कर्नाटका हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- ‘Ordinarily Resides’ का वास्तविक अर्थ: पीठ ने धारा 9 की व्याख्या करते हुए कहा कि कानून में “सामान्य रूप से निवास करता है” (Ordinarily Resides) शब्द का प्रयोग हुआ है, न कि वह स्थान जहां बच्चा याचिका दायर करने की तिथि पर संयोगवश पाया जाता है या रखा जाता है।
- अपनी ही गलती का लाभ नहीं: हाईकोर्ट ने माना कि यदि पिता के तर्क को स्वीकार कर लिया जाए, तो कोई भी माता या पिता अपनी मर्जी से बच्चे को किसी भी शहर ले जाकर मनपसंद अदालत (Forum Shopping) का चयन कर लेंगे। किसी पक्ष को अपने ही एकतरफा कृत्य का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
- बच्चे का कल्याण सर्वोच्च: कस्टडी से जुड़े मामलों में बच्चे का सर्वोत्तम हित और कल्याण सर्वोपरि होता है, जिसे किसी माता-पिता के एकतरफा कदम पर निर्भर नहीं छोड़ा जा सकता।
बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी (Child Custody) और क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति डी. के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कस्टडी याचिका उस अदालत के समक्ष दायर की जा सकती है जिसके क्षेत्राधिकार में बच्चा हटाए जाने से ठीक पहले सामान्य रूप से रह रहा था। अदालत ने बेंगलुरु फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने याचिका इस आधार पर लौटा दी थी कि बच्चा अब पिता के साथ बागलकोट जिले में रह रहा है। अदालत ने फैसला सुनाया है कि वैवाहिक विवाद के दौरान यदि माता या पिता में से कोई एक बच्चे को जबरन या एकतरफा तरीके से किसी दूसरी जगह ले जाकर रखता है, तो केवल इस आधार पर बच्चे का ‘साधारण निवास’ (Ordinary Residence) बदला हुआ नहीं माना जाएगा।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. ‘फोरम शॉपिंग’ की अनुमति नहीं दी जा सकती अभिभावक द्वारा क्षेत्राधिकार तय करने की चालाकी पर अदालत ने कहा: “केवल इसलिए कि माता-पिता में से कोई एक विवाद के दौरान बच्चे को दूसरी जगह ले जाता है और उसे वहां रखता है, यह नहीं कहा जा सकता कि बच्चे का साधारण निवास बदल गया है। यदि ऐसे निष्कासन (Removal) के आधार पर अदालत का क्षेत्राधिकार तय करने की अनुमति दी गई, तो बच्चे को ले जाने वाला माता या पिता प्रभावी रूप से कस्टडी विवाद के निपटारे के लिए अपनी पसंद की अदालत (Forum) चुनने में सक्षम हो जाएगा। ऐसे परिणाम को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
2. वर्तमान भौतिक उपस्थिति नहीं, वास्तविक निवास महत्वपूर्ण गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 9 की व्याख्या करते हुए पीठ ने रेखांकित किया: “धारा 9 में ‘साधारण रूप से निवास’ (Ordinarily Resides) शब्द का उपयोग किया गया है, न कि उस स्थान का जहां याचिका दायर करने की तिथि पर बच्चा पाया जाता है या रखा गया है। अदालत को उन परिस्थितियों को देखना होगा जिनके तहत बच्चा किसी स्थान पर रह रहा था और किन परिस्थितियों में उसे वहां से हटाया गया। यदि पिता द्वारा बच्चे को हटाने के कृत्य का लाभ उसे क्षेत्राधिकार बदलने के रूप में दिया गया, तो यह दूसरे पक्ष के अधिकारों के साथ घोर अन्याय होगा।”
मामले की पृष्ठभूमि और पारिवारिक विवाद
- माँ की कस्टडी याचिका: अपीलकर्ता माँ ने अपने नाबालिग बेटे की कस्टडी के लिए ‘गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890’ की धारा 7 के तहत बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी।
- फैमिली कोर्ट का आदेश: फैमिली कोर्ट ने याचिका को यह कहते हुए लौटा दिया था कि बच्चा वर्तमान में अपने पिता के साथ इल्कल तालुक (बागलकोट जिला) में रह रहा है, इसलिए याचिका बागलकोट की सक्षम अदालत में दाखिल की जानी चाहिए।
- माँ की दलीलें:
- बच्चा सामान्य रूप से बेंगलुरु में अपनी माँ के साथ रह रहा था।
- पिता उसे 15 दिनों में लौटाने का वादा करके ले गया और फिर वापस नहीं लाया।
- माँ ने स्वेच्छा से बच्चे की कस्टडी नहीं छोड़ी थी, इसलिए पिता के एकतरफा कृत्य से बेंगलुरु फैमिली कोर्ट का क्षेत्राधिकार समाप्त नहीं हो सकता।
- बेंगलुरु से बच्चे को ले जाना: मां (अपीलकर्ता) ने बेंगलुरु स्थित फैमिली कोर्ट में अपने नाबालिग बेटे की कस्टडी के लिए गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 7 के तहत याचिका दायर की थी। मां का तर्क था कि बच्चा बेंगलुरु में उसके साथ सामान्य रूप से रह रहा था, जिसे पिता 15 दिनों में वापस लाने का वादा करके इल्कल तालुक (बागलकोट जिला) ले गया और वापस नहीं लौटाया।
- फैमिली कोर्ट का फैसला: बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका लौटा दी कि बच्चा अब पिता के साथ बागलकोट में रह रहा है, इसलिए क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) बागलकोट कोर्ट का बनता है। मां ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
- पिता का तर्क: पिता ने गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 9 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि बच्चा वर्तमान में उसके साथ बागलकोट में रह रहा है, इसलिए कानूनन केवल वहीं की अदालत को सुनवाई का अधिकार है।
हाईकोर्ट द्वारा दिए गए मुख्य आधार
- धारा 9 की मूल भावना: अदालत का क्षेत्राधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि यदि बच्चे को उस स्थान से न हटाया गया होता, तो वह सामान्य रूप से कहाँ रहता।
- बच्चे का कल्याण सर्वोपरि (Welfare of the Child): बच्चे का सर्वोत्तम हित माता-पिता में से किसी एक के एकतरफा कृत्य पर निर्भर नहीं हो सकता। विवाद उत्पन्न होने से पहले की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही अधिकार क्षेत्र तय होगा।
- खुद की गलती का लाभ नहीं: कोई भी पक्ष बच्चे को जबरन दूसरी जगह ले जाकर अपने पक्ष में नया क्षेत्राधिकार (Different Forum) तैयार नहीं कर सकता।
अंतिम आदेश
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने मामले को बेंगलुरु फैमिली कोर्ट में पुनः बहाल (Restore) करने का निर्देश दिया और फैमिली कोर्ट को गुण-दोष के आधार पर कस्टडी याचिका पर नए सिरे से विचार करने का आदेश दिया।
कर्नाटका हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण ने अपने आदेश में कहा: “माता या पिता में से किसी एक द्वारा विवाद के दौरान बच्चे को दूसरी जगह ले जाने और रखने मात्र से बच्चे का सामान्य निवास परिवर्तित नहीं माना जा सकता। यदि इस तरह हटाए जाने से क्षेत्राधिकार तय करने की अनुमति दी गई, तो बच्चे को ले जाने वाले अभिभावक को कस्टडी विवाद के निपटारे के लिए खुद फोरम चुनने की छूट मिल जाएगी। ऐसे परिणाम को स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
विधिक प्रतिनिधित्व
- अपीलकर्ता (माँ) की ओर से: अधिवक्ता नरेश कुमार जैन।
- प्रतिवादी (पिता) की ओर से: अधिवक्ता शिवानंद रेड्डी आर. वी.।
Territorial Jurisdiction: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटका उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति डी.के. सिंह एवं न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण |
| संबंधित कानून | गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 9 एवं धारा 7 |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | ‘सामान्य निवास’ का मतलब वह जगह नहीं जहां बच्चा अर्जी के समय मौजूद है, बल्कि वह जगह है जहां वह विवाद से ठीक पहले रह रहा था। |
| अदालत का फैसला | मां की अपील स्वीकार; बेंगलुरु फैमिली कोर्ट को कस्टडी याचिका पर दोबारा सुनवाई के निर्देश। |

