Thursday, November 5, 2026
HomeLaworder HindiSC news: विरोधाभासी फैसलों से भरोसा डगमगाता है…कनार्टक हाईकोर्ट के दो अलग-अलग...

SC news: विरोधाभासी फैसलों से भरोसा डगमगाता है…कनार्टक हाईकोर्ट के दो अलग-अलग फैसलों पर टिप्पणी

SC news: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, विभिन्न पीठों के परस्पर विरोधाभासी फैसले जनता का न्यायपालिका पर भरोसा डगमगाते हैं, जबकि निरंतरता एक जिम्मेदार न्यायपालिका की पहचान होनी चाहिए।

पत्नी ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी

दरअसल, यह फैसला उस याचिका पर आया जिसे पत्नी ने हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर किया था, जिसमें उसके अलग रह रहे पति के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द कर दिया गया था। उसने आरोप लगाया कि उसका पति किसी अन्य महिला के साथ रिश्ते में था, जिसने उसे गालियां दीं, और पति व उसके परिवार वालों ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया तथा ₹2 लाख दहेज की मांग की। इसके बाद उसने अपने माता-पिता के घर रहने का निर्णय लिया और पति व ससुराल वालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना व मारपीट का मामला दर्ज कराया। फिर पति व अन्य आरोपियों ने हाई कोर्ट में FIR रद्द करने की याचिका दायर की थी।

दो अलग-अलग एकल पीठों ने विरोधाभासी निर्णय दिए

न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ एक वैवाहिक मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें कर्नाटक हाई कोर्ट की दो अलग-अलग एकल पीठों ने विरोधाभासी निर्णय दिए थे। पीठ ने कहा, वर्तमान मामला एक चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है। एक न्यायाधीश ने ससुरालवालों के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया क्योंकि मेडिकल रिपोर्ट में चोटों का उल्लेख था, जिससे पता चलता है कि अपीलकर्ता पर हमला हुआ था और उसे साधारण चोटें आई थीं। दूसरी ओर, दूसरे न्यायाधीश ने पति के खिलाफ कार्यवाही यह कहते हुए रद्द कर दी कि मेडिकल प्रमाण पत्र शिकायत में किए गए आरोपों से मेल नहीं खाता। न्यायमूर्ति बागची ने दूसरे न्यायाधीश के उस आदेश की आलोचना की जिसमें पति के खिलाफ कार्यवाही रद्द की गई थी। उन्होंने कहा, हमारी राय में, न्यायाधीश ने एफआईआर/चार्जशीट में आरोपों की सच्चाई का मूल्यांकन करके कानून की गलती की है, जो कानूनी रूप से अनुमेय नहीं है।

विरोधाभासी फैसले जनता के विश्वास को डगमगा देते हैं: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जज ने एक “मिनी ट्रायल” कर डाला जो कानून के अनुसार गलत है। साथ ही यह भी कहा कि पहले ससुराल वालों के खिलाफ कार्यवाही न रद्द करने का आदेश पास हो चुका था, फिर भी पति के पक्ष में आदेश में उसका कोई ज़िक्र नहीं किया गया, जो न्यायिक अनुशासन और मर्यादा का उल्लंघन है। पीठ ने कहा, न्यायिक निर्णयों में निरंतरता एक जिम्मेदार न्यायपालिका की पहचान है। विरोधाभासी फैसले जनता के विश्वास को डगमगा देते हैं और मुकदमों को एक सट्टा बना देते हैं, जिससे फोरम शॉपिंग जैसी चालाक प्रथाओं को बढ़ावा मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने यह कहकर खुद को गुमराह किया कि कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण है और अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, क्योंकि मामला वैवाहिक न्यायालय में लंबित था। पत्नी के साथ क्रूरता के मामले अक्सर वैवाहिक विवादों से ही उत्पन्न होते हैं।

यह ट्रायल का विषय है, न की एफआईआर रद्द करने का आधार

पीठ ने यह भी कहा कि केवल वैवाहिक मामला लंबित होने का अर्थ यह नहीं कि हमले का आरोप, जो मेडिकल सबूत और स्वतंत्र गवाहों द्वारा समर्थित हो, दुर्भावनापूर्ण या अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अंत में कोर्ट ने कहा, इस स्थिति में, जज द्वारा मेडिकल और मौखिक साक्ष्य का तुलनात्मक विश्लेषण कर कार्यवाही रद्द करना अनुचित था। क्या मौखिक गवाही मेडिकल रिपोर्ट से मेल खाती है या नहीं, यह ट्रायल का विषय है, न कि FIR रद्द करने का आधार।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
clear sky
26.2 ° C
26.2 °
26.2 °
70 %
2.3kmh
1 %
Thu
30 °
Fri
29 °
Sat
29 °
Sun
30 °
Mon
30 °

Recent Comments