केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | दिल्ली हाई कोर्ट में दायर अपील |
| याचिकाकर्ता | इंडियन कानून (Indian Kanoon) |
| माननीय पीठ (Division Bench) | जस्टिस सी. हरि शंकर एवं जस्टिस विनोद कुमार |
| मुख्य कानूनी मुद्दे | अनुच्छेद 19(1)(a) [सूचना का अधिकार], अनुच्छेद 19(1)(g) [व्यापार की स्वतंत्रता], और अनुच्छेद 14 [समानता] |
| विवादित फैसला | 1 जून का एकल-पीठ आदेश जिसमें नाम से सर्च हटाने का निर्देश दिया गया था। |
| अगली सुनवाई की तारीख | 13 अगस्त |
Right to be Forgotten: प्रमुख ऑनलाइन कानूनी निर्णय डेटाबेस इंडियन कानून (Indian Kanoon) ने दिल्ली हाईकोर्ट को सूचित किया है कि वह हाई कोर्ट के एकल-पीठ के उस फैसले के कारण गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है, जिसमें प्लेटफॉर्म को कई निर्णयों और आदेशों के लिए नाम-आधारित खोज सुविधा (Name-based Search) को हटाने और डी-इंडेक्स (De-index) करने का निर्देश दिया गया था।
जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस विनोद कुमार की खंडपीठ के समक्ष इंडियन कानून की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने अपील की कि मामले की तत्काल सुनवाई की जाए। उच्च न्यायालय ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए इंडियन कानून की अपीलों को प्राथमिक सुनवाई के लिए 13 अगस्त को सूचीबद्ध (List) कर दिया है।
इंडियन कानून की दलीलें और चिंताएं
- केवल एक ही वेबसाइट को निशाना बनाया गया (Article 14 – समानता का अधिकार): वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने तर्क दिया कि यह आदेश केवल इंडियन कानून के खिलाफ पारित किया गया है, जबकि अन्य कानूनी डेटाबेस (जैसे SCC Online या अन्य प्लेटफ़ॉर्म) पर यह पाबंदी नहीं है।अरविंद दातार का तर्क: “मेरी कठिनाई यह है कि मैं अकेला विधिक पोर्टल हूँ जिसके खिलाफ यह आदेश है। अब मुझसे कहा जा रहा है कि मैं नाम-आधारित खोज सुविधा पूरी तरह हटा दूँ, जबकि अन्य सभी कानूनी वेबसाइटों पर पूर्ण और मुफ्त खोज सुविधा उपलब्ध है। मैंने पहले ही 80 निर्णय हटा दिए हैं और मुझे गंभीर परेशानी हो रही है।”
- व्यापार की स्वतंत्रता पर प्रभाव (Article 19(1)(g)): अपील में कहा गया है कि नाम-आधारित खोज किसी भी कानूनी डेटाबेस के लिए सबसे बुनियादी और आवश्यक सुविधा है। वकील, शोधकर्ता और नागरिक पक्षकारों के नाम से ही मामलों का इतिहास खोजते हैं। इसे हटाना व्यापार और पेशे की स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
- पुट्टस्वामी (Puttaswamy) फैसले का गलत अर्थ: इंडियन कानून ने अपील में कहा कि एकल पीठ (जस्टिस सचिन दत्ता) ने निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक के.एस. पुट्टस्वामी फैसले का गलत अर्थ निकाला है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘भूल जाने के अधिकार’ पर की गई टिप्पणियां केवल ‘ऑबिटर डिक्टा’ (Obiter Dicta – प्रासंगिक बातें) थीं, जो न्यायिक रिकॉर्ड से नाम मिटाने का कोई प्रवर्तनीय अधिकार नहीं देतीं।
- खुले न्याय का सिद्धांत (Open Justice) बनाम निजता: अपील के अनुसार, एकल-पीठ का फैसला संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत सूचना के अधिकार और ‘ओपन जस्टिस’ (खुली अदालत के सिद्धांत) तथा निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाने में विफल रहता है।
- नाम हटाने/रेडैक्शन की जिम्मेदारी किसकी? इंडियन कानून ने रुख अपनाया कि यदि अदालती रिकॉर्ड्स में नामों को छुपाना या हटाना (Redaction) है, तो यह कार्य निजी वेबसाइटों पर थोपने के बजाय खुद अदालत की रजिस्ट्री (Court Registry) के स्तर पर होना चाहिए।
एकल-पीठ (Single Judge) का विवादित फैसला क्या था?
1 जून को दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस सचिन दत्ता ने ‘भूल जाने के अधिकार’ (Right to be Forgotten) को मान्यता देते हुए फैसला सुनाया था कि व्यक्ति अदालती रिकॉर्ड के खोज योग्य संस्करणों से अपने नाम हटाने की मांग कर सकते हैं, यदि वह जानकारी “अब प्रासंगिक नहीं रह गई है” या उसका “कोई वैध सार्वजनिक उद्देश्य” नहीं बचा है।
इंडियन कानून ने इस ‘प्रासंगिकता और सार्वजनिक उद्देश्य’ के परीक्षण (Test) को अस्पष्ट बताया है, जिससे अदालतों में मनमाने और असंगत परिणाम पैदा हो सकते हैं।
आगे की प्रक्रिया
इंडियन कानून की अपीलों पर पहले अक्टूबर में सुनवाई होनी थी, लेकिन प्लेटफॉर्म की ओर से तत्काल राहत की मांग और अन्य अदालतों में इस फैसले को नजीर (Precedent) के रूप में उद्धृत किए जाने की बात रेखांकित करने के बाद, खंडपीठ ने सुनवाई की तारीख पहले करके 13 अगस्त तय कर दी है।
- इंडियन कानून के कानूनी प्रतिनिधि: वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार के साथ अधिवक्ता अपार गुप्ता, नमन कुमार और उज़मा शेख।

