Sunday, September 20, 2026
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SC News: मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत Arbitral awards में संशोधन, पढ़ें महत्वपूर्ण सुप्रीम फैसला

SC News: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि न्यायालय 1996 के मध्यस्थता और सुलह अधिनियम (Arbitration and Conciliation Act, 1996) के तहत मध्यस्थता पुरस्कारों (arbitral awards) में संशोधन कर सकते हैं।

घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पुरस्कारों पर प्रभाव डालेगा फैसला

मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बी. आर. गवई, संजय कुमार और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बहुमत वाली 4:1 की पीठ ने माना कि कुछ परिस्थितियों में अदालतें Arbitration and Conciliation Act, 1996 के प्रावधानों के तहत मध्यस्थता पुरस्कारों में संशोधन कर सकती हैं। यह फैसला वाणिज्यिक विवादों में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पुरस्कारों पर प्रभाव डालेगा।

धारा 34 और 37 के अंतर्गत मध्यस्थता पुरस्कारों में संशोधन की शक्ति सीमित

मुख्य न्यायाधीश ने निर्णय सुनाते हुए कहा कि अदालतों को मध्यस्थता पुरस्कारों में संशोधन करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। कहा, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को विशेष शक्तियां प्राप्त हैं, जिनके तहत वह किसी भी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए कोई भी आदेश या डिक्री पारित कर सकता है। लेकिन यह शक्ति अत्यंत सावधानी से और संविधान की सीमाओं के भीतर प्रयोग की जानी चाहिए। सीजेआई ने कहा, विधिक प्रश्न का उत्तर यह है कि अदालत के पास धारा 34 और 37 के अंतर्गत मध्यस्थता पुरस्कारों में संशोधन की सीमित शक्ति है।हालांकि, न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन, जो इस निर्णय में असहमति रखने वाले एकमात्र न्यायाधीश थे, ने माना कि अदालतें मध्यस्थता पुरस्कारों में संशोधन नहीं कर सकतीं। बहुमत वाले निर्णय में उन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें अदालतों द्वारा यह सीमित संशोधन शक्ति प्रयोग की जा सकती है।

कुछ परिस्थितियों में पोस्ट-अवार्ड ब्याज में भी संशोधन संभव

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जब पुरस्कार के अवैध हिस्से को वैध हिस्से से अलग किया जा सकता है, तब अदालत रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटियों जैसे कि टंकण, गणना या क्लेरिकल गलतियों को सुधारने के लिए अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकती है। बहुमत वाले फैसले में यह भी कहा गया कि कुछ परिस्थितियों में पोस्ट-अवार्ड ब्याज में भी संशोधन किया जा सकता है। अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को ऐसा कोई भी आदेश पारित करने की शक्ति देता है जो किसी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो। यह विवेकाधीन शक्ति न्यायालय को सख्त कानूनी सीमाओं से परे जाकर उन मामलों में न्याय सुनिश्चित करने की अनुमति देती है जहां मौजूदा कानून पर्याप्त नहीं होते। इस पर विस्तृत निर्णय अभी प्रतीक्षित है।

कई वरिष्ठ वकीलों ने मामले में रखा अपना पक्ष

सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी को तीन दिन की सुनवाई के बाद इस जटिल कानूनी मुद्दे पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस मामले की अंतिम सुनवाई 13 फरवरी से शुरू हुई थी, जब 23 जनवरी को एक तीन-सदस्यीय पीठ ने इसे मुख्य न्यायाधीश को विचार के लिए भेजा था। इस मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अलावा वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार, डेरियस खंबाटा, शेखर नपाहड़े, रितिन राय, सौरभ किर्पाल और गौरव बनर्जी ने दलीलें दी थीं। दातार के नेतृत्व में वकीलों के एक समूह ने तर्क दिया कि न्यायालय, जो धारा 34 के तहत मध्यस्थता पुरस्कारों को कुछ आधारों पर रद्द करने के लिए सशक्त हैं, उनके पास इन्हें संशोधित करने की भी शक्ति होनी चाहिए क्योंकि वह एक कम शक्तिशाली अधिकार में आता है।

यह कानून विवाद समाधान का एक वैकल्पिक तरीका है: पक्षकार

एक अन्य पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि चूंकि संशोधन (modify) शब्द कानून में नहीं है, इसलिए इसे पढ़ कर ऐसे अधिकार की कल्पना नहीं की जा सकती जो कानून में है ही नहीं। 1996 का यह कानून विवाद समाधान का एक वैकल्पिक तरीका है, जो न्यायालयों की मध्यस्थता पुरस्कारों में हस्तक्षेप की भूमिका को कम करता है। धारा 34 के तहत मध्यस्थता पुरस्कार को सीमित आधारों पर रद्द करने का प्रावधान है, जैसे कि प्रक्रिया में अनियमितता, सार्वजनिक नीति का उल्लंघन या अधिकार क्षेत्र की कमी। वहीं धारा 37 मध्यस्थता से संबंधित आदेशों के खिलाफ अपील को नियंत्रित करती है, जिसमें पुरस्कार को रद्द करने से इनकार करने वाले आदेश भी शामिल हैं। इन दोनों धाराओं का उद्देश्य न्यायिक हस्तक्षेप को न्यूनतम रखना है, जबकि कुछ अपवादात्मक मामलों में निगरानी सुनिश्चित करना भी ज़रूरी होता है।

तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने सीजेआई को विचार के लिए भेजा था

पीठ ने पहले कहा था, जब इस प्रश्न की जांच की जाएगी, तो अदालत इस शक्ति की सीमा और दायरे की भी जांच करेगी कि अगर संशोधन की शक्ति मौजूद है, तो उसका प्रयोग किस हद तक किया जा सकता है। यह मामला गायत्री बालासामी बनाम आईएसजी नोवासॉफ्ट टेक्नोलॉजीज़ लिमिटेड से संबंधित है। परंपरागत रूप से अदालतों ने इस धारा की व्याख्या संकीर्ण दृष्टिकोण से की है और मध्यस्थता के पुरस्कारों के गुण-दोषों की समीक्षा करने से बचा है ताकि इसके अंतिमता और दक्षता के सिद्धांत को बनाए रखा जा सके। फरवरी 2024 में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कुछ प्रश्न तय कर यह मामला सीजेआई को विचार के लिए सौंपा था।

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