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Registered ‘Will’: वसीयत पंजीकृत दस्तावेज है…चुनौती देने वाले पर खंडित करने की होगी जिम्मेवारी

Registered ‘Will’: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, रजिस्टर्ड वसीयत को असली और सही मानने की कानूनी धारणा होती है और इसे चुनौती देने वाले पर ही इसका सबूत देने की जिम्मेदारी होती है।

लासुम बाई को पूरी जमीन की मालकिन माना

सोमवार को एक अहम फैसले में कोर्ट ने यह फैसला आंध्र प्रदेश की एक महिला लासुम बाई के पक्ष में सुनाया, जिनकी जमीन पर उनके सौतेले बेटे ने दावा किया था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की बेंच ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें लासुम बाई का हिस्सा घटाकर 1/4 कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल करते हुए लासुम बाई को पूरी जमीन की मालकिन माना।

यह है मामला

यह विवाद आंध्र प्रदेश की 4 एकड़ 16 गुंटा कृषि भूमि को लेकर था, जो मूल रूप से मेटपल्ली रामन्ना के नाम थी। उनकी मौत 1949 से पहले हो गई थी। बाद में यह जमीन उनके बेटे मेटपल्ली राजन्ना को मिली, जिनकी मौत 1983 में हुई। राजन्ना की पहली पत्नी से दो बच्चे थे- मुतैया (प्रतिवादी) और राजम्मा। दूसरी पत्नी लासुम बाई (अपीलकर्ता) थीं, जिनसे कोई संतान नहीं थी।

1974 में एक रजिस्टर्ड वसीयत बनाई थी

राजन्ना ने 1974 में एक रजिस्टर्ड वसीयत बनाई थी, जिसमें जमीन का बंटवारा लासुम बाई और पहली पत्नी के बच्चों के बीच किया गया था। साथ ही एक मौखिक पारिवारिक समझौता भी हुआ था। मुतैया ने इस वसीयत को चुनौती दी और दावा किया कि यह पुश्तैनी संपत्ति है और वह अकेला वारिस है। हाईकोर्ट ने वसीयत को नजरअंदाज करते हुए लासुम बाई को सिर्फ 1/4 हिस्सा दिया और बाकी 3/4 मुतैया को। इससे नाराज होकर लासुम बाई सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।

यह रही केस को लेकर सुप्रीम निर्देश

कोर्ट ने कहा कि रजिस्टर्ड वसीयत को असली मानने की धारणा होती है और मुतैया ने खुद माना कि वसीयत पर उसके पिता के हस्ताक्षर हैं। उसने यह भी स्वीकार किया कि जमीन का बंटवारा हुआ था और लासुम बाई उत्तरी हिस्सा जोत रही थीं, जबकि वह दक्षिणी हिस्सा।

वसीयत और मौखिक समझौते में जमीन का बंटवारा लगभग एक जैसा है

कोर्ट ने कहा कि वसीयत और मौखिक समझौते में जमीन का बंटवारा लगभग एक जैसा है। ट्रायल कोर्ट ने सही तरीके से वसीयत को मान्य माना था। मुतैया यह साबित नहीं कर सका कि वसीयत में कोई संदेहजनक बात थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि मौखिक समझौते को जमीन के कब्जे से भी बल मिलता है, क्योंकि लासुम बाई उस जमीन पर कब्जे में थीं और बाद में वह जमीन जनार्दन रेड्डी को बेची गई। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल करते हुए लासुम बाई को पूरी जमीन की मालकिन घोषित किया।

यह रही अदालत की पूरी टिप्पणी

पारिवारिक समझौते (जिस पर मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत हुए) और पंजीकृत वसीयत के अनुसार संपत्ति का बंटवारा लगभग समान अनुपात में हुआ। वसीयत एक पंजीकृत दस्तावेज है, और इस कारण इसकी प्रामाणिकता की धारणा स्वतः लागू होती है। ट्रायल कोर्ट ने वसीयत के निष्पादन को प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर स्वीकार किया। चूंकि वसीयत पंजीकृत दस्तावेज है, इसलिए इसका खंडन करने का बोझ उस पक्ष पर होगा जो इसे चुनौती देता है, यानी इस मामले में प्रतिवादी मुथैया पर, जिसे यह साबित करना होगा कि वसीयत कथित तरीके से निष्पादित नहीं हुई या उस पर संदेह करने योग्य परिस्थितियां हैं। लेकिन प्रतिवादी मुथैया ने अपने साक्ष्य में स्वीकार किया कि पंजीकृत वसीयत पर दिख रहे हस्ताक्षर उनके पिता एम. राजन्ना के हैं।


वादी लासुम बाई 6 एकड़ 16 गुंटा भूमि के कब्जे में थीं

वादी लासुम बाई 6 एकड़ 16 गुंटा भूमि के कब्जे में थीं, जो वसीयत के अनुसार उनके हिस्से में आई। इस पृष्ठभूमि में, ट्रायल कोर्ट का यह मानना सही था कि एम. राजन्ना ने 24 जुलाई 1974 की वसीयत और मौखिक पारिवारिक समझौते के जरिए अपने वैधानिक उत्तराधिकारियों में अपनी संपत्ति का उचित बंटवारा किया। हमारे विचार में, रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य मौखिक पारिवारिक समझौते के अस्तित्व और उसके प्रभावी होने को पुष्ट करते हैं, जो इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि विवादित संपत्ति सहित वादी लासुम बाई के पास उक्त भूमि का कब्जा था और बाद में खरीदार जनार्दन रेड्डी को दिया गया।”अतः, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल करते हुए अपीलकर्ता लासुम बाई को संपत्ति की पूर्ण स्वामिनी घोषित कर दिया।

Cause Title: METPALLI LASUM BAI (SINCE DEAD) AND OTHERS VERSUS METAPALLI MUTHAIH(D) C.A. No(s). 5921 of 2015 with C.A. No(s). 5922 of 2015

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