Friday, October 2, 2026
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CHILD-GUARDIAN: बच्ची की भलाई के लिए मां की देखभाल सबसे बेहतर, पिता के बाद मां ही प्राकृतिक अभिभावक

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने मंगलवार को एक पांच साल की बच्ची की कस्टडी उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया।

दादा-दादी के पास रह रही है बच्ची

बच्ची अब तक अपने पिता के माता-पिता यानी दादा-दादी के साथ रह रही है। कोर्ट ने कहा कि हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षक अधिनियम के अनुसार, किसी नाबालिग बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक पहले पिता होता है और उसके बाद मां। ऐसे में जब पिता की मृत्यु हो चुकी है, तो मां को कस्टडी मिलनी चाहिए, जब तक यह साबित न हो जाए कि वह बच्ची की भलाई के लिए अयोग्य है।

जिला अदालत ने मां की अर्जी खारिज कर दी थी

25 साल की महिला ने जिला अदालत के अप्रैल 2025 के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसकी कस्टडी की अर्जी खारिज कर दी गई थी। महिला ने बताया कि जब उसका आपसी सहमति से तलाक हुआ था, तब उसने एक साल की बच्ची की कस्टडी अपने पति और ससुराल वालों को देने पर सहमति जताई थी। लेकिन इस साल जनवरी में पति की मौत हो गई। इसके बाद दादा-दादी ने बच्ची के संरक्षक बनने की अर्जी दी।

महिला बोली-दादा-दादी हो चुके उम्रदराज

महिला ने इसका विरोध किया और बच्ची की कस्टडी मांगी। उसने कहा कि दादा-दादी अब उम्रदराज हो चुके हैं और बच्ची की देखभाल ठीक से नहीं कर पाएंगे। वहीं अब वह खुद अच्छी कमाई कर रही है और बच्ची की बेहतर देखभाल कर सकती है।

मां की देखभाल का कोई विकल्प नहीं: कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि जब बात पांच साल की बच्ची की हो, तो यह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि मां ही उसकी सबसे अच्छी देखभाल कर सकती है। मां का स्नेह और सहयोग किसी और से नहीं मिल सकता। सिर्फ इसलिए कि दादा-दादी या अन्य रिश्तेदारों ने कुछ समय तक बच्ची की परवरिश की है, इसका मतलब यह नहीं कि मां को कस्टडी से वंचित किया जाए, जब तक यह साबित न हो कि बच्ची की भलाई को खतरा है।

तलाक के समय मां की स्थिति अलग थी

कोर्ट ने यह भी कहा कि तलाक के समय महिला खुद अपने माता-पिता पर निर्भर थी और उसकी कोई आमदनी नहीं थी। इसलिए उस समय बच्ची को पिता के पास रखना उचित था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। कोर्ट ने आदेश दिया कि बच्ची को मां की कस्टडी में सौंपा जाए। साथ ही दादा-दादी को सप्ताह में एक या दो बार बच्ची से मिलने की अनुमति दी गई है।

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