Service Disputes: दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रशासनिक सेवा विवादों में क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के प्रक्रियात्मक नियमों की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय सुनाया है।
अदालत ने Service Disputes को लेकर फोरम कन्वीनिएंस पर दिया स्पष्टीकरण
हाईकोर्ट के जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीजन बेंच ने कैट के चेयरपर्सन के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक सेवा विवाद को एर्नाकुलम पीठ (केरल) से दिल्ली स्थित प्रधान पीठ (Principal Bench) में स्थानांतरित (Transfer) करने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि फोरम कन्वीनिएंस (सुविधाजनक मंच) का सामान्य न्यायिक सिद्धांत, कैट (प्रक्रिया) नियमावली, 1987 के वैधानिक प्रावधानों को दरकिनार नहीं कर सकता, जो स्पष्ट रूप से आवेदक (Applicant) की पोस्टिंग के स्थान को प्राथमिकता देते हैं।
Service Disputes को लेकर विधिक पृष्ठभूमि: प्रमोशन विवाद और पीठ बदलने की मांग
यह कानूनी विवाद केंद्र सरकार के कर्मचारियों की पदोन्नति (Promotion) को चुनौती देने से जुड़ा है।
मूल विवाद: कुछ कर्मचारियों (मूल आवेदकों) ने याचिकाकर्ताओं के प्रमोशन आदेश को कैट की एर्नाकुलम पीठ के समक्ष चुनौती दी थी, क्योंकि वे वहीं तैनात थे।
दिल्ली ट्रांसफर की गुहार: जिन याचिकाकर्ताओं (मूल प्रतिवादियों) के प्रमोशन को चुनौती दी गई थी, उन्होंने कैट के चेयरपर्सन के समक्ष प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम की धारा 25 के तहत मामला दिल्ली ट्रांसफर करने की अर्जी लगाई। उनकी दलील थी कि चूंकि प्रमोशन आदेश दिल्ली से जारी हुआ था और अधिकांश प्रतिवादी केरल से बाहर के हैं, इसलिए ‘फोरम कन्वीनिएंस’ (पक्षकारों की सुविधा) के आधार पर दिल्ली में सुनवाई होनी चाहिए। कैट चेयरपर्सन द्वारा इसे खारिज किए जाने पर वे हाई कोर्ट पहुंचे।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: कैट नियम 6(1) की सर्वोच्चता
दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह से खारिज (Dismissed) करते हुए निम्नलिखित विधिक सिद्धांतों को रेखांकित किया।
नियम 6(1) आवेदक को देता है प्राथमिकता
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 (हाई कोर्ट का क्षेत्राधिकार) या दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 20 के विपरीत, केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (प्रक्रिया) नियमावली, 1987 का नियम 6(1) एक विशेष व्यवस्था देता है। इसके तहत कोई भी मूल आवेदन (OA) सामान्यतः उसी पीठ के समक्ष दायर किया जाना चाहिए जिसके क्षेत्राधिकार में आवेदक वर्तमान में तैनात (Posted) है, या जहां वाद-कारण (Cause of Action) आंशिक या पूर्ण रूप से उत्पन्न हुआ है। अदालत ने टिप्पणी की, यदि ‘फोरम कन्वीनिएंस’ के सिद्धांत को लागू भी किया जाए, और यदि आवेदक एक स्थान पर तथा प्रतिवादी दूसरे स्थान पर स्थित हैं, तो नियम 6(1)(i) के आलोक में सामान्यतः सुविधाजनक मंच वही माना जाएगा जहां आवेदक स्थित हैं, न कि वह स्थान जहां प्रतिवादी बैठे हैं। प्रतिवादी इस सिद्धांत का हवाला देकर आवेदकों को किसी अन्य पीठ में मुकदमा लड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।
डोमिनस लिटिस (Dominus Litis) का विधिक अधिकार
अदालत ने कैट चेयरपर्सन के इस तर्क का पुरजोर समर्थन किया कि मुकदमे को शुरू करने वाला आवेदक ही ‘डोमिनस लिटिस’ (मुकदमे का स्वामी) होता है। यदि कानूनन एर्नाकुलम पीठ के पास क्षेत्राधिकार है, तो आवेदकों को अपनी पसंद के मंच पर न्याय मांगने का पूरा विधिक अधिकार है।
चेयरपर्सन की स्थानांतरण शक्ति और वर्चुअल कोर्ट का युग
डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम की धारा 25 के तहत मामलों को ट्रांसफर करने की कैट चेयरपर्सन की शक्ति पूरी तरह से प्रशासनिक और विवेकाधीन (Administrative and Discretionary) है। हाई कोर्ट इसमें अनुच्छेद 226 के तहत केवल तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब आदेश पूरी तरह से मनमाना, त्रुटिपूर्ण या विकृत हो। बेंच ने आधुनिक तकनीक को रेखांकित करते हुए एक बेहद व्यावहारिक टिप्पणी की, इसके अलावा, हमें इस तथ्य के प्रति भी सचेत रहना होगा कि प्रौद्योगिकी (Technology) के इस दौर में, देश के विभिन्न स्थानों पर बैठे पक्षकारों के लिए वर्चुअल माध्यम (Virtual Hearings) से कार्यवाही में भाग लेना पूरी तरह संभव है, भले ही वे शारीरिक रूप से यात्रा करने की स्थिति में न हों।
Service Disputes: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | दिल्ली उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (जून 2026) |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (डिवीजन बेंच) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला |
| प्रासंगिक कानून / नियम | कैट (प्रक्रिया) नियमावली, 1987 का नियम 6(1); प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम की धारा 25 |
| मूल विधिक प्रश्न | क्या ‘फोरम कन्वीनिएंस’ के आधार पर प्रतिवादी, आवेदक को उसकी पोस्टिंग वाली कैट बेंच के बजाय किसी अन्य बेंच में जाने पर मजबूर कर सकता है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | नहीं। कैट नियमों में आवेदक के निवास/पोस्टिंग स्थान को प्राथमिकता दी गई है। प्रतिवादियों की सुविधा के लिए इसे बदला नहीं जा सकता, विशेषकर तब जब अब वर्चुअल हियरिंग की सुविधा उपलब्ध है। |
| अंतिम न्यायिक परिणाम | रिट याचिका पूरी तरह खारिज (Writ Petition Dismissed); मामला कैट की एर्नाकुलम पीठ में ही चलेगा। |

