सीय और कार्मिक मानकों का पालन करना होता है।
- संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार सम्मेलन (UNCRPD):
- भारत यूएनसीआरपीडी का हस्ताक्षरकर्ता है। इसके तहत बच्चों को संस्थागत हिंसा, उपेक्षा और दुर्व्यवहार से बचाने के लिए स्वतंत्र निगरानी तंत्र (Independent Monitoring Framework) स्थापित करना अनिवार्य अंतर्राष्ट्रीय दायित्व है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड बनाम दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- आदेश की तिथि: 8 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 22 अक्टूबर 2026
- याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी: अधिवक्ता राहुल बजाज
- प्रतिवादी: भारत संघ (दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग) एवं सभी राज्य सरकारें
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) की धाराएं 50, 51, 52 (संस्थाओं का अनिवार्य पंजीकरण व विनियमन)
- मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की धाराएं 65, 66 (मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के न्यूनतम मानक व पंजीकरण)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21, 32 एवं अनुच्छेद 47
- वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से समन्वय स्थापित कर राज्यवार अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का केंद्र सरकार को दिया कड़ा निर्देश; अगली सुनवाई 22 अक्टूबर 2026 को निर्धारित।
Mental Healthcare:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय |
| याचिकाकर्ता | नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड (NPRD) |
| मुख्य मुद्दा | दिव्यांग और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी पुनर्वास केंद्रों में वैधानिक अनुपालन और मानकों की कमी |
| संबंधित कानून | दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) एवं मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 (Mental Healthcare Act) |
| अगली सुनवाई | 22 अक्टूबर 2026 |

