Sunday, November 1, 2026
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Temporary Release Act: माँ की मौत, पिता जेल में और बहन यूपीएससी की तैयारी में…बिना पैरोल शेष प्राकृतिक जीवन की शर्त को दरकिनार; याचिका खारिज

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पैरोल खारिज होने के मुख्य कारण और विधिक सिद्धांत

  1. ‘नो-पैरोल’ की शर्त को चुनौती देना अनिवार्य:अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जींद ने 2020 में जघन्य अपराध के लिए दोषी को मौत की सजा (Death Sentence) न देते हुए बिना पैरोल पूरे जीवनकाल के कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने माना कि जब तक इस शर्त को बदला नहीं जाता, पैरोल देना ट्रायल कोर्ट के विवेक को नजरअंदाज करने जैसा होगा।
  2. जेल अनुशासन का उल्लंघन:अदालत ने पाया कि दोषी ने जेल के भीतर भी अनुशासनहीनता की थी। उस पर प्रिजन इनमेट कॉलिंग सिस्टम (PICS) का दुरुपयोग करने का आरोप सिद्ध हुआ था और उसे इसके लिए दंडित किया गया था।
  3. “पैरोल कोई मौलिक अधिकार नहीं है”:हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नज़ीरों का हवाला देते हुए दोहराया कि पैरोल एक सशर्त वैधानिक राहत है, न कि पूर्ण या निरपेक्ष अधिकार (Absolute Right)।“पैरोल का अधिकार कोई पूर्ण अधिकार नहीं है और सक्षम प्राधिकारी वैध कारणों से इसे देने से मना कर सकता है। पारिवारिक संबंध बनाए रखने के लिए पैरोल का प्रावधान है, लेकिन अपराध की गंभीरता और अदालत द्वारा लगाई गई शर्तें प्राथमिक हैं।” — न्यायमूर्ति अनूप चितकारा

चंडीगढ़: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 432 व 433A / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS), हरियाणा सदाचारी बंदी (अस्थाई रिहाई) अधिनियम (Haryana Good Conduct Prisoners Temporary Release Act), विशेष श्रेणी दंडादेश (Special Category Sentence—’मृत्युदंड के विकल्प के रूप में संपूर्ण जैविक जीवन हेतु बिना पैरोल कारावास’), सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक नज़ीरें—स्वामी श्रद्धानंद (2) बनाम कर्नाटक राज्य [(2008) 13 SCC 767] व यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी. श्रीहरन [(2016) 7 SCC 1], तथा पैरोल के वैधानिक चरित्र (Parole is not an absolute right) पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं नज़ीरी फैसला सुनाया है।

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनूप चितकारा (Justice Anoop Chitkara) और न्यायमूर्ति हरमीत सिंह देओल (Justice Harmeet Singh Deol) की खंडपीठ ने जींद (हरियाणा) के एक जघन्य अपहरण, हत्या, SC/ST एक्ट व POCSO मामले में ‘शेष प्राकृतिक जीवन तक बिना पैरोल’ कैद की सजा काट रहे दोषी द्वारा दायर पैरोल याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।

दोषी ने अपनी मां की मृत्यु, पिता के अन्य मामले में जेल में बंद होने और अपनी बहन की संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान देखभाल व भावनात्मक-आर्थिक संबल का हवाला देकर 8 सप्ताह की अस्थाई रिहाई (पैरोल) मांगी थी। खंडपीठ ने दो-टूक व्यवस्था दी कि जब तक ट्रायल कोर्ट के दंडादेश में उल्लिखित “बिना पैरोल” (Without Parole) की अनिवार्य न्यायिक शर्त को किसी अपीलीय अदालत द्वारा संशोधित या रद्द नहीं कर दिया जाता, तब तक बहन की परीक्षा की तैयारी जैसी सामान्य पारिवारिक परिस्थितियों के आधार पर पैरोल नहीं दी जा सकती।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘बहन की UPSC तैयारी वैधानिक आपात स्थिति नहीं; ट्रायल कोर्ट की शर्त सर्वोपरि’

न्यायमूर्ति अनूप चितकारा द्वारा लिखे गए निर्णय में खंडपीठ ने स्पष्ट विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया: “याचिकाकर्ता द्वारा अपनी बहन की देखभाल करने की कथित आवश्यकता वर्तमान दंडादेश में दर्ज स्पष्ट विधिक शर्त (No-parole condition) को विस्थापित नहीं करती है, और न ही यह वैधानिक योजना के तहत परिकल्पित किसी आपात स्थिति (Emergency) को स्थापित करती है। याचिकाकर्ता को पहले अपनी सजा पर लगी इस शर्त को संशोधित कराना होगा। जब तक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जींद के दिनांक 9 जनवरी 2020 के आदेश में निहित शर्त को या तो संशोधित नहीं किया जाता या रद्द नहीं किया जाता, तब तक पैरोल देना ट्रायल कोर्ट के उस न्यायिक विवेक और तर्क की अवहेलना करने के समान होगा, जिसके कारण संभवतः इतने जघन्य अपराध में मृत्युदंड (Death Sentence) नहीं लगाया गया था।”

2. ‘पैरोल कोई निरपेक्ष मौलिक अधिकार नहीं है’ (Parole is not a matter of right):

  • खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का सार प्रस्तुत करते हुए पैरोल और फरलो के विधिक स्वरूप की व्याख्या की:“पैरोल कोई पूर्ण या निरपेक्ष अधिकार (Matter of Right) नहीं है, और सक्षम प्राधिकारी वैध कारणों के आधार पर इसे अस्वीकार कर सकता है। यद्यपि पैरोल की व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि एक सजायाफ्ता कैदी पारिवारिक और सामाजिक संबंध बनाए रख सके और अत्यावश्यक व्यक्तिगत व घरेलू जरूरतों को पूरा कर सके।तथापि, किए गए अपराध की गंभीरता उस पर लगाई गई शर्तों के लिए अत्यंत प्रासंगिक है और जब विशिष्ट परिस्थितियां इसका समर्थन करती हैं, तो यह पैरोल को अस्वीकार करने का पूर्ण औचित्य सिद्ध करती है।”

3. जेल आचरण और जेल कॉलिंग सिस्टम (PICS) का दुरुपयोग:

  • अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पैरोल खारिज किए जाने के आदेश को सही ठहराते हुए पाया कि कैदी का जेल के भीतर आचरण भी निष्कलंक नहीं रहा था; उसे प्रिजन इनमेट कॉलिंग सिस्टम (PICS) के अनधिकृत दुरुपयोग के लिए जेल नियमों के तहत पूर्व में दंडित किया जा चुका था।

4. भावी उपचार के लिए दरवाजा खुला रखा:

  • खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि इस याचिका की बर्खास्तगी भविष्य में किसी वास्तविक और अपरिहार्य आपातकाल (जैसे गंभीर बीमारी या मृत्यु) की स्थिति में नया अभ्यावेदन देने अथवा अपीलीय क्षेत्राधिकार में ‘नो-पैरोल’ की शर्त को औपचारिक चुनौती देने में बाधक नहीं बनेगी।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2017–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक संदर्भ
मूल अपराध (FIR)20 जून 2017 — थाना जींद सिटी (हरियाणा)। भारतीय दंड संहिता की धारा 364 (अपहरण), 302 (हत्या), 201 (साक्ष्य मिटाना), 34 (समान आशय), सहपठित अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम तथा POCSO अधिनियम के तहत नाबालिग की नृशंस हत्या का मामला।
ट्रायल कोर्ट का दंडादेश9 जनवरी 2020 — अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ), जींद ने अपराध को अत्यंत नृशंस मानते हुए दोषी को मृत्युदंड के विकल्प के रूप में “संपूर्ण जैविक जीवन के लिए बिना पैरोल कारावास” (Imprisonment for the remainder of biological life without parole) और ₹23,000 के जुर्माने की सजा सुनाई।
पैरोल हेतु प्रस्तुत आधारदोषी ने हरियाणा सदाचारी बंदी (अस्थाई रिहाई) अधिनियम के तहत 8 सप्ताह की पैरोल मांगते हुए तर्क दिया कि:
1. उसकी मां की मृत्यु हो चुकी है।
2. पिता एक अन्य आपराधिक मामले में जेल में बंद हैं।
3. उसकी बहन घर में अकेली है और UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही है, जिसकी देखभाल और मदद के लिए परिवार में कोई अन्य सदस्य मौजूद नहीं है।
प्रशासनिक आदेश (DM)जिला मजिस्ट्रेट ने पैरोल अर्जी खारिज कर दी क्योंकि ट्रायल कोर्ट के फैसले में स्पष्ट ‘नो-पैरोल’ शर्त थी और रिहाई समाज के हित के विपरीत थी।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णयरिट याचिका खारिज (Dismissed); न्यायिक शर्त में बदलाव के बिना पैरोल देने से कोर्ट का स्पष्ट इनकार।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘स्वामी श्रद्धानंद सिद्धांत और विशेष श्रेणी दंडादेश’

  • ‘स्वामी श्रद्धानंद’ और ‘श्रीहरन’ नज़ीरों के तहत विशेष श्रेणी दंडादेश (Special Category Sentence):
    • भारत के आपराधिक न्यायशास्त्र में पहले आजीवन कारावास का अर्थ प्रायः 14 वर्ष बाद कार्यपालिका द्वारा समयपूर्व रिहाई (Premature Release) माना जाता था।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने स्वामी श्रद्धानंद (2) बनाम कर्नाटक राज्य [(2008) 13 SCC 767] और बाद में 5 जजों की संविधान पीठ ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी. श्रीहरन [(2016) 7 SCC 1] में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि जघन्य मामलों में जहां अपराध “दुर्लभ से दुर्लभतम” (Rarest of Rare) की सीमा पर हो, वहां अदालतें दोषी को फांसी के फंदे से बचाते हुए यह शर्त लगा सकती हैं कि वह अपने संपूर्ण प्राकृतिक जीवन (Biological Life) तक जेल में रहेगा और उसे किसी भी छूट, पैरोल या समयपूर्व रिहाई का लाभ नहीं मिलेगा।
    • जींद की सत्र अदालत ने इसी विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए यह सजा सुनाई थी।
  • न्यायिक आदेश की अवहेलना बनाम प्रशासनिक पैरोल:
    • पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य का सदाचारी बंदी अधिनियम किसी सामान्य आजीवन कारावास के कैदी पर लागू हो सकता है, किंतु वह किसी सत्र अदालत द्वारा पारित न्यायिक दंडादेश की विशिष्ट शर्त को अधिभूत (Override) नहीं कर सकता।
    • यदि हाईकोर्ट रिट क्षेत्राधिकार में ऐसी शर्त के रहते हुए पैरोल दे देता, तो यह ट्रायल कोर्ट के उस मूल विवेक को नष्ट कर देता जिसके तहत फांसी की सजा नहीं दी गई थी।
  • पारिवारिक आवश्यकता बनाम वैधानिक आपातकाल (Family Need vs Legal Emergency):
    • कानूनन आपातकालीन पैरोल केवल परिवार के किसी रक्त-संबंधी की मृत्यु, परिवार में किसी की जानलेवा बीमारी, या प्राकृतिक आपदा जैसी अप्रत्याशित घटनाओं पर दी जाती है।
    • किसी वयस्क बहन का प्रतियोगी परीक्षा (UPSC) की तैयारी करना एक नियमित और दीर्घकालिक प्रक्रिया है; इसे कानून के तहत ऐसा “आकस्मिक आपातकाल” नहीं माना जा सकता जो एक जघन्य हत्यारे की सजा की शर्तों को निलंबित करने का आधार बन सके।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ (आपराधिक रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: दोषी (सजायाफ्ता कैदी) बनाम हरियाणा राज्य व अन्य [CRWP No. … / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अनूप चितकारा एवं न्यायमूर्ति हरमीत सिंह देओल (खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: 31 अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: पैरोल याचिका पूर्णतः खारिज।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • हरियाणा सदाचारी बंदी (अस्थाई रिहाई) अधिनियम (Haryana Good Conduct Prisoners Temporary Release Act) — पैरोल व अस्थाई रिहाई के नियम
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) — धारा 302 (हत्या), धारा 364 (अपहरण), धारा 201 (साक्ष्य नष्ट करना)
    • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) एवं SC/ST (POA) Act, 1989
    • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 432 व 433A (दंडादेश का निलंबन व परिहार) / BNSS 2023 की धारा 473-475
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • विशेष श्रेणी दंडादेश और पैरोल की अयोग्यता का विधिक मानक: ‘जब सक्षम सत्र न्यायालय ने जघन्य अपराध में मृत्युदंड के विकल्प के रूप में संपूर्ण जैविक जीवन तक बिना पैरोल कारावास की विशिष्ट सजा सुनाई हो, तो जब तक वह न्यायिक शर्त अपीलीय अदालत द्वारा विधिवत संशोधित या निरस्त नहीं कर दी जाती, तब तक किसी भी वैधानिक पैरोल कानून के तहत अस्थाई रिहाई का दावा नहीं किया जा सकता; पैरोल कोई मौलिक या निरपेक्ष अधिकार नहीं है और बहन की प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी जैसी सामान्य पारिवारिक जरूरतें ट्रायल कोर्ट के न्यायिक दंडादेश को निष्प्रभावी करने का वैध आधार नहीं बन सकतीं।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद दोषी को जेल में ही रहना होगा; वह केवल नियमित अपीलीय मंच के समक्ष अपनी 2020 की मूल सजा में दर्ज ‘नो-पैरोल’ की शर्त को हटाने की कानूनी गुहार लगा सकता है।

Temporary Release Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतपंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab and Haryana High Court), चंडीगढ़
पीठन्यायमूर्ति अनूप चितकारा एवं न्यायमूर्ति हरमीत सिंह देओल
याचिकाकर्ता (दोषी)जींद (हरियाणा) के जींद सिटी थाने में दर्ज अपहरण और हत्या मामले का दोषी
मूल अपराध/सजाIPC धारा 302, 364, 201, 34, SC/ST एक्ट और POCSO एक्ट: अपर सत्र न्यायाधीश (ASJ), जींद द्वारा 9 जनवरी 2020 को बिना पैरोल के संपूर्ण प्राकृतिक जीवनकाल के कारावास की सजा।
मांगी गई राहतहरियाणा सुशासन बंदी (अस्थायी रिहाई) अधिनियम के तहत 8 सप्ताह की पैरोल।
अदालत का फैसलायाचिका खारिज: ‘बिना पैरोल’ की शर्त के बने रहते पैरोल नहीं दी जा सकती।
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