Tuesday, September 29, 2026
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Social Media: 12-15 साल के बच्चों को सीधे अकाउंट खोलने की छूट कैसे?; SG ने दिया भरोसा-कुछ किया जा सकता है, कुछ किया जाना चाहिए और कुछ किया जाएगा

अदालत की मुख्य टिप्पणियां और चिंताएं

  1. कम उम्र के बच्चों के अकाउंट और अनुबंध (Contracts): न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि X (ट्विटर) और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 12 से 15 साल के बच्चों को अकाउंट खोलने की अनुमति दे रहे हैं। उन्होंने कहा:“15 साल का बच्चा भी सोशल मीडिया पर एक्टिव है। कम से कम ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए न्यूनतम आयु सीमा का उल्लंघन न हो।”
  2. नाबालिगों के साथ अनुबंध ‘शून्य’ (Void Ab Initio): सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कोर्ट के रुख से सहमति जताते हुए स्वीकार किया कि भारतीय कानून (भारतीय अनुबंध अधिनियम) के तहत नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया कंपनियों के साथ किए गए कोई भी समझौते या कॉन्ट्रैक्ट कानूनी रूप से अमान्य (Void ab initio) होते हैं।
  3. धारा 79 (Safe Harbor) वापस लेने की चेतावनी: CJI सूर्यकांत ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 (जो सोशल मीडिया कंपनियों को थर्ड-पार्टी कंटेंट के लिए कानूनी सुरक्षा देती है) का उल्लेख करते हुए चेतावनी दी:“यदि इस मुद्दे का उचित समाधान नहीं निकाला गया, तो हम इन सभी सोशल मीडिया मध्यस्थों के खिलाफ धारा 79 के प्रावधानों का उपयोग करके निर्देश जारी करने के लिए मजबूर होंगे।”

केंद्र सरकार की ओर से क्या कहा गया?

  • DPDP अधिनियम और IT नियम: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) नियम के तहत नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट के लिए माता-पिता की सहमति (Parental Consent) का प्रावधान है।
  • त्वरित कार्रवाई का आश्वासन: चूंकि DPDP नियमों का पूर्ण क्रियान्वयन 2027 से होना तय है, इसलिए SG ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि सरकार इससे पहले ही IT अधिनियम के तहत ‘सोशल मीडिया इंटरमीडियरी रूल्स’ में बदलाव कर बच्चों के खातों पर माता-पिता की सहमति अनिवार्य करने के लिए कदम उठाएगी।

नई दिल्ली: बच्चों और नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के अनियंत्रित उपयोग, डिजिटल सुरक्षा में चूक, ऑनलाइन ग्रूमिंग व शोषण के बढ़ते खतरों और भारतीय अनुबंध कानून के खुले उल्लंघन पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्पष्ट वैधानिक तंत्र तैयार करने के कड़े निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने गैर-सरकारी संगठन ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ (Just Rights for Children Alliance) द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह गंभीर चिंता व्यक्त की। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया मध्यवर्तियों (Intermediaries) को भारतीय कानूनों के दायरे में लाने के लिए तुरंत आवश्यक नियम नहीं बनाए, तो अदालत सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 (Section 79 of IT Act) के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मिलने वाली थर्ड-पार्टी कानूनी सुरक्षा (‘सेफ हार्बर’ इम्युनिटी) पर कड़े न्यायिक निर्देश जारी करने को बाध्य होगी।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक अवलोकन एवं तीखी टिप्पणियां

1. ’18 वर्ष की आयु सीमा का उल्लंघन; नाबालिगों का अनुबंध प्रारंभ से ही शून्य’

पीठ ने भारतीय अनुबंध अधिनियम (Indian Contract Act) और विभिन्न वैश्विक तकनीकी कंपनियों (X/ट्विटर, फेसबुक, स्नैपचैट आदि) की नीतियों के बीच सीधे विरोधाभास को रेखांकित किया:

  • न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा 12 से 15 वर्ष के किशोरों को स्वतंत्र खाता खोलने की छूट देने पर गहरी आपत्ति जताई: “एक 15 साल का बच्चा ट्विटर पर खाता खोल सकता है। सोशल मीडिया मध्यवर्तियों को कम से कम अपनी सदस्यता (Membership) को इस प्रकार विनियमित करना चाहिए कि 18 वर्ष की न्यूनतम विधिक सीमा (18-year threshold) का उल्लंघन न हो।”
  • अदालत ने जोर देकर कहा कि भारत सरकार को सोशल मीडिया मध्यवर्ती नियमों (IT Rules) के तहत स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इन प्लेटफॉर्म्स का संचालन पूरी तरह भारतीय कानूनों के अनुरूप हो।

2. आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत ‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbor) छिनने की चेतावनी

  • मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने केंद्र सरकार को चेताते हुए कड़ा रुख अपनाया:“यदि इस मुद्दे का समय रहते उचित समाधान नहीं किया जाता है, तो हम इन सभी मध्यवर्तियों (Intermediaries) के विरुद्ध सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के प्रावधानों का सहारा लेकर सीधे न्यायिक निर्देश जारी करने के लिए बाध्य होंगे।”
  • (विदित हो कि धारा 79 सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर द्वारा पोस्ट की गई आपत्तिजनक सामग्री पर आपराधिक या दीवानी दायित्व से कानूनी ढाल/संरक्षण प्रदान करती है; यदि यह सुरक्षा समाप्त होती है, तो प्लेटफॉर्म्स पर सीधे मुकदमे दर्ज हो सकेंगे)।

3. सॉलिसिटर जनरल का आश्वासन: ‘कुछ किया जाएगा’

  • भारत के सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने अदालत की चिंताओं से पूर्ण सहमति जताते हुए स्वीकार किया:“कुछ न कुछ करना ही होगा… हमें मध्यवर्ती प्लेटफॉर्म्स को नियंत्रित करना होगा। नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया कंपनियों के साथ किए गए अनुबंध कानूनी रूप से शून्य (Void ab initio) हैं। उन्हें भारतीय कानून का पालन करना ही होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है… कुछ किया जा सकता है, कुछ किया जाना चाहिए और कुछ किया जाएगा (Something can be done, something should be done, something will be done)।”
  • मुख्य न्यायाधीश द्वारा धारा 79 के तहत निर्देश देने की चेतावनी पर सॉलिसिटर जनरल ने तुरंत कहा: “नहीं माय लॉर्ड्स, सरकार स्वयं ऐसा कदम उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है।”

डीपीडीपी एक्ट 2023 बनाम आईटी नियम 2021: विधिक पेच

सुनवाई के दौरान कानून लागू होने की समय-सीमा को लेकर महत्वपूर्ण विधिक बहस हुई:

  • सॉलिसिटर जनरल की शुरुआती दलील: एसजी ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मुद्दा डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act, 2023) के दायरे में आता है, जिसकी धारा 9 में बच्चों के डेटा प्रसंस्करण के लिए सत्यापन योग्य माता-पिता की सहमति (Verifiable Parental Consent) अनिवार्य की गई है।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका का प्रतिवाद:
    • याचिकाकर्ता एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका ने तुरंत विधिक स्थिति स्पष्ट करते हुए अदालत को बताया कि डीपीडीपी अधिनियम अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हुआ है और इसके प्रावधान वर्ष 2027 से प्रभावी होने की संभावना है।
    • उन्होंने कहा कि वर्ष 2027 तक बच्चों को अनियंत्रित और असुरक्षित डिजिटल माहौल में नहीं छोड़ा जा सकता।
  • एसजी का वैकल्पिक समाधान: सॉलिसिटर जनरल ने सहमति जताते हुए सुझाव दिया कि डीपीडीपी व्यवस्था की तर्ज पर माता-पिता की पूर्व सहमति (Parental Consent) और अनुबंध पर अभिभावक के हस्ताक्षर की अनिवार्यता को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में संशोधन करके तुरंत लागू किया जा सकता है।

जनहित याचिका (PIL) में उठाए गए मुख्य मुद्दे एवं खतरे

याचिकाकर्ता ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ (वकील साकथोम माहेश्वरी के माध्यम से दाखिल) ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिगों के समक्ष मौजूद गंभीर खतरों को रेखांकित किया है:

  1. अनुबंध की अक्षमता: भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 11 के तहत 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति अनुबंध करने के लिए सक्षम नहीं है। इसके बावजूद 13-14 वर्ष के बच्चे स्वतंत्र रूप से नियम व शर्तों (Terms of Service) को स्वीकार कर खाते बना रहे हैं।
  2. सख्त आयु सत्यापन का अभाव: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के पास मजबूत एज-वेरिफिकेशन (Age-Verification) और माता-पिता के ई-केवाईसी (e-KYC) का कोई तंत्र मौजूद नहीं है।
  3. गंभीर अपराधों का जोखिम: ऑनलाइन ग्रूमिंग (Online Grooming), बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM), साइबर बुलिंग, डेटा का दुरुपयोग और लक्षित विज्ञापनों (Targeted Ads) के जरिए बच्चों के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।
  4. संवैधानिक अधिकारों का हनन: अनियंत्रित डिजिटल पहुंच के कारण बच्चों के जीवन, व्यक्तिगत सुरक्षा, गरिमा और निजता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) पर निरंतर खतरा मंडरा रहा है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस बनाम भारत संघ व अन्य [W.P.(C) संख्या 1120/2026 – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (NGO) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका (निर्देशन: एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड साकथोम माहेश्वरी)
    • केंद्र सरकार की ओर से: सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया (SG) तुषार मेहता
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000:
      • धारा 79 (सोशल मीडिया मध्यवर्तियों के लिए ‘सेफ हार्बर’ संरक्षण)
      • धारा 87 (केंद्र सरकार की नियम बनाने की शक्ति)
    • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Rules, 2021)
    • भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872):
      • धारा 10 एवं 11 (अनुबंध करने की सक्षमता – अवयस्क द्वारा किया गया अनुबंध प्रारंभ से ही शून्य / Void ab initio)
    • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act, 2023) की धारा 9 (बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण हेतु माता-पिता की सहमति की अनिवार्यता)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (बच्चों के गरिमापूर्ण जीवन, निजता और सुरक्षा का मौलिक अधिकार)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • मोहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष (1903, प्रिवी काउंसिल) — ‘अवयस्क (Minor) द्वारा किया गया कोई भी अनुबंध पूर्णतः शून्य (Void ab initio) होता है; अवयस्क के विरुद्ध संविदात्मक दायित्व लागू नहीं किया जा सकता।’
    • के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत एक बुनियादी मौलिक अधिकार है, जिसमें बच्चों के डिजिटल अधिकारों और डेटा का संरक्षण भी शामिल है।’
    • श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मध्यवर्तियों की जवाबदेही और राज्य द्वारा निर्धारित उचित प्रतिबंधों की संवैधानिकता।’
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
  • अंतिम निर्देश: केंद्र सरकार को आईटी नियमों के तहत बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर माता-पिता की अनिवार्य सहमति और आयु सत्यापन के विधिक प्रावधान तैयार करने का निर्देश; अदालत ने सेफ-हार्बर वापसी की चेतावनी देकर सरकार के रुख पर जल्द विस्तृत योजना प्रस्तुत करने को कहा.

Social Media: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठCJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
याचिकाकर्ताजस्टिस राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस (Just Rights for Children Alliance)
मुख्य चिंता12 से 15 साल के बच्चों द्वारा बिना माता-पिता की सहमति के सोशल मीडिया अकाउंट बनाना।
सरकार का रुखसॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने आश्वासन दिया कि सरकार IT नियमों के तहत आवश्यक निर्देश जारी करने के लिए तैयार है।
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