Temple Fund Misappropriation Case: मद्रास हाईकोर्ट ने कहा, किसी भी आपराधिक या भ्रष्टाचार के मामले में केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को मुकदमे की लंबी और दमनकारी प्रक्रिया में नहीं धकेला जा सकता।
मुख्य आरोपी को लेकर Temple Fund Misappropriation केस में की गई टिप्पणी
हाईकोर्ट जस्टिस जी.के. इलानथिरइयन की एकल पीठ ने कहा, यदि जांच एजेंसी के पास आरोपियों के खिलाफ कोई पुख्ता मौखिक या दस्तावेजी सबूत नहीं हैं, तो ट्रायल जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of process of law) होगा। अदालत ने हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग के तीन कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साल 2004 से 2006 के बीच एक प्रसिद्ध मंदिर के उत्सव फंड में फर्जी बिलों के जरिए हेराफेरी करने के आरोपों का सामना कर रहे तीन जनसेवकों के खिलाफ चल रहे मुकदमों को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया।
मामला क्या है?: 20 साल पुराना कथित मंदिर घोटाला
यह पूरा विधिक विवाद कन्याकुमारी जिले के शुचिन्द्रम (Suchindram) में स्थित मंदिर के फंड के दुरुपयोग से जुड़ा है।
क्या थे आरोप?: अभियोजन पक्ष का आरोप था कि शुचिन्द्रम में HR&CE विभाग के तत्कालीन उपायुक्त/कार्यकारी अधिकारी (AO-1) ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर साल 2004 और 2006 के बीच मंदिर के उत्सवों (Thiruvizha) और दैनिक अनुष्ठानों (Paditharam) के खर्चों के लिए जाली और फर्जी बिल तैयार किए। इन फर्जी बिलों के आधार पर चेक जारी किए गए, काउंटर-साइन हुए और उन्हें कैश कराकर आपस में बांट लिया गया।
कर्मचारियों को बनाया गया आरोपी: इस मामले में विभाग के कर्मचारी एस. रमेशकुमार, एन. कुट्टलम और ए. मोहना कुमार को आरोपी नंबर 5, 8 और 12 बनाया गया था। इन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के साथ-साथ आईपीसी की धारा 409 (विश्वासघात), 465 (जालसाजी), 468, 471, 477A (खातों में हेराफेरी) और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
निचली अदालत में चुनौती: आरोपियों ने नागरकोइल (Nagercoil) के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) कोर्ट में लंबित इस ट्रायल को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट का रुख: मुख्य आरोपी की करतूतों की सजा सबको नहीं मिल सकती
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हसन मोहम्मद जिन्ना ने दलील दी कि पूरा मामला मुख्य आरोपी (आरोपी नंबर 1) के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसने सारे दस्तावेज और बिल तैयार किए थे। कुछ कर्मचारियों को तो डरा-धमका कर बिलों पर हस्ताक्षर कराए गए थे, जबकि कैशियर ने केवल उच्चाधिकारियों के निर्देश पर चेक को भुनाकर राशि सौंपी थी।
हाई कोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा के बाद इन तर्कों को सही पाया: याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं: कोर्ट ने गवाहों के बयानों को देखते हुए नोट किया कि वे सभी सीधे तौर पर पहले आरोपी (AO-1) की तरफ इशारा करते हैं। जिन दुकानदारों के नाम पर फर्जी बिल बने थे, उन्होंने भी गवाही दी कि ये बिल उनके नहीं थे, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में इन तीन याचिकाकर्ताओं की कोई विशिष्ट या सक्रिय भूमिका (Specific role) सामने नहीं आई।
सकारण विधिक टिप्पणी: जस्टिस इलानथिरइयन ने कहा, आरोपों को साबित करने के लिए याचिकाकर्ताओं के खिलाफ बिल्कुल भी मौखिक या दस्तावेजी सबूत मौजूद नहीं हैं। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अदालती कार्यवाही को जारी रखना दुर्भावनापूर्ण होगा और उन्हें मुकदमे की कठोरता से गुजरने के लिए मजबूर करना कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान होगा।
बाकी आरोपियों पर चलता रहेगा केस: हाई कोर्ट ने साफ किया कि यद्यपि इन तीन कर्मचारियों के खिलाफ मामला रद्द किया जा रहा है, लेकिन निचली अदालत बाकी बचे मुख्य आरोपियों के खिलाफ कानून के अनुसार ट्रायल को आगे बढ़ाने और समय पर पूरा करने के लिए स्वतंत्र है।
केस मैट्रिक्स: मद्रास हाई कोर्ट का फैसला (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | मद्रास उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (२०२६) |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (चेन्नई पीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जी.के. इलानथिरइयन (एकल पीठ) |
| याचिकाकर्ताओं के विधिक वकील | वरिष्ठ अधिवक्ता हसन मोहम्मद जिन्ना |
| आरोपों की अवधि और स्थान | वर्ष 2004-2006, शुचिन्द्रम मंदिर (तमिलनाडु) |
| मुख्य कानूनी धाराएं | भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं आईपीसी (धारा 409, 465, 468, 471, 477A, 120B) |
| अदालत का अंतिम आदेश | तीन कर्मचारियों के खिलाफ चल रहा क्रिमिनल केस पूरी तरह रद्द (Quashed)। |

