Sexual Offences Report: बॉम्बे हाई कोर्ट ने भारत जैसे पारंपरिक और रूढ़िवादी समाज में महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों (Sexual Offences) को लेकर एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
हाईकोर्ट के जस्टिस रंजित सिन्हा राजा भोंसले की एकल पीठ ने मुंबई के एक निवासी के खिलाफ घरेलू सहायिका (Domestic Worker) से छेड़छाड़ के मामले में दर्ज आपराधिक केस को रद्द करने से इनकार करते हुए यह व्यवस्था दी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल एफआईआर (F.I.R.) दर्ज कराने में हुई कुछ दिनों की देरी के आधार पर यौन उत्पीड़न के मामलों को शुरुआती स्तर पर ही खारिज (Quash) नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे अपराधों से सामाजिक कलंक (Social Stigma) जुड़ा होता है, जिसके डर से परिवार तुरंत पुलिस के पास जाने से हिचकिचाते हैं।
मामला क्या था? (नौकरी का पहला महीना, छेड़छाड़ और 21 दिन की देरी)
यह कानूनी विवाद एक घरेलू सहायिका द्वारा अपने नियोक्ता (Employer) के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है।
घटना की पृष्ठभूमि: शिकायतकर्ता महिला को फरवरी 2019 में नंदकुमार पणीकर (याचिकाकर्ता) के घर पर 5000 रुपये प्रति माह के वेतन पर खाना बनाने के लिए रखा गया था। महिला ने 1 मार्च 2019 से काम शुरू किया।
छेड़छाड़ का आरोप: एफआईआर के अनुसार, 10 मार्च 2019 को पणीकर ने कथित तौर पर महिला को गलत तरीके से छुआ और उसके साथ छेड़छाड़ (Molestation) की, जिसके बाद वह डरकर फ्लैट से बाहर भाग गई।
देरी की वजह: महिला सामाजिक डर और इस चिंता में शुरू में चुप रही कि कहीं उसका पति परेशान न हो जाए। हालांकि, उसी दिन बाद में उसने अपने पति को पूरी बात बताई। अंततः गहन विचार-विमर्श के बाद 2 अप्रैल 2019 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई (यानी घटना के 21 दिन बाद)।
आरोपी का बचाव: आरोपी नंदकुमार पणीकर ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आईपीसी की धारा 354 (महिला की शालीनता भंग करना) के तहत दर्ज इस केस को रद्द करने की मांग की। उसकी मुख्य दलील थी कि 21 दिन की देरी यह दर्शाती है कि यह शिकायत दुर्भावनापूर्ण और बाद में सोच-समझकर (Afterthought) रची गई है। उसने सीसीटीवी फुटेज और काम से निकालने के बाद जबरन पैसे वसूलने की धमकी का भी हवाला दिया।
हाई कोर्ट का मानवीय दृष्टिकोण: ‘देरी के पीछे सामाजिक डर को समझना होगा’
जस्टिस भोंसले ने आरोपी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि सीसीटीवी फुटेज या जांच की कमियां ऐसे तथ्य हैं जिनकी जांच ट्रायल (अदालती सुनवाई) के दौरान होगी, इनके आधार पर केस को शुरुआत में ही खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने भारतीय समाज के ताने-बाने पर बात करते हुए कहा:
परिस्थितियों के अनुसार मूल्यांकन
“यौन अपराधों या आईपीसी की धारा 498A (वैवाहिक क्रूरता) जैसे संवेदनशील मामलों में, एफआईआर में हुई देरी को उन परिस्थितियों और सामाजिक परिवेश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिसमें अपराध हुआ है। हमारे जैसे पारंपरिक समाज में, दुर्भाग्य से कई परिवारों के लिए ऐसे अपराधों के सामने आने पर एक वास्तविक आपराधिक मुकदमा शुरू करना भी अत्यधिक और बेहद कठिन होता है।
दुर्भावना साबित होना जरूरी: कोर्ट ने साफ किया कि जब तक यह साबित न हो जाए कि देरी किसी दुर्भावना, साजिश या बदला लेने (Malicious Intent or Vendetta) के उद्देश्य से की गई है, तब तक केवल लेचलतीफी के आधार पर पीड़ित महिला के मामले को कचरे के डिब्बे में नहीं फेंका जा सकता।
विश्लेषण: आपराधिक मामलों में ‘देरी’ (Delay in FIR) का कानूनी महत्व
आमतौर पर दीवानी (Civil) या सामान्य आपराधिक मामलों में देरी को संदेहास्पद माना जाता है, लेकिन महिलाओं से जुड़े अपराधों में अदालतें ‘सहानुभूतिपूर्ण और व्यावहारिक’ दृष्टिकोण अपनाती हैं।
| कानूनी मानदंड | बॉम्बे हाई कोर्ट की व्याख्या और वैधानिक स्थिति |
| आईपीसी धारा 354 (IPC 354) | महिला की लज्जा भंग करने या जबरन छूने के प्रयास से जुड़ा अपराध, जिसमें प्रथम दृष्टया (Prima Facie) केस बनता हुआ दिखाई दे रहा है। |
| प्रारंभिक चरण में केस रद्द करना (Quashing) | हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की शक्तियों के तहत किसी भी गंभीर केस को तकनीकी आधार (जैसे २१ दिन की देरी) पर ट्रायल से पहले ही खत्म करना न्यायसंगत नहीं है। |
| सामाजिक कलंक (Social Stigma) | अदालत ने माना कि पीड़िता का लोक-लाज, परिवार के टूटने का डर और समाज के तानों के कारण शुरू में चुप रहना एक स्वाभाविक मानवीय व्यवहार है। |
अंतिम निष्कर्ष
बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना कि एफआईआर में दर्ज घटनाक्रम पहली नजर में आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त है। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए पीड़ित महिला के पक्ष में खड़े होने और समाज की जमीनी हकीकत को स्वीकार करने का एक सराहनीय संदेश दिया है।

