POSH Act को सीधे लागू करने में क्या चुनौतियां हैं?
- पारंपरिक ‘मालिक-कर्मचारी’ संबंध का अभाव: POSH अधिनियम मुख्य रूप से संगठित क्षेत्रों, कॉरपोरेट्स या संस्थानों के लिए डिज़ाइन किया गया है जहाँ नियोक्ता (Employer) और कर्मचारी (Employee) का ढांचा होता है।
- वकीलों की स्वतंत्र स्थिति: अदालतों में प्रैक्टिस करने वाली कई महिला वकील स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं। वे किसी एक फर्म या कंपनी की वेतनभोगी कर्मचारी नहीं होतीं। ऐसे में पारंपरिक आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का गठन और अधिकार क्षेत्र स्पष्ट नहीं हो पाता।
- मौजूदा सुप्रीम कोर्ट नियमों की सीमाएं: शीर्ष अदालत के अपने 2013 के ‘लैंगिक संवेदीकरण एवं यौन उत्पीड़न नियम’ केवल सुप्रीम कोर्ट परिसर तक ही सीमित हैं। देश की उच्च अदालतों, जिला अदालतों और ट्रिब्यूनलों के लिए कोई एक समान ढांचा मौजूद नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और निर्देश
- संयुक्त परामर्श और नए नियमों का मसौदा: पीठ ने निर्देश दिया कि सभी संबंधित पक्षों (Stakeholders) के साथ मिलकर एक संयुक्त बैठक की जाए और कानूनी पेशे में कार्यरत महिलाओं के लिए एक व्यापक व एक समान विनियम (Uniform Regulations) तैयार किया जाए।
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की भूमिका: BCI की ओर से पेश अधिवक्ता राधिका गौतम ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि वे राज्य बार कौंसिलों (State Bar Councils) से जानकारी एकत्र करेंगी और महिला अधिवक्ताओं के लिए एक साझा ढांचा तैयार करने की दिशा में कदम उठाएंगी।
“अदालतों, जिला न्यायपालिका, केंद्र व राज्य सरकारों के ट्रिब्यूनल और अर्द्ध-न्यायिक निकायों में प्रैक्टिस करने वाली पीड़ित महिला अधिवक्ताओं के लिए POSH अधिनियम को सीधे लागू नहीं किया जा सकता, इसलिए एक अलग नियम पुस्तिका बनाना आवश्यक है।” — सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने अदालतों, न्यायाधिकरणों (Tribunals) और अर्ध-न्यायिक मंचों पर वकालत कर रहीं महिला अधिवक्ताओं के कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संरक्षण, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (POSH Act) की व्यावहारिक सीमाओं और बार में जेंडर संवेदीकरण के मुद्दों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक रुख स्पष्ट किया है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने महिला अधिवक्ताओं के लिए वैधानिक सुरक्षा उपायों की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और विभिन्न हितधारकों को आपस में विमर्श कर एक समान नियमावली तैयार करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी है कि महिला अधिवक्ताओं की स्वतंत्र पेशेवर स्थिति के कारण उन पर POSH अधिनियम के पारंपरिक प्रावधानों को सीधे या संकीर्ण (Straitjacket formula) तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। इसके लिए देश भर की सभी अदालतों और ट्रिब्यूनलों में वकालत करने वाली महिला वकीलों के लिए एक पृथक और व्यापक विनियामक ढांचा (Separate Regulatory Framework) तैयार किया जाना आवश्यक है [सीमा जोशी बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया]।
शीर्ष अदालत की प्रमुख विधिक टिप्पणियां एवं निर्देश
1. ‘POSH एक्ट का ढांचा महिला अधिवक्ताओं पर हूबहू फिट नहीं बैठता’ पीठ ने विधि व्यवसाय की अनूठी प्रकृति को रेखांकित करते हुए कहा: “हाईकोर्टों, जिला न्यायपालिका के तहत आने वाली सभी अदालतों, केंद्र व राज्य सरकारों के न्यायाधिकरणों और अन्य अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों में इन विनियमों का व्यापक विस्तार सुनिश्चित करने के लिए नियमों का एक अलग सेट बनाया जाना अनिवार्य है। हमारा स्पष्ट मानना है कि विधि व्यवसाय से जुड़ी पीड़ित महिलाओं पर POSH अधिनियम के सामान्य प्रावधानों को एक संकीर्ण/यांत्रिक (Straitjacket manner) तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।”
2. मौजूदा विनियम केवल सुप्रीम कोर्ट के परिसर तक सीमित
- अदालत ने जेंडर सेंसिटाइजेशन एंड सेक्शुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमेन एट द सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) रेगुलेशंस, 2013 की समीक्षा की।
- पीठ ने इंगित किया कि मौजूदा जेंडर सेंसिटाइजेशन कमेटी (GSICC) का दायरा केवल सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक परिसर (Precincts) तक ही सीमित है, जिससे देश भर की जिला अदालतों, हाईकोर्टों और ट्रिब्यूनलों में नियमित प्रैक्टिस करने वाली लाखों महिला वकील संस्थागत और प्रभावी शिकायत तंत्र से वंचित रह जाती हैं।
3. BCI और हितधारकों के संयुक्त परामर्श से बनेगी साझा नियमावली
- सर्वोच्च न्यायालय ने मामले के वकीलों से आग्रह किया कि वे सभी संबंधित पक्षों के साथ एक संयुक्त परामर्श (Joint Consultation) आयोजित करें और सभी न्यायिक, अर्ध-न्यायिक व अधिकरण मंचों पर लागू होने वाली एक समान नियमावली (Uniform Regulations) का मसौदा तैयार करें।
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की ओर से पेश अधिवक्ता राधिका गौतम ने अदालत को आश्वासन दिया कि वे शीर्ष निकाय से निर्देश लेकर महिला वकीलों के लिए एक साझा विनियामक ढांचा तैयार करने का हरसंभव प्रयास करेंगी।
- अदालत ने BCI को यह भी पता लगाने का निर्देश दिया कि क्या वर्तमान में किसी राज्य बार काउंसिल (State Bar Council) द्वारा इस संबंध में कोई विशेष नियम या आंतरिक शिकायत तंत्र लागू किया जा रहा है या नहीं।
वकालत के पेशे में POSH कानून की व्यावहारिक विधिक चुनौतियां
- नियोक्ता-कर्मचारी संबंध का अभाव: POSH अधिनियम मुख्य रूप से पारंपरिक ‘नियोक्ता-कर्मचारी’ (Employer-Employee) ढांचे पर आधारित है, जहां आंतरिक शिकायत समिति (ICC) नियोक्ता द्वारा गठित की जाती है। चूंकि अधिवक्ता स्वतंत्र पेशेवर (Independent Professionals) होते हैं और अदालतों में किसी कंपनी या संस्था के अधीन काम नहीं करते, इसलिए बार रूम या कोर्ट परिसर में उत्पीड़न की स्थिति में ICC का क्षेत्राधिकार स्पष्ट नहीं रहता।
- विशाल कार्यक्षेत्र: महिला अधिवक्ताओं का कार्यक्षेत्र किसी एक बंद कार्यालय तक सीमित न होकर अदालत कक्षों, बार एसोसिएशन के कमरों, कनिष्ठ-वरिष्ठ वकीलों के चैंबरों, पुलिस थानों, जेलों और ट्रिब्यूनलों तक फैला होता है।
- संस्थागत संरक्षण का अभाव: जिला न्यायपालिका और छोटे बार एसोसिएशनों में स्वतंत्र और निष्पक्ष शिकायत निवारण तंत्र न होने के कारण युवा महिला वकीलों को अक्सर पेशेवर बहिष्करण (Professional isolation) के डर से उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराने में हिचकिचाहट होती है। सुप्रीम कोर्ट का प्रस्तावित ढांचा इसी खाई को पाटने का प्रयास है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सीमा जोशी बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया एवं अन्य [रिट याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act); अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49 (बीसीआई की नियम बनाने की शक्ति); भारत का संविधान – अनुच्छेद 14, 15(3), 19(1)(g) और 21 (गरिमापूर्ण एवं सुरक्षित कार्य वातावरण का अधिकार)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- विशाखा एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य (1997, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सुरक्षित और गरिमापूर्ण कार्यस्थल का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।’
- सुप्रीम कोर्ट जेंडर सेंसिटाइजेशन विनियम, 2013 — ‘अदालती परिसरों में आंतरिक शिकायत समिति (GSICC) का गठन।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की ओर से: अधिवक्ता राधिका गौतम
- पीठ: न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह (सर्वोच्च न्यायालय)
POSH Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस ए.जी. मसीह |
| याचिका | महिला वकीलों के लिए वैधानिक संरक्षण की मांग (Seema Joshi v. BCI) |
| मुख्य मुद्दा | स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करने वाली महिला वकीलों पर POSH नियमों की सीमाएं |
| सुप्रीम कोर्ट का सुझाव | देश भर की अदालतों, न्यायाधिकरणों और अर्द्ध-न्यायिक निकायों के लिए एक समान नियम बनाना। |

