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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- जस्टिस अजय भानोट की अदालत में हुई घटना का विरोध:27 अक्टूबर 2026 को जस्टिस अजय भानोट की अदालत में वकीलों के लिए आरक्षित सीट पर पुलिस अधिकारी (SP) के बैठने पर आपत्ति जताने वाले एक अधिवक्ता से माफी मंगवाए जाने के आरोप लगे थे। इसके विरोध में इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने कोर्ट के बहिष्कार का आह्वान किया था।
- 28 अक्टूबर को उग्र हिंसक प्रदर्शन:28 अक्टूबर को वकीलों के एक समूह ने कोर्ट रूम नंबर 49 और आसपास के गलियारों में इकट्ठा होकर नारेबाजी शुरू कर दी। प्रदर्शनकारियों ने कोर्ट रूम के अंदर का फर्नीचर और अन्य सामान तोड़ दिया।
- न्यायमूर्ति देशवाल की पीठ द्वारा संज्ञान:जिस समय यह हंगामा हो रहा था, न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल एक जमानत याचिका (Devendra Kumar v State of UP) की सुनवाई कर रहे थे। शोर-शराबे के कारण अदालती काम पूरी तरह ठप्प हो गया, जिसके बाद जज ने इसे न्याय प्रशासन में बाधा माना।
हाईकोर्ट के मुख्य विधिक निर्देश और अवमानना प्रक्रिया
1. “वादकारियों के अधिकारों का हनन”:
हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि वकील किसी भी विवाद के नाम पर आम जनता और गरीब वादकारियों (Litigants) के न्याय पाने के अधिकार को बंधक नहीं बना सकते। अदालती परिसर में डर या धमकी का माहौल बनाना वकालत के पेशे की गरिमा के खिलाफ है।
2. यूपी बार काउंसिल और हाईकोर्ट का द्विमार्गी एक्शन:
न्यायमूर्ति देशवाल ने रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को तुरंत क्षेत्र के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज प्राप्त कर उन अधिवक्ताओं की पहचान करने का आदेश दिया जो नारेबाजी, तोड़-फोड़ और व्यवधान पैदा करने में शामिल थे। पहचान पूरी होने के बाद:
- मामला उत्तर प्रदेश बार काउंसिल (Bar Council of Uttar Pradesh) को भेजा जाएगा ताकि दोषी वकीलों की प्रैक्टिस और लाइसेंस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Proceedings) की जा सके।
- हाईकोर्ट स्वयं उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt Proceedings) की प्रक्रिया चलाएगा।
प्रयागराज (इलाहाबाद): भारत का संविधान के अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्च न्यायालय की अवमानना हेतु दंडित करने की अंतर्निहित शक्ति), अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—न्याय प्रशासन के कार्य में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप, अदालती कार्यवाही में बाधा व न्यायालय को भयभीत करना), अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 35 (अधिवक्ताओं द्वारा व्यावसायिक कदाचार पर राज्य बार काउंसिल द्वारा अनुशासनात्मक कार्यवाही), तथा शीर्ष अदालत द्वारा एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल मामले में तय हड़ताल व अदालती व्यवधान संबंधी विधिक मानकों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत कठोर आदेश पारित किया है।
न्यायमूर्ति अजय भनोट (Justice Ajay Bhanot) की अदालत (कोर्ट रूम नंबर 49) में कथित दुर्व्यवहार के विरोध में वकीलों द्वारा किए गए उग्र प्रदर्शन, फर्नीचर तोड़े जाने और गलियारों में नारेबाजी के बाद, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) की एकल पीठ ने मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए औपचारिक न्यायिक आदेश पारित किया।
न्यायमूर्ति देशवाल ने उस समय न्यायिक संज्ञान लिया जब वे एक नियमित ज़मानत याचिका (Bail Application) की सुनवाई कर रहे थे और बाहर गलियारे में हो रही तीव्र नारेबाजी और शोर-शराबे से उनकी न्यायिक कार्यवाही बाधित हो गई। अदालत ने रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को गलियारों व प्रभावित क्षेत्र के सीसीटीवी फुटेज (CCTV Footage) की जांच कर नारेबाजी और तोड़फोड़ में शामिल अधिवक्ताओं की पहचान करने का आदेश दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पहचान सुनिश्चित होने के बाद संबंधित वकीलों के नाम उत्तर प्रदेश बार काउंसिल (Bar Council of U.P.) को अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) हेतु भेजे जाएं और उनके विरुद्ध उच्च न्यायालय में आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt Proceedings) की प्रक्रिया शुरू की जाए। मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 को तय की गई है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘किसी एक कोर्ट से समस्या होने पर अन्य अदालतों को डराने और बाधित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती’
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने अदालत कक्ष के बाहर गलियारों में हो रहे व्यवधान को सीधे आदेश में दर्ज करते हुए तल्ख टिप्पणी की: “ऐसी घटना सीधे तौर पर अदालती कार्यवाही में सीधा हस्तक्षेप (Interference in Court proceedings) है। दूर-दराज से गरीब वादकारी (Poor Litigants) अपनी व्यथा और शिकायतों के निवारण के लिए उच्च न्यायालय आते हैं। केवल इसलिए कि कुछ अधिवक्ताओं को किसी एक विशिष्ट अदालत (Particular Court) से कोई समस्या या शिकायत है, उन्हें गलियारों में नारेबाजी करने, चिल्लाने, अन्य अदालतों की न्यायिक कार्यवाही को बाधित करने और ऐसे शब्दों का प्रयोग करने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती जो अदालत को भयभीत/धमकाने (Intimidate the Court) की प्रकृति के हों। यह पूरी तरह से अनुचित और अस्वीकार्य है।”
2. ‘आचरण पूर्णतः अवमाननाजनक; सीसीटीवी से वकीलों की पहचान हो’:
- पीठ ने स्पष्ट किया कि गलियारे में वकीलों द्वारा न्यायिक कार्यवाही को ठप करने की कोशिश पूरी तरह से आपराधिक अवमानना (Absolutely Contemptuous) की श्रेणी में आती है।
- अदालत ने आदेश दिया:“रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) अदालत कक्ष के बाहर गलियारे के संबंधित क्षेत्र के सीसीटीवी फुटेज (CCTV Footage) की तत्काल जांच करें और नारेबाजी, हंगामे तथा व्यवधान में शामिल अधिवक्ताओं की औपचारिक पहचान करें।”
3. बार काउंसिल ऑफ यूपी और अवमानना का दोहरा शिकंजा:
- अदालत ने प्रक्रियात्मक रूप से स्पष्ट किया कि पहचान के बाद किसी भी दोषी वकील को बख्शा नहीं जाएगा:“अधिवक्ताओं की पहचान सुनिश्चित होने के उपरांत, इस मामले को उत्तर प्रदेश बार काउंसिल (Bar Council of U.P.) को उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) शुरू करने हेतु भेजा जाए, साथ ही उनके विरुद्ध इस न्यायालय द्वारा अवमानना कार्यवाही (Contempt Proceedings) भी प्रारंभ की जाए।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (27–28 अक्टूबर 2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं अदालती निर्देश |
| मूल संदर्भ मामला | देवेंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [आपराधिक ज़मानत आवेदन – Criminal Misc. Bail Application]. |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (एकल पीठ). |
| घटना का स्थान | इलाहाबाद उच्च न्यायालय — कोर्ट रूम नंबर 49 (जस्टिस अजय भनोट का कक्ष) तथा उससे जुड़े गलियारे (Corridors). |
| हंगामे का प्राथमिक कारण | इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA) के अनुसार, 27 अक्टूबर को जस्टिस भनोट ने एक वकील को वकीलों की पंक्ति में बैठे पुलिस अधीक्षक (SP) से पीछे जाने का अनुरोध करने पर जेल भेजने की चेतावनी दी थी और कथित तौर पर एसपी से माफी मांगने पर विवश किया था. |
| 28 अक्टूबर की हिंसा व तोड़फोड़ | वकीलों ने कोर्ट रूम 49 में पहुंचकर डायस की ओर फर्नीचर फेंका और गलियारों में अन्य अदालतों के बाहर तीव्र नारेबाजी की, जिससे अन्य पीठों की सुनवाई बाधित हुई. |
| न्यायमूर्ति देशवाल का न्यायिक निर्देश | 1. रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित कर उपद्रवी वकीलों की पहचान करेंगे. 2. वकीलों के नाम बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु प्रेषित किए जाएंगे. 3. उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः आपराधिक अवमानना कार्यवाही प्रारंभ की जाएगी. |
| आगामी सुनवाई की तिथि | 19 नवंबर 2026 (अनुपालन रिपोर्ट व पहचान रिपोर्ट की समीक्षा). |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘न्यायिक स्वतंत्रता, बार काउंसिल की भूमिका और अनुच्छेद 215’
- ‘अदालतों को भयभीत करने’ (Intimidating the Court) की विधिक गंभीरता:
- आपराधिक अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के तहत न्याय प्रशासन की सामान्य प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न करना या न्यायिक अधिकारियों को दबाव में लेने का प्रयास करना सबसे गंभीर स्तर की अवमानना है.
- न्यायमूर्ति देशवाल ने अपने आदेश में विशेष रूप से रेखांकित किया कि भले ही वकीलों का विवाद किसी एक पीठ से हो, किंतु उच्च न्यायालय के गलियारों में शक्ति प्रदर्शन कर अन्य पीठों के कामकाज को ठप करना समूची न्यायिक व्यवस्था को बंधक बनाने (Holding the Courts to Ransom) जैसा है.
- अनुच्छेद 21 और गरीब वादकारियों के अधिकार:
- उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि उच्च न्यायालय वादकारियों के लिए है, जो दूर-दराज के जिलों से ज़मानत, रिहाई और मौलिक अधिकारों के संरक्षण की उम्मीद लेकर आते हैं.
- वकीलों के आंतरिक विवाद के कारण अदालतों को बंद कराना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के ‘त्वरित न्याय पाने के अधिकार’ पर सीधा आघात है.
- बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश का सांविधिक दायित्व:
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 के तहत राज्य बार काउंसिल को यह सांविधिक अधिकार और कर्तव्य प्राप्त है कि यदि कोई अधिवक्ता अदालत की मर्यादा भंग करने या हिंसक गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है, तो उसकी अनुशासनात्मक समिति (Disciplinary Committee) संबंधित वकील के खिलाफ कदाचार की जांच करे और उसका वकालत का लाइसेंस निलंबित या रद्द कर सकती है.
- इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय ने आर.के. आनंद बनाम दिल्ली उच्च न्यायालय [(2009) 8 SCC 106] में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि उच्च न्यायालय अपने परिसर की शुचिता की रक्षा के लिए अनुच्छेद 215 के तहत अवमानना के दोषी वकीलों को कोर्ट परिसर में प्रवेश करने और वकालत करने से खुद भी प्रतिबंधित (Debar) कर सकता है.
विधिक विवरण एवं संबद्ध प्रावधान
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (मूल आपराधिक न्यायपीठ)
- केस संदर्भ: देवेंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [Criminal Misc. Bail Application / इलाहाबाद हाईकोर्ट]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
- आगामी निर्णायक सुनवाई: 19 नवंबर 2026
प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना हेतु दंड देने की अंतर्निहित शक्ति) एवं अनुच्छेद 21 (वादकारियों के त्वरित न्याय का अधिकार)
- अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—अदालती कार्यवाही में बाधा डालना व न्याय प्रशासन को कलंकित/भयभीत करना) एवं धारा 12 व 14
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) — धारा 35 (व्यावसायिक या अन्य कदाचार के लिए अधिवक्ताओं के विरुद्ध दंडात्मक व अनुशासनात्मक कार्यवाही)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अदालती गरिमा और अधिवक्ताओं के आचरण का विधिक मानक: ‘अधिवक्ता अदालत के अधिकारी (Officers of the Court) हैं; किसी विशिष्ट न्यायाधीश के आचरण से असंतुष्ट होने पर भी वकीलों को उच्च न्यायालय के गलियारों में नारेबाजी करने, अदालत कक्षों में तोड़फोड़ करने या साथी न्यायाधीशों की कार्यवाही को बाधित करने का कोई विधिक या नैतिक अधिकार नहीं है; ऐसा कृत्य आपराधिक अवमानना है और संबंधित अधिवक्ताओं को बार काउंसिल द्वारा अनुशासनात्मक दंड और न्यायालय द्वारा अवमानना की दोहरी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना होगा.’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को कोर्ट परिसर और गलियारों के सीसीटीवी फुटेज एकत्र कर उपद्रवी वकीलों को चिह्नित करने का आदेश दिया गया है; 19 नवंबर 2026 को रिपोर्ट पेश होने के बाद बार काउंसिल ऑफ यूपी को औपचारिक संदर्भ भेजा जाएगा और आपराधिक अवमानना की औपचारिक चार्जशीट/नोटिस जारी किए जाएंगे.
Vandalise Courtroom: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court), प्रयागराज |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) |
| मामला/साइटेशन | देवेंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Devendra Kumar v State of UP) |
| मूल विवाद | जस्टिस अजय भानोट (कोर्ट रूम 49) की अदालत के बाहर वकीलों द्वारा उग्र प्रदर्शन, नारेबाजी और फर्नीचर तोड़े जाने के बाद अन्य अदालती कार्यवाहियों का बाधित होना। |
| अदालत का फैसला | 1. CCTV फुटेज की जांच: रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को सीसीटीवी फुटेज खंगालकर उपद्रवी वकीलों को चिह्नित करने का निर्देश। 2. यूपी बार काउंसिल को संदर्भ: पहचान के बाद वकीलों का लाइसेंस निलंबित करने हेतु अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए UP Bar Council को मामला भेजने का आदेश। 3. आपराधिक अवमानना: वकीलों के खिलाफ अवमानना की प्रक्रिया शुरू की गई। |
| अगली सुनवाई | 19 नवंबर 2026 |

