Sunday, November 8, 2026
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Criminal Case: पीड़ित केंद्रित आपराधिक न्याय प्रणाली…हाईकोर्ट ने क्रिमिनल कैविएट व्यवस्था बनाने की जनहित याचिका प्रशासनिक विंग को विचारार्थ भेजी

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मामले की पृष्ठभूमि और विधिक तर्क

  1. हाईकोर्ट रूल्स 1952 में प्रक्रियात्मक कमी:अधिवक्ता अनुप्रिया अग्रवाल द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) में ध्यान दिलाया गया कि Allahabad High Court Rules, 1952 में सिविल मुकदमों की तरह आपराधिक मामलों में कैविएट दर्ज करने और उसे संसाधित/अधिसूचित करने का कोई विशिष्ट तंत्र मौजूद नहीं है। (कैविएट अदालत से किया गया वह औपचारिक अनुरोध होता है, जिसके तहत प्रभावित पक्ष को सुने बिना कोई अंतरिम आदेश पारित न करने की प्रार्थना की जाती है)।
  2. पीड़ितों और शिकायतकर्ताओं के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव:याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि औपचारिक क्रिमिनल कैविएट तंत्र न होने के कारण अपराध के पीड़ितों और प्राथमिक सूचनाकर्ताओं (Informants/Victims) के कानूनी अधिकारों पर गंभीर असर पड़ता है। जब अभियुक्तों द्वारा जमानत या एफआईआर रद्द करने की याचिकाएँ दायर की जाती हैं, तो सिस्टम से नोटिस न मिलने के कारण पीड़ितों के वकीलों के लिए मुकदमों की लिस्टिंग को ट्रैक करना और समय पर अपना पक्ष रखना बेहद कठिन हो जाता है।
  3. न्यायिक बनाम प्रशासनिक क्षेत्राधिकार:पीठ ने माना कि अदालती नियमों (High Court Rules) में संशोधन या प्रक्रियात्मक बदलाव का विषय मुख्य न्यायाधीश और प्रशासनिक समिति के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए, पीठ ने न्यायिक side पर रिट याचिका को बंद करते हुए मुख्य न्यायाधीश को प्रस्तुत प्रत्यावेदन पर प्रशासनिक स्तर पर विचार करने का निर्देश दिया।

मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष

1. पीड़ित केंद्रित आपराधिक न्याय प्रणाली (Victim-Centric Criminal Justice):

आपराधिक मामलों में कैविएट व्यवस्था की स्थापना से पीड़ितों और शिकायतकर्ताओं को बिना देरी के सुनवाई का अवसर मिलेगा, जिससे प्रक्रियात्मक निष्पक्षता (Procedural Fairness) और आपराधिक मामलों का त्वरित निस्तारण सुनिश्चित हो सकेगा।

2. प्रशासनिक नियम-निर्माण शक्ति:

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि जब किसी याचिका में मांग का मुख्य ढांचा उच्च न्यायालय के अपने आंतरिक संचालन और नियमावली में संशोधन से जुड़ा हो, तो न्यायिक पीठें उसे सीधे तय करने के बजाय प्रशासनिक विडिंग/मुख्य न्यायाधीश के विचारार्थ संदर्भित करती हैं।

प्रयागराज/लखनऊ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियम, 1952 (Allahabad High Court Rules, 1952) के अध्याय XXII के नियम 5 (बंदी प्रत्यक्षीकरण से भिन्न रिट याचिकाओं की प्रक्रिया), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 479, 482 व 528 (जमानत, अग्रिम जमानत एवं कार्यवाही रद्द करने में पीड़ितों/सूचनाकर्ताओं के प्राकृतिक न्याय के अधिकार), सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 148A (दीवानी मामलों में कैविएट का सांविधिक अधिकार), तथा भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 व 225 (उच्च न्यायालय की नियम बनाने की आंतरिक प्रशासनिक शक्तियां एवं त्वरित व निष्पक्ष न्याय तक पहुंच) के विधिक मानकों के तहत इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आपराधिक मुकदमों में कैविएट प्रणाली लागू करने की मांग पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक-प्रशासनिक व्यवस्था दी है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजन रॉय (Justice Rajan Roy) और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला (Justice Manjive Shukla) की खंडपीठ ने अधिवक्ता अनुप्रिया अग्रवाल (Anupriya Agarwal) द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया कि उच्च न्यायालय का प्रशासनिक विंग (Administrative Side) मुख्य न्यायाधीश को प्रेषित याचिकाकर्ता के 13 अक्टूबर के प्रत्यावेदन पर सहानुभूतिपूर्वक और प्रक्रियात्मक दृष्टि से विचार करेगा।

खंडपीठ ने स्वीकार किया कि जमानत याचिकाओं, अग्रिम जमानत, आपराधिक पुनरीक्षणों, अपीलों और एफआईआर/कार्यवाही रद्द करने वाली याचिकाओं में कैविएट दाखिल करने, पंजीकृत करने और सूचित करने की औपचारिक व्यवस्था न होना प्रथम दृष्टया ‘न्याय तक पहुंच’ (Access to Justice) से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा है। हालांकि, चूंकि यह मूल रूप से अदालती कार्यप्रणाली और प्रक्रिया (Court Procedure) से संबंधित है, इसलिए न्यायिक आदेश के माध्यम से सीधे नियम संशोधित करने के बजाय इस पर प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश के निर्देशन में विचार किया जाना विधि-सम्मत होगा। तदनुसार, अदालत ने न्यायिक पक्ष पर रिट याचिका को निस्तारित/समाप्त कर दिया।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘न्याय तक पहुंच का अहम सवाल, किंतु यह प्रक्रियागत विषय है; प्रशासनिक स्तर पर हो विचार’:

न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कैविएट के अभाव से पीड़ितों को होने वाली असुविधा को रेखांकित करते हुए दर्ज किया: “प्रथम दृष्टया, यह जनहित याचिका न्याय तक पहुंच (Access to Justice) और इसे सुगम बनाने से संबंधित एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाती है। किंतु, यह अनिवार्य रूप से अदालती प्रक्रिया (Matter of Procedure) का विषय है। इसलिए, याचिकाकर्ता का प्रत्यावेदन—जिसकी प्रति रिट याचिका के अनुलग्नक संख्या 1 के रूप में संलग्न है और जो इस न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश को संबोधित है—उस पर उच्च न्यायालय द्वारा प्रशासनिक पक्ष (Administrative Side) पर यथोचित विचार किया जाए।”

2. पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा और एकतरफा राहत पर नियंत्रण:

  • अदालत ने माना कि आपराधिक मामलों में जब कोई अभियुक्त जमानत या धारा 482 (अब BNSS 528) के तहत राहत मांगता है, तो औपचारिक कैविएट तंत्र न होने के कारण पीड़ित पक्ष को समय पर सूचना नहीं मिल पाती।
  • एक संस्थागत कैविएट प्रणाली विकसित होने से पीड़ितों के वकीलों को मुकदमों की लिस्टिंग ट्रैक करने में आसानी होगी और अदालतें पीड़ित को सुने बिना एकतरफा आदेश पारित करने से बच सकेंगी।

जनहित याचिका (PIL) में उठाए गए मुख्य कानूनी आधार एवं विधिक विसंगति

1. सीपीसी की धारा 148A बनाम आपराधिक कानून में कैविएट का अभाव:

  • दीवानी कानून (CPC): सीपीसी की धारा 148A के तहत किसी भी वाद या कार्यवाही में संभावित प्रभावित पक्षकार को ‘कैविएट’ दाखिल करने का स्पष्ट सांविधिक अधिकार प्राप्त है। कैविएट दर्ज होने के बाद अदालत कैविएटर (Caveator) को नोटिस दिए बिना कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं कर सकती।
  • आपराधिक कानून (BNSS / CrPC): दंड प्रक्रिया संहिता या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में ‘कैविएट’ शब्द का कोई स्पष्ट सांविधिक प्रावधान नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स, 1952 में भी आपराधिक मामलों (अग्रिम जमानत, नियमित जमानत, अपील, पुनरीक्षण, 482 याचिकाएं) में कैविएट को दाखिल, पंजीकृत या सूचीबद्ध करने की कोई औपचारिक और पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था मौजूद नहीं है।

2. याचिकाकर्ता के मुख्य आक्षेप:

  • पीड़ितों (Victims of Crimes) और शिकायतकर्ताओं के प्राकृतिक न्याय का हनन:
    • जब कोई अभियुक्त गिरफ्तारी से बचने हेतु अग्रिम जमानत या एफआईआर रद्द कराने की याचिका दाखिल करता है, तो पीड़ित पक्ष के अधिवक्ताओं को यह पता ही नहीं चल पाता कि मामला किस बेंच में और कब सूचीबद्ध हुआ है।
  • समान अवसर (Fair Opportunity) से वंचित होना:
    • सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में पीड़ितों को अपनी बात रखने का अधिकार है। औपचारिक कैविएट तंत्र न होने से यह अधिकार कागजी बनकर रह जाता है।
  • अध्याय XXII के नियम 5 में संशोधन की आवश्यकता:
    • याचिका में मांग की गई कि इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स के चैप्टर XXII के नियम 5 में संशोधन करके एक सुव्यवस्थित ई-कैविएट तंत्र बनाया जाए, जिससे जैसे ही कोई अभियुक्त याचिका दाखिल करे, कैविएटर को स्वतः एसएमएस/ई-मेल के माध्यम से नोटिस चला जाए।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अक्टूबर – नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयइलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226)
पीठन्यायमूर्ति राजन रॉय (Justice Rajan Roy) एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला (Justice Manjive Shukla)
निर्णय की तिथिनवंबर 2026
केस संदर्भअनुप्रिया अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [Public Interest Litigation (PIL) No. … / 2026]
याचिकाकर्ताअनुप्रिया अग्रवाल (Anupriya Agarwal) — उच्च न्यायालय में वकालत करने वाली महिला अधिवक्ता।
याचिकाकर्ता के अधिवक्तागणअधिवक्ता सक्षम अग्रवाल (Saksham Agarwal), प्रांशु अग्रवाल (Pranshu Agrawal) एवं राकेश कुमार अग्रवाल (Rakesh Kumar Agarwal)।
प्रतिवादी पक्ष1. उत्तर प्रदेश राज्य (गृह एवं विधि विभाग)
2. इलाहाबाद उच्च न्यायालय प्रशासन (रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से)।
प्रतिवादी के विधि अधिकारीमुख्य स्थायी अधिवक्ता (Chief Standing Counsel – CSC) एवं अधिवक्ता शिशिर जैन (Shishir Jain)।
याचिका में उठाई गई मुख्य विधिक मांगइलाहाबाद उच्च न्यायालय नियम, 1952 के अध्याय XXII के नियम 5 में संशोधन कर आपराधिक मामलों (जमानत, अग्रिम जमानत, अपील, पुनरीक्षण, 482 याचिकाएं) में कैविएट दाखिल करने, दर्ज करने और विपक्षी को नोटिस देने का एक औपचारिक और अनिवार्य तंत्र स्थापित किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश को दिया गया प्रत्यावेदनयाचिकाकर्ता ने पूर्व में 13 अक्टूबर 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश को एक विस्तृत प्रत्यावेदन भेजा था, जिसमें पीड़ितों के अधिकारों, निष्पक्ष प्रक्रिया और अभियुक्त की स्वतंत्रता के संतुलन की मांग की गई थी।
अदालत का अंतिम आदेशन्यायिक पक्ष पर रिट याचिका निस्तारित/समाप्त (Disposed of / Closed); 13 अक्टूबर के प्रत्यावेदन को उच्च न्यायालय द्वारा प्रशासनिक पक्ष (Administrative Side) पर विचार करने का निर्देश।

विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: ‘आपराधिक न्यायशास्त्र में कैविएट और अनुच्छेद 225’

  • ‘जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा’ [(2022) 9 SCC 286] और पीड़ितों का अधिकार:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने लखीमपुर खीरी मामले में ऐतिहासिक व्यवस्था दी थी कि आपराधिक न्याय प्रणाली में अपराध का शिकार हुआ व्यक्ति (पीड़ित) कोई मूक दर्शक नहीं है।
    • पीड़ित को अभियुक्त की जमानत याचिका या किसी भी स्तर पर मुकदमे में भाग लेने और अपनी आपत्ति दर्ज कराने का अखंडनीय प्राकृतिक अधिकार (Inalienable Right of Participation) प्राप्त है।
    • यदि हाईकोर्ट में कैविएट की व्यवस्था नहीं होगी, तो अभियुक्त चुपचाप अग्रिम जमानत या गिरफ्तारी पर रोक की याचिका सूचीबद्ध कराकर एकतरफा आदेश प्राप्त कर सकता है, जिससे पीड़ित का यह संवैधानिक अधिकार निष्प्रभावी हो जाता है।
  • अनुच्छेद 225 और उच्च न्यायालय नियम निर्माण:
    • भारत का संविधान का अनुच्छेद 225 उच्च न्यायालयों को अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली, रोस्टर और मामलों की लिस्टिंग व फाइलिंग के नियम बनाने का पूर्ण अधिकार देता है।
    • खंडपीठ ने बिल्कुल सही विधिक दृष्टिकोण अपनाया कि न्यायिक पीठ को अनुच्छेद 226 के तहत स्वयं रिट जारी करके तुरंत नियम में संशोधन करने से बचना चाहिए। नियम में संशोधन की एक विधायी प्रक्रिया होती है, जिसमें उच्च न्यायालय की ‘रूल्स कमेटी’ (Rules Committee) विचार करती है और उसके बाद ‘फुल कोर्ट’ (Full Court Meeting) की मंजूरी से राज्यपाल को संस्तुति भेजी जाती है।
  • डिजिटल ई-कैविएट की दिशा में प्रगति:
    • वर्तमान में देश के कुछ उच्च न्यायालयों (जैसे दिल्ली और बॉम्बे) ने अपने ई-फाइलिंग पोर्टल में आपराधिक कैविएट दर्ज करने की सीमित सुविधाएं शुरू की हैं।
    • यदि इलाहाबाद उच्च न्यायालय प्रशासन इस प्रत्यावेदन पर सकारात्मक निर्णय लेता है, तो उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में—जहाँ देश के सर्वाधिक आपराधिक मामले दर्ज होते हैं—लाखों पीड़ितों और शिकायतकर्ताओं को एक सुरक्षित और पारदर्शी विधिक सुरक्षा कवच प्राप्त होगा।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226)
  • केस संदर्भ: अनुप्रिया अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [Public Interest Litigation (PIL) / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति राजन रॉय (Justice Rajan Roy) एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला (Justice Manjive Shukla)
  • निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: जनहित याचिका न्यायिक पक्ष पर निस्तारित/समाप्त; याचिकाकर्ता का 13 अक्टूबर 2026 का प्रत्यावेदन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश/प्रशासनिक विंग को विचारार्थ अग्रसारित।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (अधिवक्ता अनुप्रिया अग्रवाल) की ओर से:
    • अधिवक्ता: सक्षम अग्रवाल (Saksham Agarwal)
    • अधिवक्ता: प्रांशु अग्रवाल (Pranshu Agrawal)
    • अधिवक्ता: राकेश कुमार अग्रवाल (Rakesh Kumar Agarwal)।
  • प्रतिवादी पक्ष (राज्य सरकार व उच्च न्यायालय प्रशासन) की ओर से:
    • मुख्य स्थायी अधिवक्ता (Chief Standing Counsel – CSC)
    • अधिवक्ता: शिशिर जैन (Advocate Shishir Jain)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियम, 1952 (Allahabad High Court Rules, 1952) — अध्याय XXII का नियम 5 (रिट फाइलिंग प्रक्रिया)
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 21 — निष्पक्ष विचारण और त्वरित न्याय का अधिकार
      • अनुच्छेद 225 — उच्च न्यायालय की आंतरिक प्रक्रिया और नियम बनाने की शक्तियां
      • अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय का असाधारण जनहित याचिका क्षेत्राधिकार
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) / पूर्ववर्ती CrPC — पीड़ितों के भागीदारी अधिकार
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — धारा 148A (कैविएट दाखिल करने का अधिकार — तुलनात्मक संदर्भ)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • आपराधिक न्याय प्रणाली, पीड़ितों के अधिकार और प्रक्रियात्मक कैविएट का विधिक मानक: ‘आपराधिक कार्यवाहियों (जमानत, अग्रिम जमानत, धारा 528 BNSS / 482 CrPC आदि) में कैविएट दाखिल करने और सूचित करने की औपचारिक प्रणाली का होना न्याय तक पहुंच (Access to Justice) और प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों को प्रभावी बनाने हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है; पीड़ितों और शिकायतकर्ताओं को अभियुक्तों द्वारा मांगी जाने वाली एकतरफा अंतरिम राहतों के विरुद्ध अपना पक्ष रखने का समान अवसर मिलना चाहिए; तथापि, चूंकि कैविएट का नियमन मूलतः अदालत की आंतरिक कार्यप्रणाली और प्रक्रिया (Court Procedure) से संबंधित है, अतः न्यायिक पीठ द्वारा रिट जारी करने के बजाय उच्च न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष (Administrative Side) द्वारा मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में नियमों में संशोधन और आईटी सॉफ्टवेयर में ई-कैविएट मॉड्यूल के एकीकरण पर विचार किया जाना ही सर्वथा उपयुक्त विधिक मार्ग है।’
  • वर्तमान स्थिति व भावी प्रक्रिया: उच्च न्यायालय के इस न्यायिक आदेश के बाद अब यह मामला औपचारिक रूप से मुख्य न्यायाधीश और उच्च न्यायालय की प्रशासनिक रूल्स कमेटी के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा; प्रशासनिक विंग यह तय करेगी कि इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स, 1952 के प्रासंगिक अध्यायों में संशोधन करके और हाई कोर्ट के ऑनलाइन केस इंफॉर्मेशन सिस्टम (CIS) में आपराधिक कैविएट का नया विकल्प जोड़कर इसे कब और किस प्रारूप में लागू किया जाए।

Criminal Case: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठन्यायमूर्ति राजन रॉय एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला
केस / याचिकाकर्ताअनुप्रिया अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (Anupriya Agarwal vs State of UP and Another)
प्रतिनिधित्वयाचिकाकर्ता: अधिवक्ता सक्षम अग्रवाल, प्रांशु अग्रवाल व राकेश कुमार अग्रवाल | प्रतिवादी: मुख्य स्थायी अधिवक्ता एवं अधिवक्ता शिशिर जैन
संबंधित नियमावलीइलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स, 1952 का अध्याय XXII नियम 5 (Chapter XXII Rule 5)
मूल मांगक्रिमिनल मामलों (Bail, Anticipatory Bail, Quashing, Appeals) में पीड़ितों/शिकायतकर्ताओं के लिए कैविएट फाइलिंग, रजिस्ट्रेशन व ऑटोमैटिक नोटिस की औपचारिक व्यवस्था बनाना।
अदालत का आदेशन्यायिक याचिका समाप्त: मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए 13 अक्टूबर के प्रत्यावेदन पर प्रशासनिक पक्ष (Administrative Side) को निर्णय लेने का निर्देश।
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