Misconduct Case: कर्नाटक हाईकोर्ट ने वकीलों के पेशेवर आचरण और पुलिस थानों के भीतर कानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर एक बेहद कड़ा विधिक संदेश दिया है।
महिला वकील के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इंकार
हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने याचिका को बंद करते हुए स्पष्ट किया कि एक वकील का ऐसा आचरण बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और कोर्ट याचिकाकर्ता को राहत देकर उनके इस अनुचित व्यवहार को बढ़ावा (Premium on conduct) नहीं दे सकता। हालांकि, हाई कोर्ट ने महिला वकील को निचली अदालत के समक्ष ‘डिस्चार्ज एप्लिकेशन’ (Discharge Application – आरोपमुक्ति की अर्जी) दाखिल करने की विधिक स्वतंत्रता दी है। अदालत ने बेंगलुरु के एक थाने में कथित तौर पर हंगामा और तोड़फोड़ करने के आरोप में घिरी एक महिला वकील के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द (Quash) करने से पूरी तरह इनकार कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि: रोड रेज से शुरू हुआ विवाद (Case Background)
यह मामला फरवरी 2025 की एक घटना से जुड़ा है, जिसने बाद में एक बड़े विधिक और पुलिस-वकील विवाद का रूप ले लिया।
रोड रेज और पुलिस की देरी: याचिकाकर्ता महिला वकील के अनुसार, 23-24 फरवरी 2025 की दरमियानी रात एक ऑटो-रिक्शा चालक ने उनकी कार को ओवरटेक किया और पत्थर मारकर उनकी कार का शीशा तोड़ दिया। वह इसकी शिकायत दर्ज कराने मडिवाला (Madiwala) पुलिस थाने पहुंचीं, जहां उन्हें कथित तौर पर दो घंटे तक इंतजार कराया गया।
थाने में हंगामा: पुलिस द्वारा तुरंत शिकायत न दर्ज किए जाने से नाराज होकर महिला वकील अपना आपा खो बैठीं। आरोप है कि उन्होंने थाने के भीतर हंगामा किया, मेज पर रखे सरकारी कागजात और अन्य सामान हवा में फेंक दिए।
महिला सब-इंस्पेक्टर की एंट्री: इसी दौरान नाइट पेट्रोलिंग से लौटीं महिला सब-इंस्पेक्टर (SI) पद्मावती ने थाने में दखल दिया और आरोप है कि उन्होंने महिला वकील के साथ मारपीट की। यह पूरी घटना थाने के सीसीटीवी (CCTV) कैमरों में रिकॉर्ड हो गई थी।
दर्ज की गई धाराएं: पुलिस विभाग ने महिला वकील के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया, जिसमें धारा 121(1): लोक सेवक को कर्तव्य से रोकने के लिए स्वेच्छा से चोट पहुंचाना, धारा 132: लोक सेवक पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग, धारा 351(2) और 351(3): आपराधिक धमकी (Criminal Intimitation)।
हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी: ‘आपको कानून के शिकंजे से कैसे छोड़ दें?’
सुनवाई के दौरान महिला वकील के वकील ने माना कि उनकी मुवक्किल का आचरण अनुचित था, लेकिन उन्होंने दलील दी कि यह ऐसा अपराध नहीं है जिसके लिए आपराधिक मुकदमा चलाया जाए। वकील ने कोर्ट के सामने बिना शर्त माफी (Unconditional Apology) मांगने और समाज सेवा (Community Service) करने की पेशकश करते हुए केस रद्द करने की गुहार लगाई।
इस पर जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा, आप मुझे बताइए कि आपको कानून के शिकंजे से कैसे छोड़ दिया जाए? अगर मैं आपकी इस याचिका को स्वीकार करता हूं, तो इसका मतलब होगा कि मैं आपके इस अनुचित आचरण को पुरस्कृत (Putting a premium on conduct) कर रहा हूं। आपके खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और आपको जमानत भी मिल चुकी है। इससे आपके साथ कोई अन्याय नहीं हो रहा है। आप पुलिस थाने में इस तरह का व्यवहार कतई नहीं कर सकते।
समानांतर विधिक कार्रवाई: दोषी महिला पुलिसकर्मी पर भी ₹1 लाख का जुर्माना
इस मामले का दूसरा पहलू यह है कि हाई कोर्ट ने केवल वकील के खिलाफ ही नहीं, बल्कि सत्ता का दुरुपयोग करने वाली महिला सब-इंस्पेक्टर पद्मावती के खिलाफ भी बेहद कड़ा रुख अपनाया है:
अप्रैल 2024 (विधिक आदेश): हाई कोर्ट ने बेंगलुरु पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वकील से मारपीट करने वाली एसआई पद्मावती के खिलाफ केवल विभागीय जांच (Departmental Inquiry) काफी नहीं है, बल्कि उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर जांच की जानी चाहिए।
9 जून का आदेश (जुर्माना): सब-इंस्पेक्टर ने अपने खिलाफ दर्ज केस को रद्द कराने के लिए याचिका दायर की थी और तथ्यों को छुपाकर हाई कोर्ट की एक अन्य पीठ से अंतरिम रोक (Interim Stay) हासिल कर ली थी। जस्टिस नागप्रसन्ना की पीठ ने तथ्यों को छुपाने (Suppression of Facts) के लिए महिला एसआई पर ₹1 लाख का भारी-भरकम जुर्माना लगाते हुए उनकी याचिका को खारिज कर दिया था।
अदालत का अंतिम विधिक आदेश
हाई कोर्ट ने महिला वकील के खिलाफ मुख्य आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए निर्देश दिए। इसमें याचिकाकर्ता निचली अदालत (Trial Court) के समक्ष अपनी आरोपमुक्ति (Discharge) के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र हैं। हाई कोर्ट के समक्ष उठाई गई सभी विधिक दलीलें वे निचली अदालत के सामने उठा सकती हैं, और संबंधित अदालत को उन सभी बिंदुओं पर विचार कर अपना आदेश पारित करना होगा। निचली अदालत को यह डिस्चार्ज आवेदन दाखिल होने के 8 सप्ताह (Two Months) के भीतर तय करना होगा। यदि निचली अदालत से डिस्चार्ज अर्जी खारिज होती है, तो याचिकाकर्ता के पास दोबारा हाई कोर्ट आने का विधिक विकल्प (Liberty) सुरक्षित रहेगा।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक/मुख्य बिंदु | कर्नाटक उच्च न्यायालय का विधिक रुख (जून 2026) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एम. नागप्रसन्ना (कर्नाटक हाई कोर्ट)। |
| याचिकाकर्ता का पक्ष | महिला अधिवक्ता (बेंगलुरु), जिन पर थाने में तोड़फोड़ और हंगामा करने का आरोप है। |
| लागू कानून | भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं 121(1), 132, 351(2) और 351(3)। |
| अदालत का मुख्य विधिक रुख | वकीलों को थाने के भीतर कानून हाथ में लेने या अभद्र व्यवहार करने का कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। |
| प्रदान की गई राहत | मुख्य केस रद्द नहीं किया, लेकिन 8 सप्ताह के भीतर ‘Discharge Application’ पर फैसला करने की स्वतंत्रता दी। |
| सह-आरोपी पुलिसकर्मी की स्थिति | मारपीट की आरोपी महिला एसआई की याचिका भी खारिज; तथ्य छुपाने पर ₹1 लाख का जुर्माना लग चुका है। |

