Tuesday, November 3, 2026
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Private CCTV: पड़ोसी की निजता में दखल देने वाले कोण पर नहीं लगाए जा सकते निजी सीसीटीवी कैमरे; सुरक्षा के नाम पर दूसरे के आने-जाने की निगरानी निजता का हनन

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मामले की पृष्ठभूमि और विधिक निष्कर्ष

  1. पड़ोसी के कैमरे के रुख पर आपत्ति:याचिकाकर्ता योगेंद्र मौर्य ने उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि उनके पड़ोसी ने अपने घर में सीसीटीवी कैमरा इस तरह लगाया है जिससे याचिकाकर्ता के घर का प्रवेश और निकास द्वार (Entry & Exit Points) सीधे कवर होता है। इससे उनके घर में आने-जाने वाले परिजनों और मेहमानों की आवाजाही लगातार रिकॉर्ड हो रही थी, जो कि निजता पर सीधा अतिक्रमण है।
  2. अदालत का प्रक्रियात्मक रुख (DM को निर्देश):हाईकोर्ट ने माना कि कैमरे की ऐसी स्थिति अनुचित है। हालांकि, रिट क्षेत्राधिकार में सीधे कैमरा हटाने का आदेश जारी करने के बजाय अदालत ने याचिका को निस्तारित करते हुए याचिकाकर्ता को संबंधित जिला मजिस्ट्रेट (District Magistrate – DM) के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कराने की छूट दी।
  3. समयबद्ध निवारण:अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा आवेदन प्रस्तुत किए जाने की तिथि से एक माह के भीतर मामले की जांच कराकर कानून के अनुसार उचित फैसला सुनाएं और निजता का उल्लंघन होने पर कैमरे का कोण बदलवाने या आवश्यक कदम उठाने का आदेश दें।

प्रमुख विधिक व संवैधानिक महत्व

1. निजता का मौलिक अधिकार (Article 21):

सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक पुट्टास्वामी (Puttaswamy) निर्णय के आलोक में, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (जैसे सीसीटीवी) का उपयोग इस प्रकार नहीं किया जा सकता कि वह किसी अन्य नागरिक के निजी जीवन और संवैधानिक निजता के अधिकार का हनन करे।

2. प्रशासनिक निवारण:

अदालत ने यह स्थापित किया कि पड़ोसियों के बीच सीसीटीवी की स्थिति को लेकर उत्पन्न विवादों का निपटारा प्राथमिक स्तर पर जिला प्रशासन (District Magistrate) द्वारा स्थल निरीक्षण करके किया जाना चाहिए।

प्रयागराज: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त ‘निजता का अधिकार’ (Right to Privacy), सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ [(2017) 10 SCC 1], भारतीय सुखाचार अधिनियम, 1882 (Indian Easements Act, 1882) की धारा 18 (पारंपरिक एवं प्रथागत निजता का अधिकार / Customary Right of Privacy), अपकृत्य विधि (Law of Torts) के तहत अतिचार एवं उपद्रव (Nuisance & Intrusion upon Seclusion), तथा नागरिक सुरक्षा हेतु निजी सीसीटीवी कैमरों के उपयोग की विधिक सीमाओं पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत व्यावहारिक और दूरगामी फैसला सुनाया है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजीत कुमार (Justice Ajit Kumar) और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद (Justice Garima Prashad) की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता योगेंद्र मौर्य (Yogendra Maurya) द्वारा दायर रिट याचिका का निस्तारण करते हुए स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि किसी भी नागरिक को अपने घर पर निजी सीसीटीवी कैमरा इस प्रकार स्थापित या उन्मुख (Positioned) करने की अनुमति नहीं दी जा सकती जो उसके पड़ोसी की घरेलू निजता में अनुचित हस्तक्षेप करता हो।

उच्च न्यायालय ने यद्यपि कैमरे को सीधे हटाने का तत्काल परमादेश जारी नहीं किया, किंतु याचिकाकर्ता को संबंधित जिला मजिस्ट्रेट (DM) के समक्ष औपचारिक आवेदन देने की स्वतंत्रता दी और जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह आवेदन प्राप्त होने के एक माह के भीतर (Within One Month) मामले का विधि अनुसार निस्तारण सुनिश्चित करें।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘पड़ोसी की निजता में दखल देने वाला सीसीटीवी इंस्टॉलेशन अवैध’:

न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने निजी संपत्ति पर सुरक्षा कैमरों की स्थापना और पड़ोसी के निजता के अधिकार के संतुलन पर 26 अक्टूबर के अपने आदेश में दर्ज किया: “हमारी सुविचारित राय में, कोई भी निजी सीसीटीवी कैमरा इस प्रकार स्थापित और उन्मुख (Positioned) नहीं किया जा सकता जिससे पड़ोसी की निजता (Privacy of a Neighbour) में हस्तक्षेप होता हो।”

2. सुरक्षा बनाम निगरानी (Surveillance vs Security) का विधिक भेद:

  • अदालत ने माना कि किसी भी व्यक्ति को अपनी संपत्ति और जीवन की सुरक्षा हेतु सीसीटीवी कैमरे लगाने का वैध अधिकार है, किंतु यह अधिकार असीमित या निरपेक्ष नहीं है।
  • जब कोई निजी कैमरा किसी पड़ोसी के घर के मुख्य प्रवेश और निकास द्वार (Entry and Exit Points) को सीधे फोकस करता है और वहां आने-जाने वाले परिजनों या आगंतुकों की दैनिक गतिविधियों को अनवरत रिकॉर्ड करता है, तो यह सुरक्षा की सीमा को लांघकर गैर-कानूनी ताक-झांक और निगरानी (Surveillance) की श्रेणी में आ जाता है।

3. जिला मजिस्ट्रेट को एक माह में समाधान का निर्देश:

  • उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक तंत्र को सक्रिय करते हुए व्यवस्था दी:“याचिकाकर्ता को संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष विस्तृत आवेदन प्रस्तुत करने की छूट दी जाती है। जिला मजिस्ट्रेट को निर्देशित किया जाता है कि वे आवेदन प्राप्त होने की तिथि से एक माह के भीतर दोनों पक्षों के हितों का परीक्षण कर उस पर उचित निर्णय लें।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक विवरण (2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयइलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार)
पीठन्यायमूर्ति अजीत कुमार एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद (खंडपीठ)
आदेश की तिथि26 अक्टूबर 2026 (2 नवंबर को सार्वजनिक विवरण प्रकाशित)
याचिकाकर्तायोगेंद्र मौर्य (Yogendra Maurya) — पीड़ित पड़ोसी।
प्रतिवादी पक्षउत्तर प्रदेश राज्य, संबंधित जिला मजिस्ट्रेट, एवं निजी पड़ोसी।
विवाद का केंद्रपड़ोसी द्वारा अपने मकान में स्थापित निजी सीसीटीवी कैमरे का ओरिएंटेशन (कोण/दिशा), जिसे कथित तौर पर इस तरह घुमाया गया था कि वह याचिकाकर्ता के मकान के मुख्य प्रवेश और निकास द्वार को सीधे रिकॉर्ड कर रहा था।
याचिकाकर्ता के मुख्य विधिक तर्क1. निरंतर निगरानी का भय: कैमरे के इस कोण से याचिकाकर्ता के घर में आने-जाने वाले सभी पारिवारिक सदस्यों, महिलाओं और अतिथियों की गतिविधियों पर अनवरत नजर रखी जा रही थी।
2. निजता का हनन (Article 21): यह कृत्य पुट्टास्वामी फैसले में स्थापित ‘व्यक्तिगत स्वायत्तता’ (Personal Autonomy) और घर की चारदीवारी के सम्मान के अधिकार का खुला उल्लंघन है।
अदालत का प्रक्रियात्मक दृष्टिकोणअदालत ने सीधे कैमरा हटाने का आदेश देने के बजाय प्रशासनिक हस्तक्षेप को उपयुक्त माना, क्योंकि कैमरे का सटीक कोण (Angle), फील्ड ऑफ व्यू (Field of View) और वास्तविक कवरेज का भौतिक सत्यापन जमीनी स्तर पर ही संभव है।
अंतिम निर्देशयाचिका निस्तारित; याचिकाकर्ता को डीएम के समक्ष अर्जी देने का निर्देश; डीएम को एक माह के भीतर मामले का निस्तारण करने का आदेश।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘पुट्टास्वामी सिद्धांत और रिहायशी निजता’

  • पुट्टास्वामी निर्णय और गैर-सरकारी व्यक्तियों के विरुद्ध निजता:
    • सर्वोच्च न्यायालय के 9-न्यायाधीशों के ऐतिहासिक फैसले के.एस. पुट्टास्वामी ने स्थापित किया कि निजता का अधिकार गरिमापूर्ण जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
    • यद्यपि मौलिक अधिकार प्राथमिक रूप से ‘राज्य’ (State) के विरुद्ध लागू होते हैं, किंतु जब दो पड़ोसियों के बीच विवाद सार्वजनिक शांति और उपद्रव (Nuisance) का रूप ले लेता है, तो राज्य और न्यायपालिका का यह दायित्व है कि वे कमजोर पक्ष की निजता और शांतिपूर्ण उपभोग (Peaceful Enjoyment of Property) की रक्षा करें।
  • सुखाचार कानून (Easements Act, 1882) की धारा 18 का विस्तार:
    • भारत के पारंपरिक सुखाचार कानून की धारा 18 के तहत ‘प्रथागत निजता का अधिकार’ (Customary Right to Privacy) सदियों से भारतीय न्यायशास्त्र का हिस्सा रहा है, जिसके तहत कोई भी पड़ोसी दूसरे के आंगन, जनाना कक्ष या खिड़की की सीध में ऐसी दीवार या झरोखा नहीं खोल सकता जिससे उसकी घरेलू निजता भंग हो।
    • उच्च न्यायालय ने इस फैसले के जरिए इस पारंपरिक सिद्धांत को 21वीं सदी की आधुनिक डिजिटल तकनीक (CCTV कैमरों) पर भी लागू कर दिया है।
  • जिला मजिस्ट्रेट की विनियामक शक्तियां:
    • पुलिस और जिला प्रशासन (BNSS की धारा 152 / पूर्व CrPC धारा 133—सार्वजनिक उपद्रव हटाना) के तहत सार्वजनिक और अर्ध-सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी ऐसे उपकरण को विनियमित कर सकते हैं जो विवाद, वैमनस्य या महिलाओं व पड़ोसियों के प्रति असहजता का कारण बनता हो।
    • जिला मजिस्ट्रेट स्थल निरीक्षण करवाकर कैमरे के लेंस पर ‘प्राइवेसी मास्क’ (Privacy Masking) लगवा सकते हैं या उसके कोण को केवल पड़ोसी की अपनी चारदीवारी तक सीमित करने का बाध्यकारी आदेश दे सकते हैं।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ प्रयागराज (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: योगेंद्र मौर्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [Writ Petition (Civil) / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अजीत कुमार एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 26 अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: रिट याचिका निस्तारित; सिद्धांत तय किया गया कि निजी सीसीटीवी पड़ोसी की निजता में दखल नहीं दे सकता; जिला मजिस्ट्रेट को 1 माह में सुनवाई कर फैसला लेने का निर्देश।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत निजता का अधिकार) एवं अनुच्छेद 226 (रिट क्षेत्राधिकार)
    • भारतीय सुखाचार अधिनियम, 1882 (Indian Easements Act, 1882) — धारा 18 (पारंपरिक एवं प्रथागत निजता का अधिकार)
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 152 (उपद्रव के सशर्त आदेश / पूर्व CrPC धारा 133)
    • अपकृत्य विधि (Law of Torts) — प्राइवेट न्यूसेंस एवं एकांत में अनधिकृत घुसपैठ (Intrusion upon Seclusion)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • निजी सीसीटीवी कैमरों और पड़ोसी की निजता का विधिक मानक: ‘प्रत्येक नागरिक को अपनी संपत्ति की रक्षा हेतु सुरक्षा कैमरे लगाने का अधिकार है, किंतु यह अधिकार पड़ोसी के निजता के अधिकार का अतिक्रमण करने की छूट नहीं देता; कोई भी निजी सीसीटीवी कैमरा इस प्रकार स्थापित या उन्मुख (Oriented) नहीं किया जा सकता जिससे वह पड़ोसी के घर के प्रवेश, निकास या निजी परिसरों को सीधे कवर करके उसकी दैनिक गतिविधियों की अनवरत निगरानी करे; ऐसा इंस्टॉलेशन निजता के अधिकार और शांतिपूर्ण संपत्ति उपभोग के सिद्धांत का उल्लंघन है, जिसे ठीक कराने या विनियमित करने का दायित्व जिला प्रशासन का है।’
  • वर्तमान स्थिति व अनुपालन प्रक्रिया: याचिकाकर्ता योगेंद्र मौर्य को संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष औपचारिक आवेदन दाखिल करना होगा; इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट स्थानीय राजस्व या पुलिस अधिकारियों से संयुक्त मौका-मुआयना (स्थल निरीक्षण) करवाएंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि कैमरे का कोण मोड़ दिया जाए ताकि वह केवल पड़ोसी की अपनी संपत्ति तक सीमित रहे और मौर्य के घर का प्रवेश द्वार कैमरे के विजन से पूरी तरह बाहर हो जाए।

Private CCTV: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court), प्रयागराज
पीठन्यायमूर्ति अजीत कुमार एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद
मामला/याचिकाकर्तायोगेंद्र मौर्य (Yogendra Maurya) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
मूल विवादपड़ोसी द्वारा सीसीटीवी कैमरे का रुख याचिकाकर्ता के घर के मुख्य प्रवेश व निकास द्वार की ओर लगाना।
याचिकाकर्ता का तर्कघर में आने-जाने वाले व्यक्तियों की गतिविधियों की लगातार रिकॉर्डिंग से संविधान प्रदत्त निजता के अधिकार का हनन।
अदालत का अंतिम निर्णयसिद्धांत की पुष्टि व प्रेषण: कोर्ट ने माना कि यह निजता का उल्लंघन है; हालांकि, कैमरा सीधे हटाने का आदेश देने के बजाय याचिकाकर्ता को जिला मजिस्ट्रेट (DM) के समक्ष आवेदन करने का निर्देश दिया, जिस पर DM को 1 महीने में निर्णय लेना होगा।
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