Friday, November 6, 2026
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Student Protest: संस्कृत यूनिवर्सिटी के निलंबित छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति रद्द; राजनीतिक दलों की महत्वाकांक्षा छात्रों की शिक्षा के अधिकार को बंधक नहीं बना सकती

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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी घटनाक्रम

  1. अगस्त 2026 का विरोध प्रदर्शन और प्राथमिकी:13 अगस्त 2026 को सिंडिकेट बैठक के दौरान छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर में बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर प्रदर्शन किया था। आरोप है कि छात्रों ने कुलपति सीज़ा थॉमस का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया और कार्यालय से बाहर निकलते समय उनके साथ हाथापाई व बाधा उत्पन्न की। इस पर कालडी पुलिस स्टेशन में दो अलग-अलग प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गईं।
  2. छात्रों का निलंबन और एकल पीठ का आदेश:1 सितंबर को विश्वविद्यालय ने 16 छात्रों को निलंबित कर दिया। 30 अक्टूबर को एकल पीठ ने राहत देते हुए छात्रों को 4 नवंबर की परीक्षाओं में अनंतिम रूप से (Provisionally) बैठने की अनुमति दे दी थी, जिसे विश्वविद्यालय ने अपील में चुनौती दी।
  3. विश्वविद्यालय के तर्क जिन्हें खंडपीठ ने स्वीकार किया:
    • परीक्षा पंजीकरण की अंतिम तिथि 23 अक्टूबर को ही समाप्त हो चुकी थी।
    • 6 छात्र पीएचडी (Doctoral Research) के हैं, जिन पर यह परीक्षा अधिसूचना लागू नहीं होती।
    • शेष छात्र 80% अनिवार्य उपस्थिति (Mandatory Attendance) और आंतरिक मूल्यांकन (Internal Assessment) की शर्त पूरी नहीं करते।

संवैधानिक मर्यादा और डॉ. आंबेडकर का कथन

हाईकोर्ट ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में डॉ. बी. आर. आंबेडकर द्वारा दिए गए ऐतिहासिक भाषण के अंशों को उद्धृत किया:“यदि हम न केवल रूप में, बल्कि वास्तव में लोकतंत्र को बनाए रखना चाहते हैं, तो हमें अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों को मजबूती से पकड़े रखना होगा। इसका अर्थ है कि हमें क्रांति के खूनी तरीकों को छोड़ना होगा। इसका अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह के तरीकों का त्याग करना होगा।”

मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष

1. अकादमिक संस्थाओं में अनुशासन:

यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि शैक्षणिक संस्थानों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अन्य छात्रों के शांतिपूर्ण अध्ययन के मौलिक अधिकार का हनन नहीं कर सकता।

2. प्रक्रियात्मक सख्ती:

विश्वविद्यालय के परीक्षा नियमों, उपस्थिति की शर्तों और अनुशासनात्मक कार्यवाहियों में अदालतें बिना ठोस कानूनी आधार के हस्तक्षेप नहीं करेंगी।

कोच्चि: भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं), अनुच्छेद 21 व 21A (सभ्य छात्रों के निर्बाध शिक्षा प्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार), विश्वविद्यालय परिनियमावली (University Statutes) के तहत कुलपति एवं शैक्षणिक सिंडिकेट का अनुशासनात्मक क्षेत्राधिकार, संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा 25 नवंबर 1949 को दिए गए ऐतिहासिक भाषण (संवैधानिक लोकतंत्र में ‘सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह’ के त्याग का आह्वान), तथा केरल उच्च न्यायालय की खंडपीठ के पूर्ववर्ती ऐतिहासिक फैसले डॉ. एंटनी थॉमस बनाम वी.एम. मुहम्मद रफीक व अन्य [2017] के विधिक सिद्धांतों के तहत केरल उच्च न्यायालय ने शैक्षणिक अनुशासन पर एक अत्यंत सख्त फैसला सुनाया है।

केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन (Justice Anil K. Narendran) और न्यायमूर्ति मुरली कृष्णा एस. (Justice Muralee Krishna S) की खंडपीठ ने एकल पीठ के 30 अक्टूबर के उस अंतरिम आदेश को रद्द (Set Aside) कर दिया, जिसने कलाडी स्थित श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय (Sree Sankaracharya University of Sanskrit, Kalady) के 16 निलंबित छात्रों को 4 नवंबर 2026 से शुरू होने वाली विश्वविद्यालय परीक्षाओं में बैठने की अनंतिम (Provisional) अनुमति दी थी।

विश्वविद्यालय द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने दोहराया कि शैक्षणिक संस्थान राजनीति करने का अखाड़ा नहीं हैं। किसी भी राजनीतिक दल या छात्र संगठन को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते शिक्षण संस्थानों के कामकाज को ठप करे या अन्य छात्रों के शिक्षा प्राप्त करने के मौलिक अधिकार को बंधक बनाए। अदालत ने कुलपति प्रो. सीज़ा थॉमस (VC Ciza Thomas) के प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार (Symbolic Funeral), उनका रास्ता रोकने और उनके साथ धक्का-मुक्की/हमले के गंभीर आरोपों के मद्देनजर छात्रों को अंतरिम राहत देने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह का शैक्षणिक संस्थानों में कोई स्थान नहीं’:

न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन और न्यायमूर्ति मुरली कृष्णा एस. की खंडपीठ ने खंडपीठ के 2017 के ऐतिहासिक फैसले (Dr. Antony Thomas case) को उद्धृत करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट दर्ज किया: “हम यह स्पष्ट रूप से दोहराना चाहते हैं कि धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों का एक संवैधानिक लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है, शैक्षणिक संस्थानों में तो बिल्कुल भी नहीं। जो कोई भी किसी शैक्षणिक संस्थान में ऐसी गतिविधियों में संलिप्त होता है, वह स्वयं को निष्कासित (Expelled) या रस्टिकेट (Rusticated) किए जाने का कानूनी रूप से पात्र बनाता है। शैक्षणिक संस्थान शिक्षा प्रदान करने के लिए होते हैं, न कि राजनीति करने के लिए। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते, राजनीतिक दल किसी भी शैक्षणिक संस्थान को या सभ्य छात्रों के शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार को बंधक (Hold to ransom the right of civilized students to receive education) नहीं बना सकते।”

2. डॉ. बी.आर. आंबेडकर का ऐतिहासिक संविधान सभा भाषण उद्धृत:

  • खंडपीठ ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में भारत का संविधान प्रस्तुत करते हुए संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा दिए गए अंतिम भाषण को रेखांकित किया:“यदि हम लोकतंत्र को केवल रूप में ही नहीं, बल्कि वास्तव में बनाए रखना चाहते हैं, तो हमें क्या करना चाहिए? मेरी दृष्टि में पहली बात जो हमें करनी चाहिए, वह यह है कि अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों (Constitutional Methods) को दृढ़ता से पकड़े रहें।इसका सीधा अर्थ यह है कि हमें क्रांति के खूनी तरीकों को त्यागना होगा। इसका अर्थ यह है कि हमें सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience), असहयोग (Non-cooperation) और सत्याग्रह (Satyagraha) के तरीकों को पूरी तरह त्यागना होगा। जब संवैधानिक उपचार उपलब्ध हों, तो इन असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं रह जाता।”

3. परीक्षा नियमों, उपस्थिति और पंजीकरण की वैधानिक अनिवार्यताओं की अनदेखी:

  • खंडपीठ ने एकल पीठ के अंतरिम आदेश को प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण पाते हुए कहा कि अदालतें विश्वविद्यालय के अनिवार्य परीक्षा विनियमों को केवल ‘सहानुभूति’ के आधार पर दरकिनार नहीं कर सकतीं।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अगस्त – नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयकेरल उच्च न्यायालय, एर्नाकुलम (अपीलीय खंडपीठ क्षेत्राधिकार)
पीठन्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन (Justice Anil K Narendran) एवं न्यायमूर्ति मुरली कृष्णा एस. (Justice Muralee Krishna S)
निर्णय की तिथि3 नवंबर 2026 (परीक्षाएं 4 नवंबर 2026 से प्रस्तावित थीं)
केस संदर्भश्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय बनाम अर्चना पी.एस. व अन्य [W.A. No. … / 2026 — Arising out of W.P.(C)]
अपीलकर्ताश्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय (Sree Sankaracharya University of Sanskrit, Kalady) — कुलपति एवं कुलसचिव।
प्रतिवादी पक्षअर्चना पी.एस. व 15 अन्य छात्र (Archana PS & 15 Ors.) — संस्कृत यूनिवर्सिटी के विभिन्न संकायों के निलंबित छात्र।
घटना का मूल संदर्भ (13 अगस्त 2026)विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ब्लॉक में जब सर्वोच्च शासी निकाय (Syndicate) की औपचारिक बैठक चल रही थी, तब आरोपी छात्रों ने कुलपति प्रो. सीज़ा थॉमस के विरुद्ध उग्र विरोध प्रदर्शन शुरू किया। छात्रों ने कथित तौर पर वीसी का “प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार” (Symbolic Funeral) निकाला, शवयात्रा के रूप में नारेबाजी की और बैठक के बाद जब कुलपति अपने कार्यालय से बाहर निकल रही थीं, तो उनका रास्ता रोका, उन्हें बंधक बनाने का प्रयास किया और उनके साथ धक्का-मुक्की व मारपीट की।
आपराधिक व प्रशासनिक कार्रवाई• घटना के संबंध में कलाडी पुलिस स्टेशन (Kalady Police Station) में दो अलग-अलग आपराधिक प्राथमिकियां (FIRs) दर्ज की गईं।
• विश्वविद्यालय ने कड़ा संज्ञान लेते हुए 1 सितंबर 2026 को सभी 16 छात्रों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर अनुशासनात्मक जांच समिति गठित कर दी।
छात्रों की ओर से प्रस्तुत दलीलेंछात्रों ने एकल पीठ के समक्ष तर्क दिया कि:
1. उन्होंने कोई प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार नहीं किया था; वे केवल कैंपस में पीने के पानी और बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे।
2. जांच समिति द्वारा 29-30 सितंबर को सुनवाई पूरी किए जाने के बावजूद सिंडिकेट ने अभी तक अंतिम फैसला नहीं लिया है। निरंतर निलंबन से उनकी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है और 4 नवंबर से परीक्षाएं शुरू हो रही हैं।
एकल पीठ का आदेश (30 अक्टूबर 2026)एकल पीठ ने छात्रों के शैक्षणिक वर्ष को बचाने की दृष्टि से उन्हें 4 नवंबर 2026 से आयोजित होने वाली परीक्षाओं में अनंतिम रूप से शामिल होने की अनुमति दे दी थी।
विश्वविद्यालय की खंडपीठ के समक्ष आपत्तियां1. पंजीकरण की समय-सीमा: परीक्षा पंजीकरण की अंतिम तिथि 23 अक्टूबर 2026 को ही समाप्त हो चुकी थी; छात्रों ने समय पर आवेदन नहीं किया।
2. पीएचडी शोधार्थी: 16 में से 6 छात्र डॉक्टरेट/पीएचडी (PhD) के शोधार्थी हैं, जो इस परीक्षा अधिसूचना के दायरे में आते ही नहीं हैं।
3. उपस्थिति की कमी (Shortage of Attendance): शेष स्नातक/परास्नातक छात्र परीक्षा में बैठने हेतु विश्वविद्यालय परिनियमों के तहत अनिवार्य 80% न्यूनतम उपस्थिति और आंतरिक मूल्यांकन (Internal Assessment) के मानकों को पूरा नहीं करते हैं।
डिवीजन बेंच का अंतिम निर्णयअपील स्वीकार (Allowed); एकल पीठ का अंतरिम आदेश निरस्त; छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति देने से इनकार। (स्पष्ट किया गया कि ये टिप्पणियां केवल अपील के निस्तारण तक सीमित हैं और एकल पीठ के समक्ष लंबित मुख्य याचिका के अंतिम गुण-दोष को प्रभावित नहीं करेंगी)।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 19(1)(a) की सीमाएं, छात्र राजनीति और कैंपस अनुशासन’

  • ‘डॉ. एंटनी थॉमस बनाम वी.एम. मुहम्मद रफीक’ (2017) का न्यायिक अधिदेश:
    • केरल उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने पूर्व में सुस्थापित किया था कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी भी छात्र या राजनीतिक दल को यह छूट नहीं देता कि वह किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कामकाज को जबरन ठप कर दे।
    • शैक्षणिक परिसर ज्ञान अर्जन के पवित्र स्थान हैं। कक्षाओं का बहिष्कार करना, शिक्षकों या कुलपति का घेराव करना, या ‘प्रतीकात्मक शवयात्रा’ निकालना शांतिपूर्ण असहमति की सीमा से बाहर जाकर संस्थागत हिंसा और घोर अनुशासनहीनता का रूप ले लेता है।
  • संवैधानिक लोकतंत्र और विरोध के तौर-तरीके (The Grammar of Anarchy):
    • बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान सभा में अपने विख्यात भाषण में सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध तो उचित ठहराया था, किंतु यह स्पष्ट चेतावनी दी थी कि एक बार जब देश में विधि का शासन और लोकतांत्रिक संविधान स्थापित हो जाए, तो ये तौर-तरीके केवल ‘अराजकता का व्याकरण’ (Grammar of Anarchy) बनकर रह जाते हैं।
    • उच्च न्यायालय ने इस संवैधानिक सिद्धांत को लागू करते हुए रेखांकित किया कि शैक्षणिक परिसरों में प्रशासनिक विवादों या सुविधाओं के अभाव को सुलझाने के लिए विश्वविद्यालय ट्रिब्यूनल, छात्र शिकायत निवारण समितियां और उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार जैसे वैधानिक मंच उपलब्ध हैं; उनके स्थान पर हिंसक और अपमानजनक प्रदर्शनों का सहारा लेना विधि विरुद्ध है।
  • अनुपस्थिति और परीक्षा में बैठने का सांविधिक अधिकार:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीएसई बनाम पी. सुनील कुमार [(1998) 5 SCC 377] और महात्मा गांधी विश्वविद्यालय बनाम जिशान पी. इस्माइल में यह दोहराया है कि अदालतें अपनी असाधारण रिट शक्तियों का प्रयोग करके उन छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दे सकतीं जो वैधानिक उपस्थिति नियमों (80% न्यूनतम उपस्थिति) या परीक्षा शुल्क/पंजीकरण की समय-सीमा को पूरा नहीं करते।
    • केवल “छात्र का एक साल बर्बाद हो जाएगा” जैसी भावुक दलीलें सांविधिक विनियमों को निष्प्रभावी नहीं कर सकतीं।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • न्यायालय: केरल उच्च न्यायालय, एर्नाकुलम (अपीलीय खंडपीठ क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय बनाम अर्चना पी.एस. व अन्य [Writ Appeal No. … / 2026 — Arising out of WP(C) No. … / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन (Justice Anil K Narendran) एवं न्यायमूर्ति मुरली कृष्णा एस. (Justice Muralee Krishna S)
  • निर्णय की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: विश्वविद्यालय की रिट अपील स्वीकार; एकल पीठ का 30 अक्टूबर 2026 का अंतरिम राहत आदेश अपास्त/रद्द (Set Aside)।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • अपीलकर्ता (विश्वविद्यालय) की ओर से: विश्वविद्यालय की स्थायी विधिक परामर्शदाता अधिवक्ता शिल्पा श्रीकृष्णन (Advocate Silpa Sreekumar)।
  • प्रतिवादी (निलंबित छात्रों) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता टी.ए. शाजी (Senior Advocate TA Shaji), साथ में अधिवक्ता पी.जी. प्रमोद (Advocate PG Pramod) एवं अधिवक्ता नादिया के.एम. (Advocate Nadiya KM)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(2) (युक्तियुक्त निर्बंधन), अनुच्छेद 21 व 21A (शिक्षा का अधिकार) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
    • श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम, 1993 (Sree Sankaracharya University of Sanskrit Act, 1993) एवं तदधीन निर्मित विश्वविद्यालय परिनियमावली (University Statutes & Regulations) — परीक्षा पात्रता, उपस्थिति एवं अनुशासनात्मक शक्तियां
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) / IPC — लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकना, सदोष अवरोध व हमला (कलाडी थाने में दर्ज 2 FIR)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन, विरोध की सीमाएं और परीक्षा पात्रता का विधिक मानक: ‘संवैधानिक लोकतंत्र के अंतर्गत स्थापित शैक्षणिक संस्थानों में धरना, भूख हड़ताल, सत्याग्रह या प्रशासनिक प्रमुखों के अपमानजनक प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार जैसी गतिविधियों का कोई विधिक औचित्य नहीं है; राजनीतिक दलों की महत्वाकांक्षाओं को शैक्षणिक परिसरों की शांति और अन्य छात्रों के अध्ययन के मौलिक अधिकार को बंधक बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती; शैक्षणिक अनुशासन का उल्लंघन करने वाले छात्र निष्कासन और निलंबन के भागीदार हैं; तथा अदालतें अंतरिम आदेशों के जरिए विश्वविद्यालय के अनिवार्य उपस्थिति नियमों (80% उपस्थिति) और परीक्षा पंजीकरण की समय-सीमा को दरकिनार कर ऐसे अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना कर रहे छात्रों को अनंतिम रूप से परीक्षा में बैठने का निर्देश नहीं दे सकतीं।’
  • वर्तमान स्थिति व तात्कालिक प्रभाव: खंडपीठ के आदेश के बाद सभी 16 निलंबित छात्र 4 नवंबर 2026 से आयोजित होने वाली परीक्षाओं में बैठने से वंचित रहेंगे; विश्वविद्यालय की सिंडिकेट अनुशासनात्मक जांच रिपोर्ट में सुधार कर अंतिम दंडात्मक आदेश पारित करने हेतु स्वतंत्र है, जबकि एकल पीठ के समक्ष छात्रों की मुख्य रिट याचिका अपने नियमित गुण-दोष के आधार पर जारी रहेगी।

Student Protest:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
पीठन्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन एवं न्यायमूर्ति मुरली कृष्णा एस.
मामला/साइटेशनSree Sankaracharya University of Sanskrit v Archana PS & Ors.
विश्वविद्यालयश्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, कालडी (केरल)
प्रतिनिधित्वविश्वविद्यालय: अधिवक्ता शिल्पा श्रीकुमार | छात्र: वरिष्ठ अधिवक्ता टी. ए. शाजी
घटना का मूल13 अगस्त 2026 को कुलपति (Ciza Thomas) का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने, उन्हें रोकने और मारपीट करने के आरोपी 16 छात्र निलंबित।
अदालत का फैसलाएकल पीठ का आदेश रद्द: 16 निलंबित छात्रों को 4 नवंबर 2026 से शुरू हो रही विश्वविद्यालय परीक्षाओं में बैठने की अंतरिम अनुमति खारिज।
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