Friday, September 25, 2026
HomeLaworder HindiSessions Court: सजा तय करना विधायिका का काम है; सत्र न्यायालय हत्या...

Sessions Court: सजा तय करना विधायिका का काम है; सत्र न्यायालय हत्या के दोषी को बिना छूट ताउम्र जेल में रहने की विशेष श्रेणी की सजा नहीं दे सकता

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  1. विशेष श्रेणी की सजा (Special Category Sentence) केवल संवैधानिक अदालतों का अधिकार: संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले (Union of India v. V. Sriharan @ Murugan, 2016) और Swamy Shraddananda (2008) का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृत्युदंड के विकल्प के रूप में 14 साल से अधिक या “जीवन के अंत तक बिना छूट के” विशेष सजा देने का अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों (उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय) के पास है, सत्र न्यायालयों के पास नहीं।
  2. संसद की विधायी मंशा (Legislative Intent): पीठ ने नोट किया कि संसद ने बलात्कार से जुड़े कुछ विशेष कानूनों (जैसे IPC की धारा 376AB, 376DA) में स्पष्ट रूप से लिखा है कि आजीवन कारावास का अर्थ “शेष प्राकृतिक जीवन” होगा। लेकिन धारा 302 IPC में संसद ने ऐसा कोई शब्द नहीं जोड़ा। इसलिए सत्र अदालतें कानून में खुद से ऐसी कठोर सजा जोड़कर संसद की शक्तियों का अतिक्रमण नहीं कर सकतीं।
  3. अनुच्छेद 72/161 और CrPC 432-435 के तहत छूट की शक्ति: साधारण आजीवन कारावास में राज्यपाल/राष्ट्रपति के पास संविधान के अनुच्छेद 161/72 और सरकार के पास CrPC की धारा 432-435 (अब BNSS) के तहत सजा कम करने/माफ करने का अधिकार होता है। सत्र अदालतें ऐसा आदेश पारित नहीं कर सकतीं जिससे यह वैधानिक अधिकार पूरी तरह छीन जाए।

सजा में संशोधन क्यों किया गया?

  • अपराध का दायरा और जेल में आचरण: तीन लोगों (जिसमें दो बच्चे शामिल थे) की हत्या अत्यंत गंभीर अपराध थी, इसलिए साधारण 14 साल की छूट पर्याप्त नहीं थी।
  • सुधार की संभावना: हालांकि, दोषियों ने 11 और 12 साल से अधिक की वास्तविक सजा काट ली थी और जेल में उनका व्यवहार अनुशासित व संतोषजनक पाया गया।
  • अदालत ने अपराध की गंभीरता और अपराधी के सुधार/पुनर्वास की संभावनाओं के बीच संतुलन बनाते हुए 25 साल की निश्चित बिना-छूट सजा को न्यायसंगत माना।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक न्यायशास्त्र, दंड निर्धारण की न्यायिक शक्तियों (Sentencing Powers of Courts), और बिना छूट (Without Remission) के जीवन के अंतिम क्षण तक जेल में रखने वाली ‘विशेष श्रेणी की सजा’ (Special-Category Sentence) के प्रयोग पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मील का पत्थर साबित होने वाला विधिक निर्णय दिया है।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने पंजाब के तिहरे हत्याकांड (जिसमें एक महिला और उसकी दो मासूम बेटियों की हत्या कर दी गई थी) में दो दोषियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। हालांकि, अदालत ने सत्र न्यायालय द्वारा दी गई और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा पुष्ट की गई “ताउम्र जेल में रहने” की सजा को अवैध मानते हुए संशोधित किया और दोनों दोषियों को बिना सांविधिक छूट के 25 वर्ष के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment for 25 years without statutory remission) की सजा में परिवर्तित कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी है कि सत्र न्यायालय (Sessions Court / Trial Court) के पास भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत किसी हत्या के दोषी को “शेष स्वाभाविक जीवन तक जेल में रहने” (To remain in prison till rest of natural life) का ऐसा निर्देश देने का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है, जो सरकार की वैधानिक छूट (Remission) या लघुकरण (Commutation) की शक्तियों को छीनता हो।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं सिद्धांत

1. ‘सत्र न्यायालय सामान्य आजीवन कारावास दे सकता है, विशेष श्रेणी की सजा नहीं’ पीठ ने सत्र अदालत की सीमाओं को रेखांकित करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट किया: “इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सत्र न्यायालय (Trial Court) आईपीसी की धारा 302 सपठित धारा 34 के तहत दोषियों को साधारण ‘आजीवन कारावास’ (Imprisonment for Life) की सजा देने के लिए पूरी तरह सक्षम था। तथापि, उसी समय सत्र न्यायालय ऐसी विशेष श्रेणी की सजा देने के लिए कतई सक्षम नहीं था कि अपीलकर्ता ‘अपने शेष जीवन तक जेल में रहेंगे’, जो अपने सार और प्रभाव में सरकार की वैधानिक छूट या लघुकरण की शक्तियों को पूरी तरह समाप्त कर देती है।”

2. विशेष श्रेणी की सजा केवल संवैधानिक अदालतों (SC और HC) का विशेषाधिकार

  • शीर्ष अदालत ने स्वामी श्रद्धानंद (2) बनाम कर्नाटक राज्य (2008) और 5-जजों की संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले भारत संघ बनाम वी. श्रीहरन उर्फ मुरुगन (2016) का हवाला दिया।
  • अदालत ने दोहराया कि मृत्युदंड के विकल्प के रूप में 14 वर्ष से अधिक की निश्चित अवधि (जैसे 20, 25 या 30 वर्ष) या प्राकृतिक जीवन के अंत तक बिना छूट के कैद की सजा देने की शक्ति विशेष रूप से केवल संवैधानिक अदालतों (Constitutional Courts – यानी उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय) तक ही सीमित है। यह शक्ति जिला या सत्र न्यायपालिका द्वारा प्रयोग नहीं की जा सकती।

3. विधायी मंशा और धारा 302 का दायरा

  • अदालत ने रेखांकित किया कि दंड तय करना विधायिका का अधिकार क्षेत्र है। संसद ने 2018 के संशोधनों के बाद आईपीसी की धाराओं जैसे 376AB, 376DA और 376DB (नाबालिगों से सामूहिक दुष्कर्म आदि) में स्पष्ट रूप से यह शब्द जोड़े हैं कि आजीवन कारावास का अर्थ ‘दोषी के शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास’ होगा।
  • परंतु, संसद ने जानबूझकर धारा 302 IPC (हत्या) में ऐसे शब्दों का समावेश नहीं किया और उसे मृत्युदंड या साधारण आजीवन कारावास के रूप में ही बनाए रखा।
  • पीठ ने व्यवस्था दी:“अन्य दंडात्मक प्रावधानों में स्पष्ट भाषा का उपयोग करने और धारा 302 को उसके मूल रूप में बनाए रखने के विधायी इरादे की अनदेखी नहीं की जा सकती। सत्र न्यायालय द्वारा धारा 302 में ऐसी सजा को खुद से जोड़ना, जो संसद ने उसमें नहीं लिखी, वस्तुतः विधायिका द्वारा निर्धारित सजा की पूरक रचना (Supplementing the punishment) करने जैसा होगा, जो कानूनन अस्वीकार्य है।”

4. सजा का आनुपातिकता सिद्धांत (Proportionality) और सुधार की संभावना

  • अदालत ने माना कि तीन निर्दोष लोगों (जिनमें दो बच्चे शामिल थे) की पूर्व-नियोजित हत्या एक अत्यंत गंभीर अपराध (Aggravating Circumstance) है।
  • परंतु, सजा का निर्धारण केवल अपराध की प्रकृति से नहीं हो सकता। अदालत को अपराध की परिस्थितियों और अपराधी की परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना होता है, ताकि सुधार (Reformation) और पुनर्वास की संभावना बनी रहे।
  • रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों दोषी 11 और 12 वर्ष से अधिक की वास्तविक जेल काट चुके थे और जेल में उनका आचरण अनुकरणीय ও अनुशासित था। इसलिए उन्हें ताउम्र जेल में रखना अनुपातहीन होता, जबकि बिना छूट 25 वर्ष की जेल न्याय के तराजू पर पूरी तरह सटीक बैठती है।

Also Read; Civil Petition Pendency: केवल हर 6 महीने में आंकड़े जुटाने से 8 लाख पेंडेंसी खत्म नहीं होगी; वास्तविक निपटारे की प्रोग्रेस रिपोर्ट चाहिए, मॉनिटरिंग सेल बनाएं

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक कालक्रम

  • घटना: पंजाब में रेलवे ट्रैक के पास धारदार हथियारों से एक महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की नृशंस हत्या कर दी गई थी।
  • ट्रायल कोर्ट का फैसला:
    • सत्र अदालत ने अंतिम बार देखे जाने के साक्ष्य (Last seen theory), न्यायेतर इकबालिया बयान (Extra-judicial confession), बरामदगी और डीएनए/फिंगरप्रिंट फोरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर तीन आरोपियों को धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराया।
    • अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई और साथ ही यह अतिरिक्त निर्देश जोड़ दिया कि वे ‘अपने शेष जीवन तक जेल में रहेंगे’ (Incarceration for the rest of natural life)।
  • हाईकोर्ट की पुष्टि: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने दोषियों की अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा, परंतु सत्र न्यायालय द्वारा जोड़े गए ‘शेष जीवन तक जेल’ के तकनीकी विधिक पहलू की वैधानिकता का सूक्ष्म परीक्षण नहीं किया।
  • सुप्रीम कोर्ट में अपील: दो दोषियों ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, परंतु सजा की कानूनी वैधता और सत्र अदालत के क्षेत्राधिकार के प्रश्न पर विचार किया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: गुरमीत सिंह व अन्य बनाम पंजाब राज्य [आपराधिक अपील – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • अपीलकर्ताओं (दोषियों) की ओर से: अधिवक्ता संपा सेनगुप्ता रे
    • राज्य (पंजाब सरकार) की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) विवेक जैन एवं अधिवक्ता सिद्धांत शर्मा
  • प्रासंगिक कानून एवं दंडात्मक धाराएं:
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 (हत्या का दंड – मृत्युदंड या साधारण आजीवन कारावास), धारा 34 (सामान्य आशय), एवं धारा 45 व 53 (सजा के प्रकार)
    • भारतीय दंड संहिता की धारा 376AB, 376DA, 376DB (प्राकृतिक जीवन के अंत तक कारावास के विशिष्ट विधायी प्रावधान)
    • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 432, 433, 433A एवं 435 (सजा में छूट और लघुकरण की सरकार की वैधानिक शक्तियां)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 72 और अनुच्छेद 161 (राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्तियां)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक शक्ति)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • स्वामी श्रद्धानंद (2) बनाम कर्नाटक राज्य (2008, सुप्रीम कोर्ट 3-जज पीठ) — ‘मृत्युदंड और सामान्य उम्रकैद के बीच के फासले को पाटने के लिए एक निश्चित लंबी अवधि (बिना छूट) की विशेष श्रेणी की सजा का सृजन किया गया था।’
    • भारत संघ बनाम वी. श्रीहरन उर्फ मुरुगन (2016, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘यह स्पष्ट व्यवस्था दी गई थी कि विशेष श्रेणी की सजा (बिना छूट के निश्चित अवधि या प्राकृतिक जीवन तक जेल) देने का अधिकार केवल संवैधानिक न्यायालयों (उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय) के पास है, ट्रायल/सत्र न्यायालयों के पास नहीं।’
    • किरण बनाम कर्नाटक राज्य (2025) एवं रविंदर सिंह बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (2024) — ‘सत्र अदालतों द्वारा बिना छूट ताउम्र कैद की सजा देना वैधानिक छूट व्यवस्था का अतिक्रमण है।’
    • नवास उर्फ मुलानावास बनाम केरल राज्य (2024, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सजा तय करते समय अपराध की गंभीरता के साथ-साथ जेल में आचरण और पुनर्वास की संभावनाओं का संतुलन अनिवार्य है।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली (सर्वोच्च न्यायालय)
  • अंतिम निर्णय: अपील आंशिक रूप से मंजूर; दोषसिद्धि बरकरार, परंतु सत्र अदालत का ताउम्र कैद का निर्देश निरस्त कर बिना सांविधिक छूट के 25 वर्ष के सश्रम कारावास में बदला गया।

Sessions Court:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठ के न्यायाधीशन्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली
मूल अपराधधारा 302/34 IPC (एक महिला और दो नाबालिग बेटियों की हत्या)
ट्रायल/सत्र कोर्ट का फैसलाआजीवन कारावास की सजा और “जीवन के अंत तक जेल में रहने” का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट का संशोधनसत्र कोर्ट का निर्देश रद्द; सजा को 25 साल के बिना-छूट (Without Remission) कठोर कारावास में बदला
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
light rain
26.3 ° C
26.3 °
26.3 °
90 %
10.9kmh
100 %
Fri
26 °
Sat
30 °
Sun
31 °
Mon
30 °
Tue
32 °

Recent Comments