Sunday, June 28, 2026
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NI Act: 2004 की शिकायत, 2026 में भी लंबित…चेक बाउंस मामले में 22 साल की देरी क्यों हुई, जानिए कारण को

NI Act: केरल हाईकोर्ट ने देश की न्यायिक प्रणाली में मुकदमों के लंबे समय तक खिंचने और ‘तारीख-पर-तारीख’ की संस्कृति पर एक बेहद कड़ा और चिंताजनक रुख अपनाया है।

NI Act से जुड़े केस करीब 100 से अधिक तारीखों (Postings) से लंबित

हाईकोर्ट के जस्टिस सी.एस. डियास की एकल पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत को सख्त विधिक निर्देश दिया है कि 20 से अधिक वर्षों और 100 से अधिक तारीखों (Postings) से लंबित इस ‘समरी ट्रायल’ (संक्षिप्त विचारण) को आगामी 2 महीने के भीतर अनिवार्य रूप से अंतिम फैसले तक पहुंचाया जाए। अदालत ने टिप्पणी की है कि साल 2004 में दर्ज की गई चेक बाउंस (Section 138 NI Act) की एक शिकायत का साल 2026 में भी लंबित होना, संसद के विधिक इरादों और न्यायशास्त्र के सिद्धांतों का मज़ाक उड़ाने जैसा है।

मामला क्या था? ₹8 लाख का चेक और दो दशकों का इंतजार

विवाद की जड़: यह मामला साल 2004 में शुरू हुआ था, जिसकी विधिक यात्रा इस प्रकार है। आरोपी ने शिकायतकर्ता को ₹8,00,000/- का एक चेक जारी किया था, जो बैंक में ‘खाते में पर्याप्त राशि न होने’ (Insufficiency of funds) के कारण बाउंस हो गया। विधिक नोटिस भेजने के बाद भी जब आरोपी ने भुगतान नहीं किया, तो 2004 में धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज की गई।

22 साल तक लटका रहा ट्रायल: शिकायतकर्ता ने मुख्य परीक्षा के बदले अपना साक्ष्य हलफनामा (Proof Affidavit) दाखिल कर दिया और दस्तावेज भी कोर्ट के रिकॉर्ड पर ले आए। लेकिन, अगले दो दशकों से अधिक समय तक 100 से अधिक तारीखें लगने के बावजूद आरोपी द्वारा शिकायतकर्ता का जिरह (Cross-Examination) तक दर्ज नहीं किया जा सका।

कार्रवाई रोकने का पैंतरा: मामले को और लटकाने के लिए आरोपी ने निचली अदालत में अर्जी लगाई कि चूंकि इसी लेनदेन से जुड़े एक सिविल मामले की अपील हाई कोर्ट में लंबित है, इसलिए इस आपराधिक कार्यवाही को रोक (Stay) दिया जाए। ट्रायल कोर्ट द्वारा इस अर्जी को खारिज करने के बाद आरोपी ने पूरी शिकायत को ही रद्द (Quash) कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया।

NI Act के लंबित केस को लेकर तीखी टिप्पणी: यह जनता के भरोसे को तोड़ना है

जस्टिस सी.एस. डियास ने मामले की स्टेटस शीट को देखकर गहरा दुख व्यक्त किया और न्याय वितरण प्रणाली की खामियों पर बेबाक टिप्पणी की, इस मामले से अलग होने से पहले, यह अदालत इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त करती है कि यह मुकदमा दो दशकों तक कैसे घिसटता रहा। एनआई एक्ट के अध्याय XVII का उद्देश्य वाणिज्यिक लेनदेन में विश्वास जगाना और चेक बाउंस होने पर त्वरित न्याय सुनिश्चित करना है। संसद ने स्पष्ट आदेश दिया है कि धारा 138 के तहत मुकदमों का ट्रायल ‘समरी’ (Expeditious Summary Trial) तरीके से हो। 2004 में शुरू हुई शिकायत का 2026 में भी लंबित होना, विधायी मंशा के पूरी तरह विपरीत है।

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बार-बार तारीख से कानून के जनादेश को किया विफल

अदालत ने आगे जोड़ा, प्रोसीडिंग शीट से साफ है कि उदारतापूर्वक बार-बार दी गई तारीखों (Adjournments) के पैटर्न ने कानून के जनादेश को विफल कर दिया है। हमारी न्याय प्रणाली धारा 138 की कार्यवाही को कभी न खत्म होने वाली मुकदमेबाजी में बदलने की अनुमति नहीं दे सकती। यह न केवल शिकायतकर्ता के अधिकारों को कुचलता है, बल्कि न्याय प्रशासन में जनता के विश्वास को भी कमजोर करता है।

आरोपी के सभी विधिक तर्क खारिज

हाई कोर्ट ने आरोपी द्वारा उठाए गए तकनीकी और कानूनी बहानों को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

सिविल और आपराधिक मामले साथ चलेंगे: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि एक ही लेनदेन से उत्पन्न सिविल अपील और आपराधिक मुकदमा समानांतर (Simultaneously) और स्वतंत्र रूप से चल सकते हैं। सिविल केस के कारण क्रिमिनल ट्रायल को रोकने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।

20 साल बाद दस्तावेजों पर आपत्ति अवैध: आरोपी का तर्क था कि कोर्ट ने मूल दस्तावेजों के बजाय फोटोकॉपी को रिकॉर्ड पर ले लिया। कोर्ट ने कहा कि ये दस्तावेज दशकों पहले बिना किसी विधिक आपत्ति के मार्क किए गए थे। 22 साल तक चुप रहने के बाद अब इस पर सवाल उठाना कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

वित्तीय क्षमता और विधिक धारणा (Statutory Presumption): आरोपी ने दावा किया कि शिकायतकर्ता के पास ₹8 लाख देने की वित्तीय क्षमता नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 139 के तहत कानूनन यह माना जाता है कि चेक विधिक देनदारी के लिए ही जारी किया गया था। इस धारणा को आरोपी को ट्रायल के दौरान साक्ष्य देकर गलत साबित करना होगा, हाई कोर्ट प्री-ट्राल चरण में इसकी विस्तृत फैक्ट-फाइंडिंग जांच नहीं कर सकता।

NI Act: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक श्रेणियां / बिंदुकेरल उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (जून 2026)
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस सी.एस. डियास (एकल पीठ)
मुकदमे का वर्षवर्ष 2004 (निचली अदालत में संस्थान की तिथि)
लंबित रहने की अवधि22 वर्ष (100 से अधिक अदालती तारीखें)
प्रासंगिक कानूनपरक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act) की धारा 138, 139
अदालत का विधिक स्टैंडचेक बाउंस के संक्षिप्त मुकदमों का अंतहीन मुकदमेबाजी में बदलना न्याय की विफलता है। बार-बार स्थगन (Adjournments) देना कानूनन गलत है।
अंतिम न्यायिक आदेशआरोपी की याचिका खारिज; ट्रायल कोर्ट को 2 महीने की सख्त समय-सीमा के भीतर मुकदमा निपटाने का निर्देश।
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