Saturday, October 10, 2026
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Right to Health: हर कोई एस्टर मेडिसिटी जैसे महंगे प्राइवेट अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकता; घनी आबादी और गरीबों की जरूरतों को देखते हुए क्या केरल एक एम्स का भी हकदार नहीं?

केरल हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणियाँ

मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन केंद्र सरकार के स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुए और एर्नाकुलम के प्रसिद्ध निजी अस्पताल ‘एस्टर मेडिसिटी’ (Aster Medicity) का उदाहरण देते हुए कहा:

  1. निजी अस्पताल हर किसी की पहुँच में नहीं:“क्या इसका मतलब यह है कि केरल के लोगों को AIIMS की ज़रूरत नहीं है? हर कोई इलाज के लिए एस्टर (Aster) जैसे महंगे निजी अस्पतालों में नहीं जा सकता। राज्य के मौजूदा सरकारी अस्पताल गरीबों को पर्याप्त सुविधा देने के लिए काफी नहीं हैं।”
  2. अन्य राज्यों और दिल्ली का उदाहरण:“केरल में जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है। ऐसे राज्य भी हैं जहाँ एक से अधिक AIIMS हैं। दिल्ली में AIIMS क्यों है? वहाँ तो सभी साधन संपन्न लोग रहते हैं। क्या केरल एक AIIMS का भी हकदार नहीं है?”
  3. 10 साल से अटका है प्रस्ताव:अदालत ने रेखांकित किया कि केरल सरकार ने सभी सहायक दस्तावेजों और औचित्य (Justification) के साथ वर्ष 2016 में ही AIIMS की स्थापना का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था, लेकिन 10 वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।

कोच्चि: संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य के अधिकार (Right to Health), राज्यों के बीच तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं (Tertiary Healthcare) के समान वितरण, और प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (PMSSY) के तहत अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) स्थापित करने के नीतिगत मानकों पर केरल हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के रवैये पर तीखे सवाल उठाए हैं।

कासरगोड सहित विभिन्न क्षेत्रों में एम्स की स्थापना की मांग को लेकर दायर दो जनहित याचिका

मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने केरल के कासरगोड सहित विभिन्न क्षेत्रों में एम्स की स्थापना की मांग को लेकर दायर दो जनहित याचिकाओं (PILs) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। केंद्र सरकार की ओर से पेश डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया (DSGI) ने अदालत को बताया कि केंद्र उन राज्यों को प्राथमिकता दे रहा है जिनका स्वास्थ्य ढांचा कमजोर है और केरल तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में है। मुख्य न्यायाधीश सेन ने इस तर्क को खारिज करते हुए पूछा कि क्या केरल के लोग महंगे निजी सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों का खर्च वहन कर सकते हैं, और क्या दिल्ली जैसे संपन्न केंद्र में एम्स हो सकता है तो केरल एक एम्स का भी हकदार नहीं है? अदालत ने दो-टूक कहा है कि बेहतर स्वास्थ्य सूचकांक होने का यह अर्थ नहीं हो सकता कि राज्य के गरीबों और आम जनता को विश्वस्तरीय निःशुल्क व रियायती स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता नहीं है।

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उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘जनसंख्या घनत्व और गरीबों की जरूरतों के आधार पर प्राथमिकता मिले’ मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने राज्य की जनसांख्यिकी और स्वास्थ्य आवश्यकताओं को रेखांकित करते हुए कहा:“हमारी राय में, केरल राज्य पर भी जनसंख्या घनत्व (Density of Population) और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्राथमिकता के आधार पर (Priority basis) विचार किया जा सकता है कि मौजूदा सरकारी अस्पताल गरीबों और जरूरतमंदों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। हम उम्मीद करते हैं कि केंद्र सरकार राज्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए और इस तथ्य के मद्देनजर एक सुविचारित निर्णय लेगी कि सभी औचित्य व दस्तावेजों के साथ एम्स की स्थापना का प्रस्ताव केंद्र सरकार के समक्ष रखा गया था और यह मामला पिछले 10 वर्षों से लंबित है।”

2. मुख्य न्यायाधीश की तीखी टिप्पणी: ‘हर कोई एस्टर का खर्च नहीं उठा सकता’ केंद्र सरकार के इस तर्क पर कि केरल में मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली और निजी मेडिकल कॉलेज मौजूद हैं, मुख्य न्यायाधीश सेन ने कड़ा ऐतराज जताया:

  • सीजे सेन ने टिप्पणी की:“तो क्या इसका मतलब यह है कि केरल के लोगों को एम्स की जरूरत नहीं है? हर कोई एस्टर मेडिसिटी (Aster Medicity) जैसे निजी अस्पतालों में जाने का खर्च नहीं उठा सकता।केरल में भारी जनसंख्या घनत्व है। देश में ऐसे राज्य हैं जहां एक से अधिक एम्स मौजूद हैं। दिल्ली में एम्स क्यों है? वहां तो सभी साधन-संपन्न और अमीर लोग रहते हैं। क्या केरल एक अदद एम्स का भी हकदार नहीं है (Doesn’t Kerala deserve one AIIMS?)?“

केंद्र सरकार का पक्ष: ‘कमजोर स्वास्थ्य ढांचे वाले राज्यों को पहली प्राथमिकता’

  • सैद्धांतिक मंजूरी का अभाव:
    • केंद्र सरकार की ओर से पेश डिप्टी सॉलिसिटर जनरल (DSGI) ओ.एम. शालिना ने स्पष्ट किया कि केंद्र ने केरल में एम्स के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से खारिज (Reject) नहीं किया है, परंतु इसे अभी तक सैद्धांतिक मंजूरी (In-principle approval) भी नहीं दी गई है।
  • तुलनात्मक प्राथमिकता की नीति:
    • केंद्र ने दलील दी कि प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (PMSSY) के तहत उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्राथमिकता दी जा रही है जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा अत्यंत कमजोर है:
    “केरल में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पहले से ही अच्छी है। हम पहले उन राज्यों को प्राथमिकता दे रहे हैं जहां स्वास्थ्य ढांचा कमजोर है। हमें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को देखना होगा; तुलनात्मक रूप से केरल काफी बेहतर स्थिति में है।”

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: 2016 से लंबित प्रस्ताव और कासरगोड का संघर्ष

  • 2016 का राज्य प्रस्ताव और 10 साल की देरी:
    • केरल सरकार ने आवश्यक भूमि विवरण और सभी औचित्यपूर्ण दस्तावेजों के साथ वर्ष 2016 में ही केंद्र सरकार को एम्स स्थापना का औपचारिक प्रस्ताव सौंप दिया था।
    • अदालत ने चिंता जताई कि 10 वर्ष बीत जाने के बावजूद केंद्र ने इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है।
  • कासरगोड में एम्स की जन-मांग:
    • जनहित याचिका ‘एम्स कासरगोड जनकीय कूटायमा’ द्वारा दायर की गई थी।
    • उत्तरी केरल का कासरगोड जिला ऐतिहासिक रूप से एंडोसल्फान त्रासदी के पीड़ितों और सुपर-स्पेशियलिटी चिकित्सा सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। स्थानीय नागरिकों को गंभीर आपातकालीन इलाज के लिए पड़ोसी राज्य कर्नाटक (मंगलुरु) पर निर्भर रहना पड़ता है।
  • निजी क्षेत्र की सीमाओं का सवाल:
    • एर्नाकुलम और कोच्चि जैसे मध्य केरल के जिलों में निजी सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल (जैसे एस्टर मेडिसिटी, अमृता आदि) जरूर हैं, परंतु उनका भारी-भरकम इलाज खर्च गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले और मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुंच से बाहर है।

उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश

  1. तत्काल निर्णय लेने का आदेश: उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य की वास्तविक चिकित्सा आवश्यकताओं, जनसंख्या घनत्व और 2016 से लंबित प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए बिना किसी और देरी के (Without further delay) केरल में एम्स की स्थापना पर अंतिम व सचेत निर्णय ले।
  2. समग्र मूल्यांकन: केंद्र को निर्देश दिया गया कि वह केवल निजी स्वास्थ्य ढांचे की मौजूदगी को आधार बनाकर सरकारी सुपर-स्पेशियलिटी सुविधाओं की आवश्यकता को नजरअंदाज न करे।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • संविधान का अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य का अधिकार – Right to Health):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996) और परमानंद कटारा (1989) में स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में समय पर और सस्ती चिकित्सा सहायता पाने का अधिकार शामिल है।
  • संविधान का अनुच्छेद 47 (राज्य के नीति निदेशक तत्व):
    • राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह लोक स्वास्थ्य के सुधार (Improvement of Public Health) को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखे।
  • समान विकास और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism):
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं और केंद्रीय संस्थानों के आवंटन में राज्यों के साथ उनकी दक्षता के कारण सौतेला व्यवहार नहीं किया जा सकता। यदि किसी राज्य ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) बेहतर बनाए हैं, तो उसे तृतीयक अनुसंधान और सुपर-स्पेशियलिटी स्वास्थ्य संस्थानों (AIIMS) से वंचित रखना संघवाद की भावना के विपरीत है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: एम्स कासरगोड जनकीय कूटायमा बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (PIL) – केरल उच्च न्यायालय]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 7 अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • केंद्र सरकार की ओर से: डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया (DSGI) ओ.एम. शालिना
    • याचिकाकर्ताओं की ओर से: जनहित याचिका के अधिवक्तागण
  • प्रासंगिक कानून एवं नीतियां:
    • प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (PMSSY) [नए एम्स की स्थापना और मेडिकल कॉलेजों के उन्नयन की केंद्रीय योजना]
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता — स्वास्थ्य एवं गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार)
      • अनुच्छेद 47 (लोक स्वास्थ्य में सुधार का राज्य का दायित्व)
      • अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996, सुप्रीम कोर्ट) — ‘नागरिकों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने में वित्तीय या प्रशासनिक अक्षमता का बहाना राज्य नहीं बना सकता; यह अनुच्छेद 21 का संवैधानिक दायित्व है।’
  • वर्तमान स्थिति: केरल उच्च न्यायालय ने केंद्र के ‘कमजोर राज्यों को प्राथमिकता’ वाले तर्क को खारिज करते हुए 10 साल से लंबित प्रस्ताव पर केरल के जनसंख्या घनत्व और गरीबों के हित में जल्द निर्णय लेने का औपचारिक निर्देश दिया।

Right to Health: मामले का विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन एवं न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम.)
याचिका का विषयPMSSY योजना के तहत केरल में AIIMS अस्पताल की स्थापना
केंद्र सरकार का पक्षकमजोर स्वास्थ्य ढांचे वाले राज्यों को प्राथमिकता दी जा रही है; केरल की स्थिति बेहतर है।
हाईकोर्ट का रुखनिजी अस्पताल महंगे हैं; गरीब जनता के लिए केरल में भी AIIMS आवश्यक है।
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