Friday, September 18, 2026
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Education vs Divorce: IIT से PhD के लिए 7 साल की दूरी कोई परित्याग नहीं…दूरी से शादी का रिश्ता नहीं टूटता, पढ़े तलाक का यह केस

Education vs Divorce: तेलंगाना हाई कोर्ट के जस्टिस के. लक्ष्मण और जस्टिस बी. आर. मधुसूदन राव की बेंच ने वैवाहिक अधिकारों पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

    अदालत ने कहा है कि उच्च शिक्षा (PhD) के लिए लंबी अवधि तक जीवनसाथी से दूर रहना परित्याग’ (Desertion) नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने एक पति को दी गई 10 साल पुरानी तलाक की डिक्री को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि “शैक्षणिक दूरी कानूनी परित्याग नहीं है। यह मामला एक ऐसे पति का था जिसने अपनी पत्नी से केवल इसलिए तलाक ले लिया था क्योंकि वह उसके PhD के दौरान उसके साथ चेन्नई नहीं रही थी। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 2016 के आदेश को ‘विकृत’ (Perverse) करार दिया।

    मामले की पृष्ठभूमि: समय और दूरी की परीक्षा

    • शादी और करियर: इस जोड़े की शादी 1995 में हुई थी। 2003 में पति PhD करने के लिए IIT मद्रास (चेन्नई) चले गए।
    • लंबा अंतराल: जो कोर्स 3 साल में खत्म होना था, वह 7 साल (2010 तक) चला। इस दौरान पत्नी अपने बच्चे के साथ हैदराबाद में ही रही।
    • तलाक का आधार: पति ने 2011 में यह दावा करते हुए तलाक माँगा कि पत्नी ने उसके साथ चेन्नई शिफ्ट होने से मना कर दिया, जो कि ‘परित्याग’ (Desertion) और ‘क्रूरता’ है।

    ‘परित्याग’ (Desertion) की कानूनी परिभाषा

    • हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ‘परित्याग’ के अनिवार्य तत्वों को स्पष्ट किया।
    • दो साल की अनिवार्य अवधि: कानूनन, तलाक की अर्जी दाखिल करने से ठीक पहले कम से कम 2 साल तक लगातार अलग रहना अनिवार्य है।
    • समय का गणित: पति ने जुलाई 2010 में PhD पूरी की और जुलाई 2011 में केस कर दिया। यानी वह केवल 1 साल ही वापस साथ रहे या अलग रहे, जो 2 साल की शर्त को पूरा नहीं करता।
    • इरादे का अभाव (Animus Deserendi): परित्याग का मतलब सिर्फ शारीरिक रूप से दूर रहना नहीं है, बल्कि शादी को स्थायी रूप से खत्म करने का “इरादा” भी होना चाहिए। यहाँ पत्नी रिश्ते में बनी रहना चाहती थी और ईमेल व आर्थिक लेनदेन के जरिए वे संपर्क में थे।

    हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

    • स्वतंत्र साक्ष्य की कमी: कोर्ट ने नोट किया कि पति के पास ‘क्रूरता’ साबित करने के लिए अपने बयान के अलावा कोई स्वतंत्र गवाह या सबूत नहीं था। उसके द्वारा लगाए गए अधिकांश आरोप बहुत पुराने (PhD से पहले के) थे।
    • पत्नी का रुख: पत्नी ने हमेशा यह स्टैंड लिया कि वह पति के साथ रहने को तैयार है। उसने कभी पति को उनके बेटे से मिलने से नहीं रोका।
    • अकादमिक दूरी: कोर्ट ने माना कि उच्च शिक्षा के लिए अलग-अलग शहरों में रहना आज के समय की एक व्यावहारिक जरूरत हो सकती है, इसे वैवाहिक अपराध (Matrimonial Offence) नहीं माना जा सकता।

    केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

    बिंदुविवरण
    विवाद की अवधि2003-2010 (PhD के दौरान शारीरिक दूरी)।
    फैमिली कोर्ट (2016)पति के पक्ष में तलाक मंजूर किया था।
    हाई कोर्ट (2026)तलाक रद्द किया; पत्नी की अपील मंजूर।
    कानूनी संदेशव्यावहारिक कारणों से अलग रहना ‘परित्याग’ नहीं है जब तक रिश्ता खत्म करने का पक्का इरादा न हो।

    रिश्तों में समझदारी की जीत

    तेलंगाना हाई कोर्ट का यह फैसला उन जोड़ों के लिए एक मिसाल है जो करियर या पढ़ाई के कारण अलग-अलग शहरों में रहते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि भौतिक दूरी का मतलब भावनात्मक या कानूनी अलगाव नहीं होता। यदि एक पक्ष रिश्ते को निभाने की कोशिश कर रहा है, तो केवल ‘दूरी’ को हथियार बनाकर तलाक नहीं लिया जा सकता।

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