सुप्रीम कोर्ट का रुख और समयसीमा (Timeline)
- राज्यों को 3 सप्ताह का समय: सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट पर 3 सप्ताह के भीतर केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय को अपनी प्रतिक्रिया भेजने का निर्देश दिया गया।
- 2 सप्ताह में रोडमैप: राज्यों के जवाब मिलने के बाद, एमिकस क्यूरी और केंद्र सरकार मिलकर अगले 2 सप्ताह में एक साझा रोडमैप तैयार करेंगे।
- एक राष्ट्र, एक एग्रीमेंट बनाम राज्यों की स्वायत्तता: याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने “वन नेशन, वन बिल्डर-बायर एग्रीमेंट” की वकालत की। हालांकि, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की कि स्थानीय कानूनों और जटिलताओं के आधार पर राज्यों को RERA के दायरे में रहते हुए थोड़ी बहुत भिन्नता (Deviation) की छूट देना आवश्यक है।
नई दिल्ली: देशभर में रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाने और खरीदारों के अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ‘मॉडल बिल्डर-बायर एग्रीमेंट’ (Model Builder-Buyer Agreement) और ‘एजेंट-बायर एग्रीमेंट’ तैयार करने की दिशा में केंद्र सरकार और न्यायमित्र (Amicus Curiae) से एक व्यावहारिक ‘रोडमैप’ पेश करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि एक राष्ट्रव्यापी मॉडल समझौता तैयार करते समय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की स्थानीय परिस्थितियों और कानूनों के अनुसार कुछ छूट (Deviations) दी जानी चाहिए।
न्यायमित्र की स्टेटस रिपोर्ट: राज्यों का 4 श्रेणियों में वर्गीकरण
अदालत द्वारा नियुक्त न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता देवाशीष भरूका ने एक विस्तृत स्थिति रिपोर्ट (Status Report) पेश की, जिसमें RERA अधिनियम, 2016 के प्रावधानों से राज्यों के नियमों में आए विचलन (Deviations) को रेखांकित किया गया। रिपोर्ट में राज्यों को चार श्रेणियों में बांटा गया:
- श्रेणी 1: वे राज्य जिन्होंने अभी तक ‘एग्रीमेंट फॉर सेल’ (Agreement for Sale) अधिसूचित ही नहीं किया है।
- श्रेणी 2: वे राज्य जिन्होंने केंद्रीय RERA प्रावधानों से कोई विचलन नहीं किया है।
- श्रेणी 3: वे राज्य जिन्होंने RERA से विचलन किया है, लेकिन इसका कोई ठोस औचित्य (Justification) नहीं दिया है।
- श्रेणी 4: वे राज्य जिन्होंने विचलन किया है और उसका विधिक औचित्य भी प्रस्तुत किया है।
एमिकस क्यूरी की स्टेटस रिपोर्ट और RERA से विचलन (Deviations)
न्याय मित्र देवाशीष भारुका ने कोर्ट में रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि कई राज्यों के नियमों में RERA एक्ट 2016 के प्रावधानों से गंभीर भिन्नताएं (Deviations) पाई गई हैं:
- परिभाषाओं का अभाव: कई राज्यों के ड्राफ्ट एग्रीमेंट में जरूरी परिभाषाएं गायब हैं। एमिकस ने कहा कि अनुबंध इतना स्पष्ट होना चाहिए कि खरीदार को बार-बार RERA कानून न देखना पड़े।
- ‘कॉमन एरिया’ की परिभाषा में ढील: यूपी और हरियाणा जैसे राज्यों ने अपने स्थानीय कानूनों का हवाला देकर ‘कॉमन एरिया’ (Common Area) की परिभाषा को कमजोर/ढीला किया है।
- अन्य प्रमुख अंतर: कुल कीमत (Total Price), करों के भुगतान (Taxes), प्रोजेक्ट मंजूरी, प्रमोटर के वादे, आवंटन रद्द करने के नियम, डिफॉल्ट पर हर्जाना और अतिरिक्त निर्माण पर प्रतिबंध जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर राज्यों के नियमों में भारी अंतर है।
RERA प्रावधानों में राज्यों द्वारा किए गए प्रमुख विचलन
न्यायमित्र ने अदालत को बताया कि विभिन्न राज्यों के नियमों में कई विसंगतियां हैं:
- परिभाषाओं का अभाव: कई राज्यों के नियमों में मुख्य परिभाषाएं ही गायब हैं, जिससे खरीदारों को बार-बार मूल अधिनियम देखना पड़ता है।
- ‘कॉमन एरिया’ की परिभाषा का कमजोर होना: RERA में कॉमन एरिया स्पष्ट रूप से परिभाषित है, लेकिन हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने अपने स्थानीय कानूनों के तहत इसे कुछ हद तक कमजोर (Dilute) किया है।
- अस्पष्ट क्लॉज: कुल कीमत का निर्धारण, टैक्स समायोजन, प्रमोटर द्वारा स्वीकृतियां प्राप्त करना, अपार्टमेंट का स्वामित्व, दोषपूर्ण टाइटल पर मुआवजा, अलॉटी द्वारा रद्दीकरण, अतिरिक्त निर्माण पर रोक और पजेशन न लेने पर होल्डिंग चार्ज जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर राज्यों के नियमों में एकरूपता नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: ‘राज्यों को स्थानीय कानूनों के तहत कुछ छूट आवश्यक’
याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा ‘एक राष्ट्र, एक बिल्डर-बायर समझौता’ (One Nation, One Builder-Buyer Agreement) की मांग पर पीठ ने व्यावहारिक रुख अपनाते हुए कहा: “हम राज्यों को स्थानीय कानूनों के तहत थोड़ी-बहुत छूट (Deviations) से पूरी तरह वंचित नहीं कर सकते। कुछ स्थानीय जटिलताएं और आवश्यकताएं होती हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय समय-सीमा व निर्देश
- राज्यों की प्रतिक्रिया (3 सप्ताह): सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया कि वे न्यायमित्र की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया और आपत्तियां 3 सप्ताह के भीतर केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) को सौंपें।
- रोडमैप तैयार करना (2 सप्ताह): राज्यों की प्रतिक्रिया मिलने के बाद अगले 2 सप्ताह के भीतर, न्यायमित्र और केंद्र सरकार (अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी के माध्यम से) मिलकर एक साझा रोडमैप तैयार करेंगे।
- सेंट्रल एडवाइजरी काउंसिल: इस प्रक्रिया में केंद्रीय सलाहकार परिषद (CAC) को भी शामिल करने का सुझाव दिया गया है ताकि सभी पक्षों के हितों में संतुलन साधा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया: “हम राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार थोड़ी भिन्नता (Deviation) देने की अनुमति से पूरी तरह वंचित नहीं कर सकते। हर राज्य की अपनी कुछ जटिलताएं होती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह सुनिश्चित किया जाएगा कि RERA के मूल सुरक्षा प्रावधान किसी भी हाल में कमजोर न हों।”
Model Builder-Buyer Agreement: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Order)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ एवं न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना |
| न्याय मित्र (Amicus Curiae) | अधिवक्ता देवाशीष भारुका (Devashish Bharuka) |
| केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व | अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी |
| राज्यों का विभाजन (4 श्रेणियां) | 1. जिन्होंने एग्रीमेंट अधिसूचित नहीं किया 2. जिन्होंने RERA नियमों से विचलन (Deviation) नहीं किया 3. जिन्होंने बिना कारण विचलन किया 4. जिन्होंने विचलन के साथ कारण दिया |
| मुख्य विवाद | यूपी और हरियाणा जैसे राज्यों द्वारा ‘कॉमन एरिया’ (Common Area) जैसी RERA की परिभाषाओं को स्थानीय कानूनों से ढीला (Dilute) करना। |

