Tuesday, August 4, 2026
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No Virtual Hugs for Reconciliation: कोर्ट रूम में खुद आना होगा, वर्चुअल नहीं चलेगी सुलह…वैवाहिक विवादों में सुलह की नई गाइडलाइन, पढ़ें केस

No Virtual Hugs for Reconciliation: आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस रवि नाथ तिलहरी की बेंच ने वैवाहिक विवादों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के इस्तेमाल पर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण दिया है।

कोर्ट ने अमेरिका (टेक्सास) में रह रहे एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने ‘सुलह’ (Reconciliation) की प्रक्रिया के लिए Zoom या WhatsApp के जरिए जुड़ने की अनुमति मांगी थी। यह मामला एक ऐसे NRI पति का है जो टेक्सास, अमेरिका में रहता है। उसने कोर्ट में दलील दी थी कि उसका एम्प्लॉयर उसे भारत जाने के लिए छुट्टी नहीं दे रहा है, इसलिए उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए सुलह की कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति दी जाए।

सुलह बनाम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Reconciliation vs. VC)

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक मामलों में ‘सुलह’ का चरण बहुत संवेदनशील होता है।
  • शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य: कोर्ट ने कहा कि जब तक सुलह के प्रयास आधिकारिक रूप से विफल (Fail) नहीं हो जाते, तब तक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की अनुमति नहीं दी जा सकती।
  • आमने-सामने की बात: सुलह का उद्देश्य पति-पत्नी के बीच की दूरियों को कम करना होता है, जो भौतिक उपस्थिति (Physical Presence) में ही प्रभावी ढंग से संभव है।

सुप्रीम कोर्ट का ‘संतिनी’ (Santhini) फैसला और हाई कोर्ट के नियम

  • इस केस में एक बड़ा कानूनी पेंच था— क्या हाई कोर्ट के नए नियम सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले को बदल सकते हैं?
  • याचिकाकर्ता का तर्क: पति के वकील ने दलील दी कि आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के “Rules for Video Conferencing for Courts, 2023” के अनुसार, न्यायिक कार्यवाही के “सभी चरणों” (All Stages) पर VC का उपयोग किया जा सकता है।
  • कोर्ट का स्पष्टीकरण: हाई कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 227 के तहत बनाए गए नियम, अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून (Santhini v. Vijaya Venkatesh मामला) को ओवरराइड नहीं कर सकते।
  • मिसाल: सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही तय कर दिया है कि वैवाहिक मामलों में VC का उपयोग केवल सुलह विफल होने के बाद और दोनों पक्षों की आपसी सहमति पर ही हो सकता है।

कानून की प्राथमिकता (Hierarchy of Laws)

  • संसदीय कानून बनाम नियम: हाई कोर्ट द्वारा बनाए गए नियम संसद द्वारा पारित हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 या फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 के विपरीत नहीं हो सकते। ये कानून ‘इन-कैमरा’ (बंद कमरे में) कार्यवाही और सुलह के ईमानदार प्रयासों को अनिवार्य बनाते हैं।
  • NRI स्टेटस कोई छूट नहीं: केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति विदेश में रह रहा है या उसे छुट्टी नहीं मिल रही, उसे स्थापित कानूनी प्रक्रिया से छूट नहीं दी जा सकती।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
पक्षटेक्सास निवासी पति बनाम भारत में रह रही पत्नी।
मांगZoom, WhatsApp या Skype के जरिए सुलह प्रक्रिया में शामिल होना।
हाई कोर्ट का फैसलायाचिका खारिज; ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार।
कानूनी स्थितिसुलह के विफल होने के बाद ही VC की अनुमति मिल सकती है।

डिजिटल युग में भी ‘व्यक्तिगत स्पर्श’ जरूरी

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला यह याद दिलाता है कि कानून में तकनीक एक सहायक उपकरण (Tool) है, न कि मानवीय संवेदनाओं और अनिवार्य सुलह प्रक्रियाओं का विकल्प। कोर्ट का मानना है कि टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने के लिए स्क्रीन के बजाय रूबरू (In-person) बातचीत का कोई विकल्प नहीं है।

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