पीठ की तीखी और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
| विषय | सुप्रीम कोर्ट का रुख / टिप्पणी |
| महिला होने के नाते इनकार | “आपने केवल महिला होने के कारण उसे नियुक्ति देने से मना कर दिया? यह नारीत्व का अपमान है। हम भारत से हैं, जहां हर दिन महिलाओं के सम्मान की बात की जाती है, और यह कृत्य भारत सरकार के उपक्रम (PSU) द्वारा किया गया।” |
| सिलेंडर उठाने का तर्क | निगम के वकील ने तर्क दिया कि इस काम में रात की शिफ्ट और सिलेंडर उठाने जैसा शारीरिक श्रम शामिल है। इस पर कोर्ट ने कहा: “दिन-रात महिलाएं अपने घरों में गैस सिलेंडर उठाती हैं। जब पुरुष घर पर नहीं होते, तब महिला ही गैस सिलेंडर बदलती है। क्या आपको लगता है कि महिलाएं एलपीजी सिलेंडर नहीं उठा सकतीं?” |
| निगम की मध्यस्थता की मांग | कोर्ट ने IOCL के मामले को मध्यस्थता (Mediation) में भेजने के अनुरोध को सीधे खारिज कर दिया। |
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) (लिंग आधारित भेदभाव पर रोक), अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में समानता) और कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा के संदर्भ में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इस कृत्य को सार्वजनिक उपक्रम द्वारा लैंगिक पूर्वाग्रह (Gender Stereotyping) और नारीत्व के अपमान का प्रत्यक्ष उदाहरण मानते हुए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें महिला की याचिका खारिज कर दी गई थी। चूंकि याचिकाकर्ता कानूनी लड़ाई लड़ते हुए अब सेवानिवृत्ति (Superannuation) की आयु पार कर चुकी है, इसलिए अदालत ने नियुक्ति के बदले ₹12 लाख का मुआवजा देना न्यायोचित पाया। शीर्ष अदालत ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) को एक महिला अभ्यर्थी को ₹12 लाख की एकमुश्त क्षतिपूर्ति (Compensation) का भुगतान करने का आदेश दिया है, जिसे सभी निर्धारित योग्यताएं पूरी करने के बावजूद केवल “महिला होने” के आधार पर एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में ‘रिफिलिंग हेल्पर’ (Refilling Helper) के पद पर नियुक्ति देने से वंचित कर दिया गया था।
शीर्ष अदालत की प्रमुख मौखिक टिप्पणियां एवं फटकार
1. ‘क्या महिलाएं गैस सिलेंडर नहीं उठातीं?’: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार आईओसीएल के वकील द्वारा यह दलील दिए जाने पर कि हेल्पर के पद पर भारी एलपीजी सिलेंडर उठाने का शारीरिक श्रम (Manual Labour) करना पड़ता है और नाइट शिफ्ट होती है, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा: “आपने उसे केवल इसलिए नियुक्ति से वंचित कर दिया क्योंकि वह एक महिला है? यह संपूर्ण नारी गरिमा का घोर अनादर है। वह सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुंच चुकी है, लेकिन उसने अपने पूरे जीवन में अपने अधिकारों की निरंतर कानूनी लड़ाई लड़ी है। हम भारत में रहते हैं, जहां प्रतिदिन यह दोहराया जाता है कि महिलाओं का सम्मान करो और वह देवी स्वरूपा हैं। भारत सरकार के एक उपक्रम द्वारा ऐसा भेदभावपूर्ण रवैया नारीत्व पर सीधा कुठाराघात (Affront to womanhood) है। महिलाएं घरों में दिन-रात गैस सिलेंडर उठाती हैं। जब घर पर पुरुष नहीं होते, तो महिलाएं ही आगे बढ़कर गैस सिलेंडर बदलती हैं।”
2. मध्यस्थता की मांग खारिज, तात्कालिक फैसला
- आईओसीएल के वकील ने मामले को मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेजने का अनुरोध किया, जिसे पीठ ने सिरे से ठुकरा दिया।
- अदालत ने कहा कि दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद एक बुजुर्ग महिला के साथ हुए स्पष्ट लैंगिक भेदभाव के मामले को अब और लटकाया नहीं जा सकता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (गुढ़ा गांव एलपीजी प्लांट भर्ती विवाद)
- भर्ती प्रक्रिया एवं सिफारिश: याचिकाकर्ता (हरियाणा के गांव गुढ़ा की निवासी) उन 49 अभ्यर्थियों में शामिल थी, जिनकी सिफारिश उपायुक्त (Deputy Commissioner) की अध्यक्षता वाली स्थानीय चयन समिति ने इंडियन ऑयल के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में रोजगार हेतु की थी।
- साक्षात्कार और स्पष्ट भेदभाव: * याचिकाकर्ता ने कैजुअल खलासी / चपरासी / रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए साक्षात्कार दिया और सभी निर्धारित पात्रता शर्तें पूरी कीं।
- समिति की सूची में शामिल 43 अन्य पुरुष अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए, लेकिन याचिकाकर्ता को केवल महिला होने के कारण नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया।
- ट्रायल कोर्ट का फैसला: ट्रायल कोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए माना कि बचाव पक्ष (आईओसीएल) के गवाह के साक्ष्य से यह साफ सिद्ध हुआ है कि याचिकाकर्ता को सिर्फ महिला होने के कारण नौकरी से बाहर किया गया। ट्रायल कोर्ट ने उसे कैजुअल/प्रशासनिक/चपरासी पद पर समाहित (Absorb) करने का आदेश दिया था।
- प्रथम अपीलीय अदालत का उलटफेर: प्रथम अपीलीय न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया और कहा कि नाम केवल अनुशंसित था, चयनित नहीं; और उम्मीदवार का किसी पद पर निहित अधिकार नहीं था।
- हाईकोर्ट का दृष्टिकोण (14 अक्टूबर 2025): पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता के पास नियुक्ति का कोई निहित विधिक अधिकार (Vested Right) नहीं है और केवल लिंग के आधार पर अस्वीकृति का आरोप नियुक्ति का वैधानिक आधार नहीं बन सकता।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
- हाईकोर्ट का आदेश निरस्त: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि किसी सार्वजनिक निकाय द्वारा शारीरिक श्रम या रूढ़िवादिता के आधार पर महिलाओं को रोजगार से बाहर करना असंवैधानिक और मनमाना है।
- ₹12 लाख की क्षतिपूर्ति: चूंकि महिला अब नौकरी करने की सेवानिवृत्ति आयु पार कर चुकी है, इसलिए अदालत ने आईओसीएल को आदेश दिया कि वह दशकों तक झेले गए लैंगिक भेदभाव और अधिकारों के हनन की भरपाई के लिए पीड़िता को ₹12,00,000 (बारह लाख रुपये) का एकमुश्त मुआवजा अदा करे।
Women Rights: विधिक विवरण
- केस संदर्भ: याचिकाकर्ता महिला (गांव गुढ़ा) बनाम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड एवं अन्य [विशेष अनुमति याचिका / सिविल अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार), अनुच्छेद 15(1) (केवल लिंग के आधार पर किसी भी नागरिक के विरुद्ध भेदभाव का प्रतिषेध), अनुच्छेद 16(2) (लोक नियोजन में लिंग आधारित विभेद पर रोक) एवं अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा के साथ आजीविका का अधिकार)
- संबद्ध ऐतिहासिक संविधान पीठ व सुप्रीम कोर्ट नजीरें:
- सेक्रेटरी, मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस बनाम बबीता पुनिया (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘शारीरिक सीमाओं और सामाजिक रूढ़िवादिता की आड़ लेकर महिलाओं को समान अवसरों से वंचित करना अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन है।’
- एयर इंडिया बनाम नर्गेश मिर्जा (सुप्रीम कोर्ट) — ‘रोजगार की शर्तों में लैंगिक भेदभाव और महिला गरिमा का हनन असंवैधानिक है।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता हिमांशु जैन
- आईओसीएल की ओर से: कॉर्पोरेशन के पैनल वकील
- पीठ: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली (सर्वोच्च न्यायालय)

