Thursday, May 21, 2026
HomeDelhi High CourtDe-Register AAP: अयोग्य ठहराने वाली PIL…क्या कानून में कोई प्रावधान है? अगर...

De-Register AAP: अयोग्य ठहराने वाली PIL…क्या कानून में कोई प्रावधान है? अगर है, तो हमें वो सेक्शन दिखाइए, यहां कोर्ट रूम की तीखी बहस पढ़ें

De-Register AAP: दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) के बड़े नेताओं पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने और ‘आप’ का राजनीतिक पंजीकरण रद्द (De-register) करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया है।

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की डिवीजन बेंच ने इस याचिका को पूरी तरह आधारहीन और ‘Highly Misconceived’ (अत्यंत भ्रामक/गलत धारणा पर आधारित) करार दिया।

व्यक्तिगत आचरण के कारण पूरी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द नहीं हो सकता

यह याचिका सतीश कुमार अग्रवाल नामक व्यक्ति द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा द्वारा आप नेताओं के खिलाफ शुरू की गई ‘आपराधिक अवमानना’ (Criminal Contempt) की कार्यवाही यह दर्शाती है कि इन नेताओं की संविधान के प्रति निष्ठा नहीं है। इसलिए चुनाव आयोग (ECI) को इस पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द कर देना चाहिए।

Courtroom Exchange: चीफ जस्टिस ने वकील से पूछा कानून

  • सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में बेंच और याचिकाकर्ता के वकील के बीच तीखी बहस हुई।
  • चीफ जस्टिस का सवाल: “आप हमसे चुनाव आयोग को निर्देश देने के लिए कह रहे हैं। क्या कानून में राजनीतिक दल को डी-रजिस्टर करने का कोई प्रावधान है? अगर है, तो हमें वो सेक्शन दिखाइए।
  • वकील का कबूलनामा: याचिकाकर्ता के वकील ने माना कि Representation of the People Act (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम) में सीधे तौर पर डी-रजिस्ट्रेशन का कोई प्रावधान नहीं है।
  • अयोग्य ठहराने पर कोर्ट की फटकार: जब वकील ने दलील दी कि संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा न रखने वाले नेता चुनाव नहीं लड़ सकते, तो चीफ जस्टिस ने टोकते हुए कहा, आप इस प्रावधान को कितना खींच रहे हैं? यदि किसी ने अदालत को बदनाम किया है, तो उपाय अवमानना कानून के तहत है। क्या अवमानना के लिए दंडित होने पर कोई व्यक्ति चुनाव से अयोग्य हो जाता है? इससे पार्टी का डी-रजिस्ट्रेशन कैसे हो सकता है? आपका मामला कहीं भी टिकता नहीं है।

Also Read; Excise Policy: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा-मैं चुप नहीं बैठ सकती…अब सोशल मीडिया पर जज और कोर्ट की बदनामी पर अवमानना केस झेलें, पढ़े यह खबर

अदालत ने महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणियां कीं

कोर्ट की अवमानना का हल सिर्फ अवमानना कानून में है (Contempt vs De-registration)

  • हाई कोर्ट ने साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति या नेता के आचरण से कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचती है, तो उसके लिए Contempt of Courts Act (अदालत की अवमानना अधिनियम) के तहत उचित कानूनी रास्ता उपलब्ध है।
  • कोर्ट ने कहा, “किसी अवमानना मामले में की गई टिप्पणियों को केवल उसी मामले के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए, न कि उसे चुनाव आयोग द्वारा किसी राजनीतिक दल का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का आधार बनाया जा सकता है।”

चुनाव आयोग (ECI) के पास रिव्यू की शक्ति नहीं है

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘Indian National Congress (I) Vs. Institute of Social Welfare (2002)’ का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि एक बार जब चुनाव आयोग किसी पार्टी को पंजीकृत कर देता है, तो उसके बाद उसके पास अपने ही आदेश की समीक्षा (Review) करने या किसी नागरिक की शिकायत पर पार्टी को डी-रजिस्टर करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं होता।

किन परिस्थितियों में रद्द हो सकता है किसी पार्टी का रजिस्ट्रेशन?

  • अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कानून का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि Election Commission (ECI) केवल तीन असाधारण परिस्थितियों (Exceptional Circumstances) में ही किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द कर सकता है।
  • धोखाधड़ी (Fraud): यदि पार्टी का पंजीकरण फर्जी दस्तावेजों या धोखाधड़ी के जरिए हासिल किया गया हो।
  • नाम में गड़बड़ी (Nomenclature): यदि पार्टी अपने नाम या नियमों में ऐसा बदलाव करती है जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) की धारा 29A(5) के अनुरूप न हो।
  • संविधान में अविश्वास की लिखित सूचना: यदि पार्टी खुद चुनाव आयोग को लिखित रूप में सूचित करे कि वह अब भारत के संविधान के प्रति निष्ठा नहीं रखती है।
  • कोर्ट का रुख: बेंच ने कहा कि वर्तमान मामला इन तीनों में से किसी भी श्रेणी में नहीं आता है। यह दावा करना कि आप नेताओं के आचरण से यह मान लिया जाए कि पूरी पार्टी का संविधान में विश्वास नहीं है, “Too far-fetched” (बहुत दूर की कौड़ी/अतिशयोक्तिपूर्ण) है।

मामले का अंतिम निष्कर्ष (Quick Summary)

कानूनी पहलूदिल्ली हाई कोर्ट का स्पष्ट फैसला
याचिका की प्रकृतिPIL (जनहित याचिका) – पूरी तरह खारिज।
मुख्य कानूनी आधारINC बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेल्फेयर (2002) का सुप्रीम कोर्ट का फैसला।
नेताओं की स्थितिव्यक्तिगत नेताओं के अदालती आचरण के कारण पूरी राजनीतिक पार्टी के अस्तित्व को समाप्त नहीं किया जा सकता।
ECI का अधिकारचुनाव आयोग के पास किसी तीसरे पक्ष की शिकायत पर राजनीतिक दलों को डी-रजिस्टर करने की कोई स्वत: शक्ति नहीं है।

निष्कर्ष (Analysis Takeaway)

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक दलों का पंजीकरण और मान्यता एक बेहद गंभीर वैधानिक प्रक्रिया है। किसी नेता या व्यक्तिगत सदस्य के खिलाफ चल रहे अदालती मामलों या अवमानना की कार्यवाहियों को हथियार बनाकर पूरी राजनीतिक पार्टी को चुनाव प्रक्रिया से बाहर करने की कोशिशें कानूनी रूप से मान्य नहीं हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि व्यक्तिगत अयोग्यता और पार्टी के डी-रजिस्ट्रेशन के बीच एक बहुत बड़ी कानूनी लक्ष्मण रेखा है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
haze
33 ° C
33 °
33 °
70 %
4.1kmh
20 %
Wed
34 °
Thu
46 °
Fri
46 °
Sat
44 °
Sun
42 °

Recent Comments